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नवरात्रि में भोजपुरी के इन गीतों के बिना अधूरी है दुर्गा पूजा... जानिए क्या है 'पचरा' की परंपरा

बिहार और बंगाल की लोकपरंपराओं में देवी दुर्गा की पूजा में पचरा गीतों का विशेष स्थान है. ये गीत वीर रस में गाए जाते हैं और देवी के विभिन्न रूपों का वर्णन करते हैं. पचरा गीत न केवल भक्ति का माध्यम हैं बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक धरोहर भी है.

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नवरात्रि में देवी गीतों की भी अलग परंपरा है, बिहार-बंगाल में इसकी एक समृद्ध संस्कृति है
नवरात्रि में देवी गीतों की भी अलग परंपरा है, बिहार-बंगाल में इसकी एक समृद्ध संस्कृति है

बंगाल की शाक्त परंपरा में देवी दुर्गा की विभिन्न स्वरूपों में आराधना होती है और जैसे-जैसे माता के स्वरूप बदलते हैं, वैसे ही बदलती चली जाती है उनकी पूजा में शामिल लोकगीतों की शैली. विशुद्ध संस्कृति वाली शास्त्रीय परंपरा से हटकर ये लोकगीत देवी के चमत्कारों के साथ बहुत आत्मीयता से जुड़े होते हैं और अपने आप में पूजा की एक अनोखी पद्धति बन जाते हैं, जिसमें न आपको पंचोपचार पूजन करना है, न स्थापना, न मंत्र की अनिवार्यता और न ही किसी तरह के चढ़ावे की जरूरत.

गीत ही बन जाते हैं मां के लिए भेंट
श्रद्धालुओं के गीत ही मां के लिए भेंट बन जाते हैं, उनके ही प्राणों से प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है और इन गीतों मे ऐसी शक्ति होती है कि ये आदमी के अंतस (मन की भावना) को भेद डालती है. बिहार की लोकपरंपरा में शामिल लोकगीतों की इसी धारा में एक बड़ा ही प्रसिद्ध नाम है 'पचरा गीत', पचरा गीत खुद में देवी भवानी का उग्र उत्साही स्वरूप है और जब पचरा अपने उठान पर होता है तब देखिए गाने वाले-पचरा को सुनने वाले किस तरह झूमने लग जाते हैं.

असल में पचरा गीत खास तरह के प्रार्थना गीत हैं जो मुख्य रूप से वीर रस शैली में होते हैं. भोजपुरी भाषा में गाए जाने वाले ये गीत मुख्य रूप से देवी आदि शक्ति दुर्गा का रूप वर्णन, स्वरूप वर्णन, उनके साहसिक युद्धों का बखान और उनकी विजय में गायी जाने वाली स्तुति है. बिहार में माता एक रूप, देवी शीतला माता भी काफी प्रचलित हैं और उनकी भी स्तुति में पचरा गीत गाए जाते हैं. शीतला माता को चेचक (माता), खसरा (मीजल्स), और चिकनपॉक्स जैसे रोगों की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है. जब कोई इन बीमारियों से ग्रसित होता है तब रोग निवारण के लिए, रोगी के उसके उपचार और शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना के लिए पचरा गाया जाता है.

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पचरा गीत की एक बानगी यहां देखिए...

हस के उठे वि हस के माता,
जा चंदन पर थार भवानी,
नींबू जटा, जटा पर नरियर,
आस पास नरियर के बाड़ी,
केकती केवड़ा सदा सरवर,
सरवर देखत हंस विराजे,
हंस म दाई के पहुना साजे,
पहुना ऊपर दाई विराजे,

 

दाई के संग म भैरव साजे,
भैरव संग लंगूर विराजे,
अन्नस मन्नस कुंज निवारे,
धर्म ध्वजा लहराए …
लहराए ओ मैया,
सेवा में बाग लगाए हो मां,
सेवा में बाग लगाए, लगाए हो मईया,
सेवा मे बाग लगाए हो मां,
हे भवानी, सेवा में बाग लगाए हो मां,
ओ मेरी मैया, सेवा में बाग लगाए हो मां…

पचरा गीतों में वीर और उग्र रस की अधिकता होती है वहीं इनको गाने का स्टाइल कुछ-कुछ आज के रैप सॉन्ग जैसा होता है, लेकिन इसे रैप मत समझिए, इसकी हर अगली पंक्ति पहले वाली पंक्ति को उसके अर्थ के साथ पूरा करती है तो वहीं पंक्ति-दर-पंक्ति पचरा अपने उनवान पर चढ़ता जाता है. पचरा गीतों का संबंध पारंपरिक देवी गीतों से है, जैसे कि छठ पूजा के गीत, जो लोक देवी-देवताओं को समर्पित होते हैं. पचरा गीत में नीम के पेड़ का भी महत्व है. नीम शीतला माता का प्रिय माना जाता है. इसमें प्राकृतिक एंटीसेप्टिक गुण होते हैं, और यह चेचक के उपचार में बहुत उपयोगी है. कई पचरा गीतों में यह वर्णन मिलता है कि माता नीम के पेड़ के पास बैठी हैं या उस पर झूला झूल रही हैं.

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पौराणिक ग्रंथों में नहीं पचरा का जिक्र
वैसे पचरा गीत का जिक्र किसी पौराणिक ग्रंथ (जैसे पुराण, रामायण आदि) में नहीं मिलता, पर देवी-पूजा और भक्ति-संगीत का वर्णन अनेक ग्रंथों में मिलता है. देवी भागवत पुराण में उल्लेख है कि देवी की आराधना करते समय संगीत व नृत्य जरूर किया जाए. ऐसे ही उदाहरण पचरा गीतों के जन्म की वजह बनें. पचरा गीत सामाजिक समरसता का प्रतीक हैं; गांव के बड़े भी इन्हें सुनकर ताजगी और उल्लास महसूस करते हैं. महिलाएं खासकर झूला-नृत्य के साथ देवी की स्तुति करती हैं. पचरा गीत न सिर्फ एक लोकभक्ति विधा है, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर है जो देवी की महिमा गाते हुए समुदाय को एकजुट करता है. इन गीतों में लोकजीवन की सादगी, माँ दुर्गा के प्रति श्रद्धा और भोजपुरी संस्कृति का समृद्ध राग झलकता है​.

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