‘द्रविड़’ शब्द को पहले संस्कृत ने जगह दी और फिर ईस्वी की पहली सहस्राब्दी तक आते-आते तमिलकम के संतों, विद्वानों, राजाओं और आम लोगों ने भी इसे गहराई से अपना लिया. इस तरह यह दक्षिण भारतीय तमिल भाषी लोगों की पहचान का शब्द बन गया. ये और बात है कि तमिल भाषा ने अपनी अलग पहचान खुद बनाई है, तमिल राष्ट्रवादी बीते सौ सालों में इस द्रविड़ शब्द को बाहरी की निगाह से देखते हैं. उनके हिसाब से यह बनावटी शब्द है, लेकिन वह यह भी मानते हैं कि उनकी यही द्रविड़ पहचान न सिर्फ बची रही है, बल्कि समय के साथ मजबूत भी हुई है.
तमिलों के लिए ‘द्रविड़ियन’ एक अंदरूनी साजिश
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि तमिलनाडु के ही नेता, राजनीतिक दल और आम लोग आज इसी द्रविड़ शब्द को स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में अपनाए हुए हैं. उन तमिलों के लिए ‘द्रविड़ियन’ एक अंदरूनी साजिश है, जिसे उजागर करना, हटाना और खत्म करना जरूरी है. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, यह स्वर और तेज होगा, तो सवाल यह है द्रविड़ कैसे और कब ‘द्रविड़ियन’ बना?
चोल, पांड्य और चेर जैसे तमिल राजवंशों के पतन और 1336 ईस्वी के बाद विजयनगर साम्राज्य के उदय के साथ, तमिलकम के पास कोई बड़ा स्थानीय शासक नहीं रहा. हालांकि तमिल भाषा कमजोर नहीं पड़ी. इस दौर में शिलालेखों की संख्या बढ़ी, दस्तावेज ज्यादा स्पष्ट हुए और इतिहास पहले से अधिक जीवंत दिखाई देने लगा. इसी समय तमिलकम को जमीन, भाषा, जातीय पहचान और धर्म के रूप में स्पष्ट तौर पर पहचाना गया.

विजयनगर की ‘द्रविड़’ कल्पना के भीतर तमिलकम का मतलब था, तमिल भाषी लोगों का पूरा एरिया, कावेरी घाटी, उसके आसपास के उपजाऊ इलाके, केरल और आंध्र के कुछ हिस्से और पूरी कोरोमंडल तटरेखा. कृष्णदेवराय से पहले के विजयनगर पीरियड के 576 से ज्यादा तमिल शिलालेख बताते हैं कि यह क्षेत्र साम्राज्य के लिए कितना महत्वपूर्ण था. ये शिलालेख मंदिरों, भूमि दानों और प्रशासनिक फैसलों को तमिल में दर्ज करते थे.
विजयनगर शासन में तमिलकम को तमिल मंडल की पहचान
विजयनगर शासन में तमिलकम को तमिल मंडल के रूप में नई पहचान मिली. यहां शासन नायकों के जरिए होता था, जिन्हें जिंजी, मदुरै, तंजावुर जैसे केंद्रों की जिम्मेदारी दी गई. बदले में वे सेना और टैक्स देते थे. खास बात यह थी कि शासक वर्ग भले ही तेलुगु या कन्नड़ भाषी था, लेकिन प्रशासन और भक्ति दोनों में तमिल का प्रयोग बना रहा. कृष्णदेवराय खुद तेलुगु कवि थे, लेकिन उन्होंने तमिल विद्वानों को भरपूर संरक्षण दिया.
श्रीरंगम और तिरुमला के मंदिरों में उनके समय के शिलालेख शुद्ध तमिल में हैं, जिनमें दान, कर माफी और निर्माण कार्यों का विवरण मिलता है. कृष्णदेवराय की प्रसिद्ध तेलुगु कृति 'अमुक्तमाल्यदा' तमिल संत आंडाल पर आधारित है और शासन, नीति और प्रशासन की गहरी चर्चा करती है. कृष्णदेवराय और तेनालीराम की कहानियां आज भी तमिल समाज की स्मृति में जीवित हैं.
विजयनगर खुद को दक्षिण में हिंदू धर्म का संरक्षक मानता था. इस सोच में ‘द्रविड़’ सिर्फ भाषाई नहीं, बल्कि ऐसा शब्द बना जिसका अर्थ 'दक्षिण भारत की पवित्र भूमि' बन गया. 1565 ईस्वी में तालिकोटा की लड़ाई के बाद विजयनगर के पतन के साथ ही मदुरै, जिंजी और तंजावुर के नायक स्वतंत्र शासक बन गए. इन दरबारों में तमिल, तेलुगु और संस्कृत का मिला-जुला रूप देखने को मिलता है. मदुरै नायकों के समय मीनाक्षी अम्मन मंदिर के भव्य गोपुरम बने, जिन्हें आज ‘द्रविड़ स्थापत्य’ की पहचान माना जाता है. प्रशासन में तेलुगु का प्रभाव बढ़ा, लेकिन मंदिरों, गलियों और गीतों में तमिल ही छाई रही.
1617 में तंजावुर में मराठों का आगमन
1676 ईस्वी में तंजावुर में मराठों के आगमन के साथ मराठी भाषा और संस्कृति भी जुड़ गई. सरफोजी द्वितीय जैसे शासकों ने तमिल, संस्कृत, तेलुगु और मराठी, चारों भाषाओं को संरक्षण दिया. सरफोजी द्वारा स्थापित सरस्वती महल पुस्तकालय में हजारों तमिल पांडुलिपियां आज भी सुरक्षित हैं. उन्होंने मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया, वैज्ञानिक नक्शे बनवाए और धार्मिक सहिष्णुता की मिसाल पेश की. तमिल पहचान इस बहुरंगी माहौल में भी कायम रही.
मदुरै सल्तनत के दौरान फारसी और अरबी प्रशासनिक भाषाएं बनीं, लेकिन यह असर बहुत कम समय ही रह पाया. विजयनगर की वापसी के साथ तमिल फिर केंद्र में आ गई. फिर भी, कुछ स्मृतियां जैसे दरगाह और सिक्के, इतिहास में दर्ज रह गईं.

हर दौर में संस्कृत सत्ता, धर्म और वैधता की भाषा बनी रही. शिलालेखों में अक्सर पहले संस्कृत और फिर तमिल का प्रयोग मिलता है. संस्कृत देवताओं से संवाद का जरिया बनी तो तमिल भक्तों से. दोनों मिलकर एक साझा सभ्यता रचती थीं.
यहां तक सब ठीक रहा, फिर अंग्रेज आए, व्यापार किया, शासन किया और फिर बांटा. मिशनरियों और अंग्रेज अफसरों ने भाषा और समाज को नए सांचे में ढालने की कोशिश की. एफ. डब्ल्यू. एलिस ने सबसे पहले दक्षिण भारतीय भाषाओं को संस्कृत से अलग एक परिवार बताया. रॉबर्ट कैल्डवेल ने 19वीं सदी में इसे ‘द्रविड़ियन’ नाम दिया. जीयू पोप ने तमिल साहित्य को यूरोप तक पहुंचाया. इस तरह आज भले ही तमिल, द्रविड़ और संस्कृत के बीच एक भीतरी असहमति जरूर है, लेकिन इसका असर आज भी कायम है. इस तरह द्रविड़, संस्कृत की एक शाखा बन जाती है, द्रविड़ियन औपनिवेशिक युग की गढ़ी हुई पहचान बनकर उभरता है और तमिल प्राचीन परंपरा बनकर रह जाती है.