scorecardresearch
 

दास्तान-ए-आफताब... सूर्य देव की प्राचीन कहानियों से रोशन होगा जापान का ओसाका, World Expo 2025 में दास्तागोई कलेक्टिव का चयन

इस दास्तान में ऋग्वेद, उपनिषद, रामायण, सूर्य पुराण और महाभारत की पौराणिक कथाओं को मिस्र, रोम, चीन और जापान में सूर्य पूजा के ऐतिहासिक विवरणों के साथ जोड़ा गया है. मिस्र में, रा को सूर्य देवता के रूप में पूजा जाता था, जिन्हें अक्सर बाज के सिर के साथ उकेरा गया है.

Advertisement
X
दास्तान-ए-आफताब का जापान के ओसाका में प्रदर्शन
दास्तान-ए-आफताब का जापान के ओसाका में प्रदर्शन

भारत भर में मंच के जरिए लंबी-लंबी दास्तानों को सुनाने की परंपरा को जिंदा करने के साथ ही टीम दास्तानगोई कलेक्टिव इस विधा को विदेशी धरती पर भी प्रचारित-प्रसारित कर रही है. इसी कड़ी में कलेक्टिव के हिस्से एक और उपलब्धि आई है, जो न सिर्फ इसे बल्कि देश के लिए भी गर्व करने का मौका है. दस्तानगोई कलेक्टिव को विश्व एक्सपो 2025, ओसाका, जापान में भारत के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में चुना गया है. 

ओसाका के मंच 'उदित' होंगे सूर्यदेव
इस वैश्विक मंच पर, कलेक्टिव "दस्तान-ए-आफताब" प्रस्तुत करेगा, जो एक मंत्रमुग्ध कर देने वाली कथा है. यह कथा सूर्य की पौराणिक कथाओं, सांस्कृतिक कहानियों और भारत से लेकर मिस्र, रोम और जापान तक विभिन्न सभ्यताओं में सूर्य के प्रति सार्वभौमिक श्रद्धा को उजागर करती है. यह कहानी आज के विश्व में सौर ऊर्जा के महत्व और प्राचीन ज्ञान पर भी प्रकाश डालती है, जो सूर्य को पवित्र और जीवनदायी मानता था.

महमूद फारूकी द्वारा लिखित और निर्देशित, इस प्रभावशाली और रोचक दस्तान को दो महिला दस्तानगो पेश करेंगी. जिनके नाम हैं नुसरत अंसारी और सैयदा अमीना. इसकी प्रोडक्शन की जिम्मेदारी अनूषा रिजवी ने उठाई है, और भारत में अलग-अलग शहरों में इस दास्तान के रोचक सफल प्रदर्शन के बाद जापान की धरती इसकी गवाह बनेगी. यह प्रदर्शन न केवल सूर्य उपासना के व्यापक स्थलों का उल्लेख करता है, बल्कि इसके साथ ही भारत की समृद्ध मौखिक कथावाचन परंपरा को भी आगे बढ़ाते हुए एक नया आयाम देता है.

Advertisement

हर सभ्यता में पूज्यनीय रहे हैं सूर्य
यूं तो भारत में पहले से भी कथाओं की वाचन परंपरा रही है. पुराणों की पूरी कथाएं श्रुति परंपरा के तहत ही पीढ़ी दर पीढ़ी हम तक पहुंची है, फिर भी दास्तानगोई इससे मिलता-जुलता हुआ एक अलग ही फन है. सूर्य भारतीय पौराणिक कथाओं में नायक की तरह सामने आते हैं और उनकी उत्पत्ति के साथ ही सृष्टि के निर्माण की प्रक्रिया और उसमें विकास के होने का प्रक्रम आगे बढ़ता है. सूर्य से निकला सूर्यवंश पुराण कथाओं के नायकों के जन्म का वंश भी रहा है, इसके अलावा सूर्य हर सभ्यता में ही पूज्य रहा है. हिंदू सनातनी परंपरा में जिन्हें नारायण की संज्ञा मिली हुई है, दस्तान-ए-आफताब, इन्हीं सूर्यदेव की ही आकर्षक कथा है.

