ईरान में लारिजानी समेत कई बड़े नेताओं का खात्मा, अब कौन ले रहा युद्ध के फैसले?

ईरान में लगातार बड़े नेताओं-अधिकारियों की मौत के बाद सत्ता का संतुलन बिगड़ गया है. नए सुप्रीम लीडर से लेकर सैन्य कमांडर्स तक निशाने पर हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि देश की कमान अब किसके हाथ में है. क्या IRGC ने पूरी सत्ता संभाल ली है या पर्दे के पीछे कुछ और खेल चल रहा है?

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ईरान में अब कौन ले रहा युद्ध के फैसले. (Photo- ITG) ईरान में अब कौन ले रहा युद्ध के फैसले. (Photo- ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 19 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 9:18 AM IST

ईरान में जंग के हालात और ज्यादा गंभीर हो गए हैं. पहले सुप्रीम लीडर अली खामेनेई और कुछ सैन्य कमांडर्स की मौत हुई. इसके बाद एक इजरायली हमले में ईरान के सिक्योरिटी चीफ अली लारिजानी भी मारे गए और बसीज फोर्स के प्रमुख गुलामरेजा सुलेमानी की भी एक हमले में जान चली गई. अब सबसे बड़ा सवाल उठता है कि इन बड़े नेताओं के मारे जाने के बाद अब ईरान को कौन चला रहा है? ईरान की सेनाओं को कौन मैनेज कर रहा है और युद्ध के फैसले कौन कर रहा है?

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एक के बाद एक बड़े नेताओं और अधिकारियों की मौत ने ईरान की सत्ता के पूरे ढांचे को हिला दिया है. ऐसा लग रहा है जैसे देश की टॉप लीडरशिप को एक-एक करके खत्म किया जा रहा है. यह सिर्फ कुछ नेताओं की मौत नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित अभियान का हिस्सा माना जा रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक ईरान के नेशनल डिफेंस काउंसिल के प्रमुख, IRGC के कमांडर और रक्षा मंत्री जैसे अहम पदों पर बैठे लोग भी मारे जा चुके हैं.

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इसी बीच इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने दावा किया कि ईरान के इंटेलिजेंस मंत्री इस्माइल खातिब को भी एक हमले में "खत्म" कर दिया गया है. उन्होंने साफ चेतावनी दी कि यह अभियान अभी खत्म नहीं हुआ है और आगे और बड़े हमले हो सकते हैं.

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सबसे बड़ा सवाल - अब ईरान को कौन चला रहा है?

इन लगातार हमलों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ईरान की कमान अब किसके हाथ में है. ईरान ने 9 मार्च को मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर चुना था. हालांकि, तब से वह सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए हैं. खबरें तो यहां तक हैं कि हमले में उनके परिवार के कुछ सदस्य भी मारे गए या घायल हुए.

खुद मोजतबा खामेनेई को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं. दावा किया जाता है कि हमलों में मोजतबा खामेनेई के पैर में गंभीर चोट लगी है और उनका इलाज चल रहा है. उनकी गैरमौजूदगी ने इस अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है कि असल में फैसले कौन ले रहा है.

IRGC बना असली पावर सेंटर

ईरान में बड़े नेताओं और अधिकारियों के मारे जाने के बाद अब माना जा रहा है कि सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) पर आ गई है. IRGC को पहले से ही देश के भीतर एक अलग सत्ता माना जाता रहा है. इसके पास सेना, राजनीति और अर्थव्यवस्था तीनों पर गहरी पकड़ है. 

अब जब टॉप लीडरशिप पर लगातार हमले हो रहे हैं, माना जा रहा है कि IRGC ने खुद ही कमान संभाल ली है. कई विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल ईरान एक तरह से "मिलिट्री कंट्रोल" में चल रहा है, जहां असली फैसले सेना ले रही है. मसलन, नए सुप्रीम लीडर के चुनाव के दौरान भी IRGC कमांडर अहमद वाहिद का बड़ा प्रभाव सामने आया था.

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इस सत्ता संघर्ष में कुछ नए नाम भी सामने आ रहे हैं. इनमें एक नाम सादिक लारिजानी का है, जो अली लारिजानी के भाई हैं और सिस्टम के भीतर काफी प्रभाव रखते हैं. उन्हें एक संभावित अंतरिम नेता के तौर पर देखा जा रहा है, खासकर इसलिए क्योंकि वह IRGC के साथ तालमेल बैठा सकते हैं.

एक और नाम मोहम्मद बाघेर गालिबाफ का है. वह मौजूदा संसद अध्यक्ष हैं और IRGC से उनका पुराना रिश्ता रहा है. उनका सैन्य बैकग्राउंड उन्हें इस दौड़ में मजबूत बनाता है. बताया जाता है कि सेना से जुड़े कई अहम फैसलों में उनकी भूमिका होती है.

आधिकारिक तौर पर कौन संभाल रहा सरकार?

औपचारिक रूप से ईरान में एक तीन सदस्यीय काउंसिल बनाई गई है, जिसमें राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, वरिष्ठ धर्मगुरु अलीरेजा अराफी और न्यायपालिका प्रमुख गुलाम हुसैन मोहसिनी-एजेई शामिल हैं. लेकिन असल सवाल यही है कि क्या ये लोग वाकई फैसले ले रहे हैं या सिर्फ औपचारिक भूमिका निभा रहे हैं?

कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि पर्दे के पीछे IRGC का ही दबदबा है. मसलन, जब राष्ट्रपति पेजेशकियान ने हमलों के लिए खाड़ी मुल्कों से माफी मांगी थी, तो आईआरजीसी की तरफ से कड़ा विरोध दर्ज किया गया था और राष्ट्रपति को अपना बयान बदलना पड़ा था.

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सत्ता के अंदर भी टकराव

ईरान के अंदर भी इस वक्त एक तरह की खींचतान चल रही है. एक तरफ कट्टरपंथी गुट है, जो सख्त जवाब और आक्रामक रणनीति चाहता है. दूसरी तरफ कुछ नरमपंथी नेता हैं, जो बातचीत और संतुलन की बात करते हैं. पहले हसन रुहानी जैसे नेताओं का प्रभाव था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं और कट्टरपंथी ताकतें ज्यादा मजबूत होती दिख रही हैं. अली लारिजानी के बारे में भी बताया जाता है कि वह हसन रुहानी के करीबी थे.

क्या और ज्यादा कट्टर हो जाएगा ईरान?

विशेषज्ञों का मानना है कि जिस तरह से लगातार टॉप नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है, उससे ईरान की राजनीति और ज्यादा कट्टर हो सकती है. हर हमले के बाद नए नेता सामने आएंगे, लेकिन वे शायद पहले से ज्यादा आक्रामक रुख अपनाएं. इससे न सिर्फ ईरान, बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ सकता है.

मसलन, सिस्टम अभी भी काम कर रहा है, लेकिन असली ताकत अब धीरे-धीरे सेना के हाथों में जाती दिख रही है. आने वाले दिनों में यह तय करेगा कि ईरान स्थिर होता है या और ज्यादा उथल-पुथल की तरफ बढ़ता है.

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