कांतारा विवाद में फंसे अभिनेता रणवीर सिंह की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं. उनके खिलाफ FIR दर्ज हुई है. आरोप है कि एक पब्लिक प्लेटफॉर्म पर उन्होंने मजाक करते हुए अजीब एक्सप्रेशन दिए और उसे कांतारा फिल्म में दिखाई गई दैव परंपरा जैसा बताया. एक्टर पर आरोप है कि उन्होंने चेहरे के भद्दे हाव-भाव बनाते हुए उसकी तुलना दैव परंपरा की देवी चावुंडी दैव से की.
कांतारा फिल्म की कहानी से जुड़ाव
कांतारा फिल्म में दिखाई गई दैव परंपरा ने 21वीं सदी में लोगों को आस्था की असल जमीन से जोड़ा है. यह परंपराएं और लोक मान्यताएं भारत की युगों और सदियों पुरानी पहचान हैं. यह परंपराएं किसी दैवीय किताब से नहीं पनपीं और न ही इन्हें किसी आसमानी आदेश की तरह मानने के लिए बाध्य किया गया.
ये परंपराएं खेतों की जुती हुई जमीन से उगीं. नदियों के बहते पानी से सींची गईं और हरे-भरे जंगलों के साथ विकसित होती गईं. बड़े-बूढ़ों की सुनाई कहानियों ने इनमें विश्वास भरा और इस तरह यह पीढ़ी दर पीढ़ी जिंदगी का हिस्सा बनती चली गईं.
रक्षक देवताओं की परंपरा और चावुंडी दैव
कांतारा फिल्म के हिट होने और पसंद किए जाने की वजह यही है कि बदलाव के आधुनिक युग में बड़ी आबादी ने इससे खुद को कनेक्ट किया. लोगों ने अपने आसपास इसकी मौजूदगी को महसूस किया. दक्षिण भारत के गांवों से निकल कर आई इस कहानी के दो दैवीय नायकों गुलिगा दैव और पंजुरली को उत्तर भारतीयों ने अपने रक्षक देवताओं (डीह बाबा, तेजाजी, गोगाजी, पाबूजी) से जोड़ते हुए देखा और कहीं न कहीं ये समझा कि इन दैवीय परंपराओं में नाम भले ही अलग-अलग हों लेकिन आस्था और विश्वास की भावना एक जैसी हैं.

रणवीर सिंह के विवाद के बाद इसी दैव परंपरा में एक नया नाम चावुंडी का भी जुड़ा है. फिल्म में दिखाया गया है कि चावुंडी एक स्त्री दैव है. वह भैरव की बहन हैं. इतने परिचय से ही चावुंडी दैव के बारे में पता चलता है कि उसकी समानता उत्तर भारतीय चामुंडी देवी से हैं. हालांकि नाम की समानता होने और एक जैसी शक्ति होने के बावजूद चावुंडी दैव की मान्यताएं चामुंडी देवी से काफी अलग हैं.
कौन हैं चावुंडी दैव?
कर्नाटक के तटीय इलाके तुलु नाडु में 'भूत कोला' की दैवीय नृत्य परंपरा में चावुंडी का नाम बड़े ही आदर और आस्था से लिया जाता है. इस आदर में थोड़ा से भय भी शामिल है, लेकिन यह भय निगेटिव नहीं है, बल्कि चावुंडी के उस उग्र स्वभाव के कारण है जो उन्होंने नकारात्मक शक्तियों को खत्म करने के लिए ले रखा है.
हालांकि चावुंडी दैव सिर्फ कहानी या नृत्य परंपरा का पात्र नहीं है, बल्कि न्याय करने वाली जीवित शक्ति मानी जाती हैं. यही कारण है कि जब दैव-परंपरा को “परफॉर्मेंस” या “रोल” के तौर पर देखा जाता है, तो स्थानीय समाज में असहजता पैदा होती है.
भूत कोला परंपरा में चावुंडी दैव
चावुंडी दैव तुलुनाडु की प्राचीन 'भूत कोला' परंपरा में पूजी जाने वाली एक उग्र रक्षक आत्मा (दैव) हैं. तुलुनाडु के तटीय इलाके में खास तौर पर उडुपी और दक्षिणी कन्नड़ जिले शामिल हैं. मुख्यधारा के पौराणिक और वैदिक देवताओं से अलग, चावुंडी दैव की जड़ें लोककथाओं और आस्था की कहानियों में हैं. चावुंडी अकेली नहीं हैं, बल्कि रक्षा करने वाले चार दैवों में से एक हैं. जिनमें दो गुलिगा और पंजुरली दैव हैं. तीसरी हैं चावुंडी और चौथे हैं हुली दैव. इस तरह तुलुनाडु की परंपरा में इन सभी को एक साथ 'धर्म चतुर्मुख' कहा जाता है.