इस दास्तान में ऋग्वेद, उपनिषद, रामायण, सूर्य पुराण और महाभारत की पौराणिक कथाओं को मिस्र, रोम, चीन और जापान में सूर्य पूजा के ऐतिहासिक विवरणों के साथ जोड़ा गया है. मिस्र में, रा को सूर्य देवता के रूप में पूजा जाता था, जिन्हें अक्सर बाज के सिर के साथ उकेरा गया है. यह दिव्य पक्षी प्रकाश और जीवन का प्रतीक रहा है. आकाश में उनकी दैनिक यात्रा नवीकरण और पुनर्जनन का प्रतीक थी, और कोर्णाक मंदिर जैसे महत्वपूर्ण मंदिर उनकी पूजा के लिए समर्पित थे. रोम में, अपोलो न केवल संगीत और भविष्यवाणी के देवता थे, बल्कि सूर्य से भी जुड़े थे, जो प्रकाश, उपचार और सत्य का प्रतीक रहे हैं. रोमन धर्म में उनकी भूमिका को पालटाइन हिल पर अपोलो मंदिर के निर्माण के साथ औपचारिक रूप दिया गया, जो सूर्य और शासन के बीच दैवीय संबंध का प्रतीक था.

Advertisement

DastanGoi

ऊर्जा और चेतना के देवता हैं सूर्य
जापान में, अमातेरासु, सूर्य देवी, शिंटो को लेकर भी ऐसा ही विश्वास है. उन्हें विश्व में प्रकाश फैलाने का श्रेय दिया जाता है और फुतामिगौरा में उनकी पूजा की जाती है. कृषि और मौसम परिवर्तन पर उनके प्रभाव का उत्सव मनाने के लिए अनुष्ठान किए जाते हैं. यह कथा भारत और विश्व स्तर पर कला, वास्तुकला, साहित्य और दर्शन में सूर्य के चित्रण को भी दर्शाती है. अल-बरूनी जैसे विद्वानों की अंतर्दृष्टि पर आधारित, जिन्होंने इस्लामी खगोल विज्ञान में खगोलीय पिंडों के महत्व को सामने रखा, अबुल फजल, जिनके लेखन में मुगल साम्राज्य के सूर्य के प्रतीकवाद को अपनाया गया और बदायुनी, जिन्होंने उस युग की सांस्कृतिक सभ्यता को सामने रखा, सभी ने सूर्य को ऊर्जा और चेतना के देवता के रूप में रेखांकित किया है. 

दास्तानगोई का यह फन मुख्य रूप से फारस (वर्तमान ईरान) से उपजा और मुगल काल के दौरान भारत में लोकप्रिय हुआ. 16वीं और 17वीं शताब्दी में यह शाही दरबारों में मनोरंजन का प्रमुख साधन था. दास्तानगोई का सुनहरा युग उर्दू साहित्य के साथ जुड़ा है. प्रसिद्ध "दास्तान-ए-अमीर हम्ज़ा" इसकी सबसे प्रमुख कृति मानी जाती है. यह कहानियां बहादुरी, प्रेम, जादू, और रहस्य पर आधारित होती थीं. 

दास्तानगोई साहित्य के वाचिक प्रदर्शन का एक अनुपम मिश्रण है. 1928 में इस कला के अंतिम ज्ञात फनकार मीर बाकर अली के न रहने के बाद यह फन भी खत्म सा हो गया था, फिर उर्दू के महान आधुनिक लेखक, आलोचक और विद्वान शम्सुर रहमान फारुकी ने इस कला पर बीस वर्षों तक शोध किया. उनकी पुस्तकों ने महमूद फारूकी को इस कला को नए विचारों के साथ  इसे फिर से स्थापित करने के लिए प्रेरित किया. 

Advertisement

2005 से, महमूद फारुकी ने इस फन को कई लोगों को सिखाया और दर्जनों आधुनिक दस्तानें भी लिखीं और उनके प्रदर्शन के लिए फनकारों को तैयार किया. अपने पुनर्जनन के 20वें वर्ष में, दस्तानगोई अब भारत के सभी प्रमुख रंगमंच और साहित्य समारोहों में अनिवार्य भागीदार है. फारूकी और उनकी टीम ने अमेरिका, ब्रिटेन, उज्बेकिस्तान, दुबई, हांगकांग, सिंगापुर और पाकिस्तान में दस्तान प्रस्तुत किए हैं. दस्तानगोई अब मराठी, गुजराती और बंगाली में भी हो रही है. इस फन ने महाभारत, रामायण जैसे पौराणिक ग्रंथों से भी दास्तानें निकाल कर पेश की हैं. 

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement