मानव सभ्यताओं का विकास सिर्फ नदियों का किनारा ढूंढ लेने भर से नहीं हुआ. महज पत्थरों को घिसकर और फिर उन्हीं पत्थरों को गोल आकार देने से मानवता नहीं पनपी. संवाद ने गुफा मानव को मनुष्य बनाया और उसी संवाद की नींव में बहुत नीचे दबी हैं कुछ चिट्ठियां. मनुष्यों ने चिट्ठियों को अपने-अपने हिसाब से बरता. दुश्मन को ललकारना हो या संधि का प्रस्ताव भेजना हो. संवेदना प्रकट करनी हो या मदद मांगनी हो. पिता बनने की सूचना देने से लेकर गर्भपात का विषाद-संदेश भेजने तक, प्रेम का इजहार करना हो या 'मैं अब तुम्हारी नहीं हो सकती विनोद' का जवाब भेजना हो. प्रधानाचार्य से फीस माफ करने की गुजारिश करनी हो या पिता से पुस्तकों के लिए पैसे मांगने हों. प्रलय के दिनों में वो चिट्ठियां ही थीं जिन्होंने हमारे शब्दों को बर्दाश्त किया और हमें जुबान दी.
चिट्ठियों का एक शहर होता था जो आज मैसेंजरों के बढ़ते एक्यूआई की धुंध में सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा है. हास्य के शिल्प में प्रकाशित होने वाला हिंदी दुनिया का मशहूर पॉडकास्ट- तीन ताल- चिट्ठियों के इस शहर को पुनर्जीवित और पुन: संदर्भित कर रहा है. लेकिन यह पॉडकास्ट सिर्फ हास्य तक महदूद नहीं है.
चिट्ठियां 'तीन ताल' की रिवायत का एक अहम हिस्सा है. इस हफ्ते यानी सीजन-2 के 107वें एपिसोड में तीन तालियों की चिट्ठियां पढ़ते हुए एक चिट्ठी ऐसी भी मिली जिसमें एक वर्ल्ड रिकॉर्ड सांसें ले रहा था. ये वर्ल्ड रिकॉर्ड 'तीन तालियों' ने बनाया, वही तीन तालिए जिन्हें अंग्रेजी में या सोशल मीडिया की जुबान में टीटीस्टाफ कहा जाता है. व्हाट्सएप ने भी अपने ऐप पर 'ग्रुप वॉइस चैट' का फीचर डालते वक्त सोचा होगा कि कोई इस पर कितनी ही देर बात करेगा. एक परिवार के लोग कितनी बातें करेंगे. 10 मिनट, 20 मिनट बहुत हो गया तो आधा-एक घंटा. लेकिन जब यह समय 63 घंटे की सीमा के भी पार चला जाए तो व्हाट्सएप को भी संदेह हुआ होगा. तो वॉट्सएप अपने इस संदेह को यकीन में बदल ले क्योंकि क्योंकि तीन तालियों यानी टीटीस्टाफ की यह कॉल पूरे 63 घंटे 5 मिनट चली..

गूगल करने और तमाम एआई का सहारा लेने पर पता चलता है कि व्हाट्सएप के इस फीचर के इतिहास में सबसे लंबा कॉल 46 घंटे 12 मिनट 52 सेकेंड का है. 63 घंटे 5 मिनट के रिकॉर्ड को बनाने वाले तीन ताल के श्रोता अपनी चिट्ठी में पूरे ढाई दिन चले इस वार्तालाप का बयान कुछ इस तरह करते हैं,
"करीब 5 महीने पहले जब सीजन 2 के एपिसोड 82 मने "कमाई का चमत्कारी चूरन" नामक एपिसोड अपलोड होता है, तब यह सोचा भी न था कि कहानी कुछ यूं लिखी जाएगी जो कलम और स्याही से नहीं मौखिक बतकुचन होगी और एक रिकॉर्ड भी बनेगा. एपिसोड के pinned कमेंट को हौले से छू लिया गया और खुल गया दरवाजा टीटी 2 के व्हाट्सएप ग्रुप का.
तीन ताल के त्रिमूर्तियों की भांति, कहानियां जेहन में उमड़ती थीं, एक बड़के आदमी कह गए हैं कि, "दुनिया और खूबसूरत होती जब कोई किसी को सुन लेता." यही तीन ताल की नवैयत में सुनने-सुनाने का दौर आ गया... साथ ही वह दौर भी आया जहां से लगने लगा कि शब्दों की मर्यादा एवं उनके भावार्थ के कारण बहुत कुछ छूट जा रहा है.
कई मुद्दों के लिए, जिसमें सामाजिक बंधन से इतर वाले कुछ शब्दों की जरूरत पड़ती है एवं स्वच्छंदता के लिए जिस वातावरण मने की 'एब्सलूट डेमोक्रेटिक एनवायरमेंट' की आवश्यकता पड़ी, तब "मानिंद 2.0" ग्रुप की कल्पना की गई. नहीं, यह मानिंद बुक क्लब नहीं है, यह ग्रुप धरती से थोड़ा नीचे है, गड़े हुए खजाने जैसा.
यहां तीन ताल के विशाल परिवार में से तीन तालिये जुड़ते गए. यहां मिली आजादी ठीक वैसी है, जैसे 'कोई बच्चा अपने मामा के घर हो, जैसे जगजीत सिंह के हाथ में हारमोनियम, अजीज मियां के मुंह में पान और रहीम यार खान एयरबेस पर ब्रह्मोस...
यह ग्रुप पॉजिटिवली विचित्र है, यहां मानिंदों की उम्र 18 से शुरू होकर उम्र न गिनने वाली उम्र तक जाती है. हम मानिंद कहलाने वाले तीन तालिये देश एवं दुनिया के विभिन्न कोनों से जुड़ते गए एवं कलेक्टिवली "वीसीपगलू" कहलाने लगे. किसी को कुछ कहना हुआ तो वीसी का बटन दबाया उसके बाद बैठकी एवं बतकही का दौर शुरू हो जाता था.
चिट्ठी की शुरुआत में जिस बतकही के रिकॉर्ड की बात कही, वह अभी पिछले दिनों ही कायम हुआ है, हम मानिंदों ने "63 घंटे 5 मिनट" तक लगातार बतकही का रिकॉर्ड बनाया, जो कि अपने आप में कत्तई मानिंदनेस वाली हरकत है. इंटरनेट डॉट कॉम बताता है कि, यह व्हाट्सएप के इतिहास में पूर्वस्थापित 50 घंटे के अघोषित रिकॉर्ड को न केवल तोड़ता है बल्कि अपनी लकीर भी लंबी करता है.

