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कोंदो, कुटकी, रागी... हमारे फूड कल्चर का हिस्सा रहे मोटे अनाज जो कहलाते हैं ऋषि अन्न

कोंदो जैसे मोटे अनाजों को प्राचीन काल से ऋषि अन्न की संज्ञा दी गई है. व्रत-उपवास और कठिन साधना करने वाले ऋषि-मुनि कोदों के भात को अपनी आहार परंपरा में शामिल करते आए हैं. असल में कोदों ऐसा अनाज है, जो कम वर्षा में भी उपज जाता है. हालांकि यह कभी भी कृषि की मुख्य धारा में शामिल नहीं रहा है और इसकी खेती को लेकर भी पहले खास प्रयास नहीं किए गए हैं.

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आहार की संस्कृति का हिस्सा रहे हैं मोटे अनाज
आहार की संस्कृति का हिस्सा रहे हैं मोटे अनाज

बुजुर्गों से अक्सर ये कहते हुए सुना जाता है, 'मोटा खाओ, मोटा पहनो'. उनकी इस लोक कहावत का सीधा सा आशय है खाने-पहनने की संस्कृति को आसान बनाने से रहा है. मोटा पहनने का अर्थ है, सूती या खद्दर के कपड़े पहनने से है, जो टिकाऊ होते थे और भारतीय मौसम के अनुसार शरीर के लिए अनुकूल भी रहते थे. 

इसी तरह मोटा खाना भी भारत के ऋतु परिवर्तन के अनुसार तय किया गया है, जिसमें मोटे अनाज शामिल हैं. अनाज के लिए मोटा शब्द इसलिए भी प्रयोग किया जाता है ताकि इनका आटा बनाने के लिए इन्हें बहुत बारीक महीन पीस कर आटा न बनाया जाए, बल्कि इन्हें कुछ दरदरा ही रखा जाए, ताकि ये पचने में आसान हों और पोषण से भरपूर भी रहें.

इसके साथ ही अनाजों में विविधता को अपनाने की भी परंपरा रही है, जिससे पोषण के लिए जरूरी हर प्रकार के तत्व मिल सकें. आज से तीन दशक तक के पहले के भारत में ये सबकुछ आसानी से उपलब्ध था. भोजन और आहार की एक संस्कृति रही है, जिसमें थाली में सिर्फ गेहूं की ही रोटी शामिल नहीं थी, बल्कि अन्य अनाजों की भी रोटियों की अपनी जगह थी. 

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जैसे, मक्का, ज्वार और बाजरे की रोटियां मोटी होती हैं और इन्हें अपनी थाली में शामिल करना एक तरीके से पोषण को शामिल करना रहा है. इसी तरह चावल की भी अलग-अलग ऐसी किस्में हैं जो रोज के चावल से अलग है और उनकी खेती भी अलग तरीके से होती है. सामां, सवां और कुटकी-कोदो इसी तरह के अनाज हैं. इन अनाजों का जिक्र पुरानी कविताओं और भजनों में भी मिलता है, बल्कि कुछ अन्न तो इतने पवित्र बताए जाते हैं कि भारतीय गृहस्थ जो व्रत-उपवास की परंपरा अपनाते हैं, उनमें ये मोटे अनाज शामिल हैं, क्योंकि अन्न होते हुए भी इन्हें अन्न की श्रेणी में नहीं रखा जाता है.

हिंदी साहित्य में कविता की कृष्णमार्गी धारा में सूरदास के ही बराबर प्रसिद्ध कवि हुए हैं, नरोत्तम दास. उन्होंने अपनी रचना सुदामा चरित में एक जगह लिखा है- 

'कै वह टूटि सि छानि हती कहांए कंचन के सब धाम सुहावत,
कै पग में पनही न हती कहँए लै गजराजहु ठाढ़े महावत.
भूमि कठोर पै रात कटै कहाँए कोमल सेज पै नींद न आवत,
कैं जुरतो नहिं कोदो सवां प्रभु के परताप तै दाख न भावत.'

कवि नरोत्तम दास ने इस प्रसंग में तब का वर्णन किया है, जब सुदामा, द्वारिका से लौट आते हैं और इस बीच श्रीकृष्ण की कृपा से उनकी जिंदगी बदल जाती है. इसी प्रसंग में सुदामा कहते हैं कि एक समय था कि जब खाने के लिए 'कोदो-सवां' जैसा अनाज भी नहीं मिल पाता था और अनाज-पकवान से भंडार भरे हैं.

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मोटे अनाज को किया जा रहा प्रचारित
कवि ने अपनी ईशभक्ति और कल्पना में जो भी लिखा वह अलग बात है, लेकिन इन सबके बीच जिस शब्द को बोल्ड और अंडरलाइन करने की जरूरत है, वह है कोदों और सवां. जाहिर तौर पर यह अनाज हैं और भारत की प्राचीन खाद्य परंपरा का हिस्सा हैं. इसे वैश्विक पटल पर पहचान दिलाए जाने की कोशिशें तेज हो रही हैं. साल 2023 को 'अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष' घोषित किया गया था. 

