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हिंसा की 'आग' में जल रहे ईरान का क्या है लोहड़ी कनेक्शन

पंजाब की लोहड़ी और ईरान के चहार-शंबे सूरी त्योहार में आग की पूजा और सामूहिक उत्सव की परंपराएं मिलती-जुलती हैं. दोनों देशों में आग को पवित्र माना जाता है और इसे ऊर्जा, चेतना और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है.

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अमृतसर में लोहड़ी त्योहार के मौके पर आग के घेरे के पास नाचती-गातीं युवतियां (Photo- PTI)
अमृतसर में लोहड़ी त्योहार के मौके पर आग के घेरे के पास नाचती-गातीं युवतियां (Photo- PTI)

ईरान इस वक्त विरोध-प्रदर्शनों के दौर से गुजर रहा है. ये प्रदर्शन हिंसक हो चुके हैं. खामेनेई शासन इन प्रदर्शनों को दबाने के लिए भी हिंसा का ही सहारा ले रहा है. नतीजा... ईरान की सड़कें खून से लाल हैं और आसमान इंकलाबी नारों से गूंज रहा है. 

यूं तो ईरान एक मुस्लिम देश है, लेकिन इस मुल्क का इतिहास इसे इसकी असली फारसी पहचान की ओर ले जाता है. ये पहचान आस्था और पूजा के तरीकों से जुड़ी हुई है. इसमें नमाज और सिजदा से अलग प्रतीकों पर विश्वास और उनकी पूजा भी शामिल है. ईरान वो देश रहा है जो सूर्य, चंद्रमा, आग, पानी और जंगल को दैवीय मानता आया है और इन्हें अपनी तमाम मान्यताओं में सबसे ऊपर रखता है.

13 जनवरी को लोहड़ी का त्योहार
ईरान की बात इसलिए, क्योंकि उत्तर भारत के राज्यों हरियाणा-पंजाब में इस वक्त लोहड़ी की धूम है और 13 जनवरी को ये त्योहार मनाया जाने वाला है. लोहड़ी यानी सर्दी की एक शाम एक जगह इकट्ठा होना, आग जलाना, उसमें नए अनाज की बालियां भूनना, मूंगफलियां और रेवड़ियां लुटाना और मिल-बांटकर खाना. भांगड़ा नृत्य जिसे पुरुष अपने दोस्तों-साथियों के साथ करते हैं तो महिलाएं करती हैं गिद्दा. पंजाबी इलाकों की लोहड़ी से जुड़ी ये पुरानी परंपरा है. 

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...लेकिन इसका ईरान से क्या कनेक्शन? लोहड़ी का कनेक्शन सीधा ईरान से नहीं है, लेकिन लोहड़ी मनाए जाने के पीछे जो सोच और जो पारंपरिक तरीका है उसका ईरान के साथ बहुत पुराना जुड़ाव रहा है. ईरान की संस्कृति में ऐसे त्योहार दर्ज हैं, जिनके तौर-तरीके-परंपराएं भारतीय उत्सवों से मेल खाते हैं. 

ईरान और भारत में कई त्योहार लगभग एक जैसे हैं.

जैसे पंजाब में लोहड़ी मनाई जाती है तो वहीं ईरान में जब साल खत्म हो रहा होता है उस दिन लोग एकत्र होकर आग जलाते हैं और इसमें मेवे चढ़ाते हैं. कहते हैं कि ऐसा करने से बीते साल की सारी बुराइयां आग में जलकर राख हो जाती हैं. फिर हम जिंदगी की राह में नई उम्मीदों के साथ बढ़ते हैं. आग के साथ जुड़ा यही भाव भारत में लोहड़ी के लिए है. 

Lohri Festival

आग की बात करें तो हर परंपरा ने आग यानी अग्नि को सबसे ऊपर माना है. सनातन परंपरा में जिन पांच तत्वों से प्रकृति के बनने की बात कही गई है, आग उनमें सबसे खास है, जो ऊर्जा का तत्व है चेतना देती है. ऋग्वेद में अग्नि ही प्रथम देव है और इसीलिए यज्ञ की परंपरा विकसित हुई. यह माना गया कि अग्नि को समर्पित प्रसाद या हविष्य ही अन्य देवताओं को भोग के रूप में मिलता है. ऋग्वेद की ऋचा कहती है 'इदं अग्नये इदं न मम.' 

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आग की इसी बात और त्योहार की भावना को लेकर ईरान चलें तो इस्लामिक देश में भी अग्नि को बहुत ही पवित्र माना गया है. लोहड़ी से मिलते-जुलते उनके त्योहार का नाम चहार-शंबे सूरी, जिसे लोग साल खत्म होने के आखिरी मंगलवार को परिवार और समाज के साथ सामूहिक रूप से मनाते हैं. लोग आग जलाते हैं उसे घेर के नाचते-गाते हैं. आग के ऊपर से छलांग लगाते हैं. फिर बारी आती है आग में तिल-शक्कर और सूखे मेवे डालने की, जो इस आग को और पवित्र बना देते हैं. 

आग को घेर कर खड़े ईरानी (फारसी) लोग फारसी में ये प्रार्थना गाते हैं-

'ऐ आतिश-ए-मुक़द्दस! ज़रदी-ए-मन अज़ तू सुर्ख़ी-ए-तू अज़ मन'

इसका मतलब है 'ऐ आग... देख तू हमारा ये पीलापन हमसे ले ले और अपनी ऊर्जा से भरी लालिमा हमारे जीवन में ला.'  आग से की गई ये कामना हम भारतीयों के कानों में पड़ती है तो ऋग्वेद की याद दिलाती है. जहां इस वेद के पहले मंडल को 12वें सूक्त का 9वां मंत्र इसी बात कुछ इस तरीके से कहता है. 
'यो अग्निं देववीतये हविष्मां आविवासति, तस्मै पावक मृलय्.'

भाव- 'जो यज्ञ करने वाले लोग देवों को यज्ञ सामग्री देने के लिए अग्नि को बुला रहे हैं, अग्निदेव आप आइये और उन लोगों को सुखी कीजिए. उन्हें प्रकाशित कीजिए.' 

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Lohri Festival

ईरान और भारत की साझी सांस्कृतिक विरासत
ईरान और भारत को इस तरह अपनी साझी विरासत के जिए एक करने वाला ये त्योहार नए आने वाले मौसम, फसल और नई ऊर्जा के स्वागत का त्योहार है. यह आग की ऊर्जा को खुद में बसा लेने की कामना है और इसमें दोनों जगहों पर अपनी स्थानीय खासियतें शामिल होकर इसकी रंगत को और निखार देती हैं. वैसे तो ईरान एक इस्लामी देश है लेकिन वहां का समाज अतीत की संस्कृति को भूला नहीं है और अग्नि आज भी वहां सबसे पहले, सबसे पवित्र मानी जाती. 


हालांकि बीते कुछ सालों में ईरानी शासन इस परंपरा को दबे अंदाज में कम करने की कोशिश करता रहा है. आग से जलने के खतरे का बहाना और अराजकता को ढाल बनाते हुए प्रशासन इसे लेकर हिदायतें जारी करता रहा है और इस त्योहार को संभलकर मनाने की नसीहत देता रहा है. लेकिन सभी जानते हैं कि पंरपराएं किसी राजा के राजपत्र से नहीं चलती हैं, वह तो बस बड़े पैमाने पर लोगों की भावनाओं के साथ जुड़कर चलती हैं.

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