लोककथाओं में चावुंडी गुलिगा दैव की बहन हैं. उनकी कहानियां भूमि की रक्षा, विश्वासघात और न्याय से जुड़ी हुई हैं. ऐसा न्याय जो पर्यावरण को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाने वालों को दंड देकर किया जाता है. चावुंडी दैव की भूमिका दुष्टों को दंड देने वाली और सामाजिक-सांस्कृतिक संतुलन को फिर से स्थापित करने वाली शक्ति के रूप में देखी जाती है.
माना जाता है कि जब समुदाय अपने पूर्वजों को दिए गए वादों से मुकरता है तब चावुंडी दैव हस्तक्षेप करती हैं. ये वादे जल, जंगल जमीन से ही जुड़े हुए हैं. जैसे बड़े पैमाने पर जंगल का कटना, नदियों के तटों को पाटकर उनका रास्ता बंद करना. तालाबों को सुखा देना और बेवजह जंगली जानवरों का शिकार करना. जब गुलिगा और पंजुरली दैव दंड देते हैं. लेकिन उनके दंड देने से भी संतुलन स्थापित नहीं होता है और बदले की भावना बड़ी होने लगती है, तब चावुंडी न्याय करती हैं. एक उग्र और आक्रामक न्याय...
यह भी पढ़ें- कांतारा विवाद में फंसे रणवीर सिंह, चावुंडी दैवा परंपरा का अपमान करने के आरोप में दर्ज FIR
चामुंडी देवी और चावुंडी दैव... अंतर या समानता?
दैव चावुंडी की ये सभी खासियतें उत्तर भारतीय देवी चामुंडी से काफी मिलती-जुलती हैं, फिर भी चावुंडी दैव पूरी तरह अलग और स्थानीय आध्यात्मिक सत्ता की प्रतीक हैं. चावुंडी दैव का स्वरूप बहुत भयंकर है. उनका शरीर भस्म में लिपटा-पुता और लंबे-लंबे बाल बिखरे होते हैं. गले में खोपड़ियों की माला होती है और उनका वाहन बाघ है. तुलु संस्कृति में उनकी पूजा पारंपरिक मंदिरों में नहीं होती, बल्कि पवित्र 'भूत कोला' अनुष्ठान के जरिये ही की जाती है.
भूत कोला रात भर चलने वाला अनुष्ठान होता है, जिसमें ढोल-नगाड़े, अग्नि, संगीत, विशेष वेशभूषा और तांत्रिक नृत्य शामिल होते हैं. इस दौरान प्रशिक्षित कलाकार — जिनके बारे में माना जाता है कि उन पर दैव अवतरित होते हैं , समाधि या तंद्रा की अवस्था में दैव का रूप धारण करते हैं. इसी अवस्था में दैव समुदाय को निर्देश देते हैं, विवादों का निपटारा करते हैं और आशीर्वाद भी देते हैं.

इन अनुष्ठानों के दौरान अचानक तापमान में बदलाव, तेज़ हवाएं या तीव्र आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होना दैव की उपस्थिति का संकेत माना जाता है. यह माना जाता है कि चावुंडी दैव का आगमन सामाजिक और नैतिक संतुलन की स्थापना के लिए होता है. भूत कोला की परंपरा गांव-दर-गांव अलग-अलग रूपों में देखने को मिलती है. चढ़ावे में चावल, ताड़ी, मुर्गा और मौसमी उपज शामिल होती है. ये अनुष्ठान आमतौर पर मानसून के बाद या कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित किए जाते हैं.
अलग-अलग पर एक जैसी खासियत
नामों की समानता के बावजूद चावुंडी दैव और चामुंडी माता एक ही नहीं हैं. चावुंडी दैव तुलुनाडु की रक्षक दैव आत्मा हैं. वहीं चामुंडी माता वैदिक और पौराणिक परंपरा की देवी हैं. वह देवी दुर्गा का उग्र स्वरूप मानी जाती हैं और चंड-मुंड नामक असुरों के वध के लिए प्रसिद्ध हैं. उनकी पूजा पूरे भारत में होती है, विशेष रूप से मैसूर में.
हालांकि दोनों में उग्र स्त्री शक्ति, विनाश और खोपड़ी-मालाओं जैसे कुछ प्रतीकात्मक तत्व समान दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी आध्यात्मिक परंपराएं और सांस्कृतिक संदर्भ पूरी तरह अलग हैं. भूत कोला या 'भूत आराधने' का आयोजन बिलावा और बंट समुदायों द्वारा किया जाता है, जबकि दैव का रूप धारण करने वाले माध्यम कलाकार आमतौर पर नालिके, परावा या पंबाडा समुदायों से आते हैं.
इस पूजा परंपरा में आदिवासी विश्वासों के साथ शैव और शाक्त तत्वों का भी समावेश दिखाई देता है. जो पुरुष और प्रकृति के रूप में स्थापित भारतीय विचारधारा की असली आत्मा हैं. यही वह विचारधारा है जो सदियों से हिमालय के बर्फीली चोटी से लेकर सागर किनारे तक रहने वाले नागरिकों को एक करती है.