मोटे अनाजों को दी गई है ऋषि अन्न की संज्ञा 
कोंदो जैसे मोटे अनाजों को प्राचीन काल से ऋषि अन्न की संज्ञा दी गई है. व्रत-उपवास और कठिन साधना करने वाले ऋषि-मुनि कोदों के भात को अपनी आहार परंपरा में शामिल करते आए हैं. असल में कोदों ऐसा अनाज है, जो कम वर्षा में भी उपज जाता है. हालांकि यह कभी भी कृषि की मुख्य धारा में शामिल नहीं रहा है और इसकी खेती को लेकर भी पहले खास प्रयास नहीं किए गए हैं. ऋषि-मुनियों द्वारा अपने भोजन में शामिल करने की वजह भी इसकी पौराणिक मान्यता रही है.

असल में कोदों को उपजाने के लिए खेत नहीं जोते जाते, इससे बैल को श्रम के लिए कष्ट नहीं देना होता था, तो वहीं सिंचाई पर भी निर्भर नहीं होना पड़ता था. खेत न जोते जाने से भूमि के छोटे से छोटे कीड़े-मकौड़ों की जीवन हानि नहीं होती थी. यानि की कोदों को उपजाने में हिंसा कम से कम होती है. इसलिए इसे हर तरीके से पवित्र माना जाता रहा है.

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सिर्फ कोंदो ही नहीं, इस आहार परंपरा में ज्वार, बाजरा, रागी (मडुआ), मक्का, जौ, सांवा, कंगनी, कुटकी, चीना आदि भी शामिल हैं. इन्हें लघु धान्य या “श्री धान्य” या “श्री अन्न” कहा जाता है. इनका सेवन करने से हड्डियों को मजबूती मिलती है, कैल्शियम की कमी से बचाव होता है, ज्यादा फाइबर होने से पाचन दुरुस्त रहता है, वजन कंट्रोल होने लगता है, दुबले-पतलों का वजन कुछ बढ़ जाता है तो ज्यादा वजन वालों का घट कर बी.एम.आई. (बॉडी मास इंडेक्स) के स्तर पर घट जाता है. एनीमिया का खतरा कम होता है, यह डायबिटीज और दिल के रोगियों के लिए भी यह उत्तम माना जाता है.

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कई मिथकों-दंतकथाओं में शामिल है कोदों
कोदों को लेकर कई मिथकों में यह भी कहा जाता है कि इसे वनवास के समय श्रीराम ने भी खाया था. एक किवदंति में इसे प्रभु की इच्छा से उत्पन्न अनाज बताया गया है. कहते हैं कि एक भगत चरवाहे को झूठे आरोप में किसी गांव से निकाल दिया गया. इससे भगवान नाराज हो गए. उधर, भगत का हुक्का-पानी बंद होने से उसे कुछ भी खाने को नहीं मिला. वह सिर्फ भगवान भरोसे था. गांव में भी अकाल पड़ गया. भगत को बचाने के लिए भगवान ने खेत के बिखरे अनाजों को मिलाकर बोया और उससे जो बीज मिले उसे पकाकर भगत को खिलाया. ये अनाज कोंदो ही था. कहते भी हैं कोंदो में सात तरह के अनाज की शक्ति होती है.

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आदिवासी परंपरा में आज भी शामिल हैं मोटे अनाज
आधुनिक शैली में भले ही मोटे अनाजों को भुला दिया गया है, लेकिन आदिवासी परंपरा ने इसे अभी भी अपनी आहार शैली में खास तौर पर शामिल कर रखा है. शरीर को मजबूती और स्फूर्ति देने वाला यह अनाज अब शहरी लोगों के बीच भी आकर्षण बढ़ा रहा है, क्योंकि खान-पान की शैली में इसका शामिल होना ही कई बीमारियों का खुद में निदान है. आदिवासी कोदों को दूध के साथ भिगोकर खाते हैं और उबालकर चावल की तरह भी प्रयोग में लाते हैं. कोदों की ही बात करें तो इसके दाने में 8.3 प्रतिशत प्रोटीन, 1.4 प्रतिशत वसा और 65.9 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट शामिल है. इसकी ऊपरी परत में फाइबर काफी अधिक मात्रा में है, लिहाजा यह मोटापे से भी बचाता है. 

किस तरह खाए जा सकते है मोटे अनाज?
कोंदों की खीर के अलावा, रागी की रोटी, चीले या रागी की इडली भी बनाई जा सकती है. इसी तरह सांवा की भी चावलों की ही तरह खिचड़ी बनाई जा सकती है. ज्वार और बाजरा की तो वैसे भी रोटी बनाकर खाई ही जाती है, इसके अलावा अगर इन्हें गेहूं के आटे मे पिसवा लिया जाए तो मल्टीग्रेन आटा बन जाता है जो बहुत पौष्टिक होता है.

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बहुत लाभकारी है कोदों
कोदो मधुमेह नियंत्रण, गुर्दो और मूत्राशय के लिए लाभकारी है. यह रासायनिक खाद और कीटनाशक के बुरे असर से भी दूर है. इसमें चावल के मुकाबले कैल्शियम भी 12 गुना अधिक होता है इसके साथ ही शरीर में आयरन की कमी को भी यह पूरा करता है. मोटे अनाज हमारी संस्कृति का हिस्सा रहे हैं. जब घरों में ही चक्की का पीसा खाया जाता था, तब मोटे अनाजों से वास्ता रहा, लेकिन जैसे ही जीवन शहरी होता गया तो खाद्य संस्कृति पूरी तरह से बदल गई, लिहाजा मोटे अनाज चलन से बाहर हो गए, हालांकि अब लोग इन अनाजों का महत्व समझ रहे हैं और दोबारा इन्हें अपनी भोजन परंपरा में शामिल कर रहे हैं.

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