नेपाल की जमीन पर 26 अगस्त की उस तबाही के जख्म दर्ज हैं, जिन्हें भरने में बहुत वक्त लगेगा. नेपाल के उत्तरी हिस्से में खुशहाली खिलखिलाती थी, जहां इंसानी बस्तियां पर्यटन का आसमान सजाती थीं, वहां अब दूसरी तस्वीर नजर आती है कि कैसे सब कुछ बह गया है.
इस भीषण त्रासदी में घर के घर गायब हो गए. बस्तियां या तो बह गईं या मलबे में ढह गईं. जो बच गए, वो खुशकिस्मत हैं. जब प्रलय बर्फ का पहाड़ टूटने के बाद त्रिशूली नदी में बाढ़ के रूप में आई, तो चंद जिंदगियां ऐसी थीं, जिन्होंने विनाश के इस बहाव के आगे सरेंडर करने से मना कर दिया और उन्हें बचाया गया. ये संख्या बहुत ज्यादा नहीं है. ये चंद लोग हैं, जिनकी जिंदगी नेपाल में बहती आफत के बाद अब शुरू हुए राहत के काम में बच पाई.
त्रिशूली नदी तिब्बत से निकलने वाली नदी है. ये नदी तिब्बत से नेपाल आती है. यह नदी अपने तेज बहाव और व्हाइट वाटर राफ्टिंग के लिए मशहूर रही है. लेकिन बुधवार को इसी त्रिशूली नदी में ऐसा तूफान और प्रलय आया, जिसने तबाही ला दी.
इस तबाही में 35 मोटरेबल ब्रिज, 45 सस्पेंशन ब्रिज और लगभग 40 किमी सड़क बुरी तरह प्रभावित हुई है. त्रिशूली नदी में पानी मलबे के साथ पूरे आवेग से आया. आवेग भी ऐसा, जिसके सामने कंक्रीट का एक ब्रिज नहीं टिक पाया.
बता दें, नेपाल में बाढ़ के बाद आई भारी तबाही में कई लोग जान गंवा चुके हैं, 1,500 से अधिक लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं. इस घटना के बाद 290 भारतीय नागरिकों से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है, जिनकी तलाश लगातार जारी है.
नेपाल में आई अचानक बाढ़ की वजह को लेकर शुरुआत में कई कयास लगाए गए. कभी भूकंप की बात हुई, कभी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का शक जताया गया.
वहीं, अब सैटेलाइट तस्वीरों और भूकंपीय आंकड़ों को मिलाकर जांच की गई तो कहानी कुछ और निकली है. नेपाल-तिब्बत सीमा के पास लिरुंग ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिरा था. इसी घटना ने आगे चलकर बाढ़ और मलबे की खतरनाक लहर पैदा की.
श्वेता सिंह