यहां जुड़े इंटर पास से लेकर पीएचडी होल्डर तक, इंटेल से लेकर इंटर कॉलेज के कर्मचारी, बेरोजगार से लेकर फक्कड़ एनएफटी ट्रेडर, राजनांदगांव से लेकर नॉर्दर्न आयरलैंड तक, जबलपुर से जर्मनी तक, हीथ्रो एयरपोर्ट से लेकर फ्रांस में पाककला सीखने वाले तीन तालिये एक के बाद एक कमान संभालते रहे. दिल्ली वाले सोते तो लंदन वाले आ जाते हैं, पटना में नाइट ड्यूटी वाले ग्रीनविच मीन टाइम को मैच कर देते थे. इस तरह तीन तालिये जुड़ते गए और "63 घंटे 5 मिनट" का कारवां बनता गया.
63 घंटे की वीसी में भूत प्रेत की कहानियां, अध्यात्म की बातें, सेल्फ लव एवं सेल्फ एक्सेप्टेंस पर घंटों बात, मिठाइयों पर एक पूरी शाम, गांव की कहानियां चलें तो पिन ड्राप साइलेंस, कभी मुद्दों से जुड़े तो कभी बेहद निजी अनुभव साझा हुए, प्यार की उमंग में भाव के बहाव से लेकर मध्य पूर्व में गिरते गोले, पश्चिम प्रदेशों के अलग अलग व्यंजन, स्टॉक मार्केट में स्टॉप लॉस की कीमत, हल्दीराम की भुजिया में स्वाद का पैमाना, हमारी बातें लगभग हर मुद्दे पर हुईं.

पारिवारिक क्लेश से लेकर देशवासियों के सिविक सेंस तक, भूत-बेतालों की कहानियां एवं उनकी मुक्ति के जुगाड़, राफेल की शक्ति से लेकर स्वदेशी कावेरी इंजन की जरूरत तक, डोनाल्ड ट्रम्प की उड़ती जुल्फों से जेलेंस्की दद्दा की ब्लैक tshirt तक आदि इत्यादि...
बिना छोटे बड़े का भेद करते हुए जटिल से जटिल एवं "और नीचे जाते हुए" विषयों को भी अछूता न समझा गया. तीन ताल से हम सबने सुने जाने की हुनरमंदी सीखी. हम बैठकी में साथ बैठे, कुछ दिमाग में नहीं था, हम तो बस साथ बैठे थे. यही इस सफर का मंजिल मुकाम था. अब चिट्ठी का अंत है इसी उम्मीद के साथ कि, 'बतकही जारी रहेगी, हम ऐसे ही जुड़े रहेंगे कभी मुद्दों को लेकर कभी "और नीचे जाने" की कवायद में.'
ताऊ, ख़ान चा, सरदार एवं तीन तालिया परिवार सहित हर उस आत्मा को जय हो, जय हो, जय हो.... जो कहने सुनने में यकीन रखती है.
-"तीन ताल के मानिंद 2.0 कुनबे से." (यह एक व्हाट्सएप ग्रुप है)
एक ऐसे वक्त में जहां संवाद पर संकट है. संकोच की अवस्था, मुंहफटी का गुण जैसे लांछन हर रोज संवाद का कत्ल कर रहे हैं. 'OK' का रिप्लाई जब 'K' में सिमट रहा है, 'I Love You' की जगह जब 'ILU' लिखा जा रहा है, तब कमान एक ऐसी पीढ़ी के हाथ में है जो 'फियर ऑफ मिसिंग आउट' की जगह 'FOMO' जैसी शब्दावली तैयार कर रही है. ऐसे वक्त में संवाद की परंपरा को सहेजने और उसकी दीर्घता का एहतराम करने वाले लोग भी हैं. ये लोग कौन हैं? ये सिर्फ एक पॉडकास्ट से जुड़े श्रोता नहीं हैं, ये संवाद संरक्षक हैं. इन श्रोताओं की आत्मीयता इतनी गंभीर और गहरी है कि ये लोग इस कीर्तिमान को भी बहुत दिनों तक टिकने नहीं देंगे. ईति नए कीर्तिमान के इंतजार में.