ईरान को कौन ज्यादा झुका पाया? ट्रंप या ओबामा, दो डील की कहानी

ईरान-अमेरिका डील आखिरकार फाइनल हो गया है. इस डील पर डिजिटल सिग्नेचर भी हो गया है. इसके साथ ही पश्चिम एशिया ने राहत की सांस ली है. लेकिन इतिहास और ट्रंप का मिजाज बताता है कि ये डील भी शंकाओं से खाली नहीं है. इससे पहले 2015 में भी तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के साथ एक डील साइन की थी. लेकिन मात्र दो से ढाई साल में ही ये समझौता सियासत की भेंट चढ़ गया था.

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ईरान के साथ US के दो राष्ट्रपतियों की 2 डील दो नजरिये की कहानी है. (Photo: ITG) ईरान के साथ US के दो राष्ट्रपतियों की 2 डील दो नजरिये की कहानी है. (Photo: ITG)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 16 जून 2026,
  • अपडेटेड 6:49 AM IST

दो राष्ट्रपति, दो पूरी तरह विपरीत रणनीतियां और लक्ष्य एक- ईरान की परमाणु महात्वाकांक्षा को चकनाचूर करना. बराक ओबामा ने कूटनीति और समझौते का रास्ता चुना, जबकि डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की बांह मरोड़ी, ने मैक्सिमम दवाब का रास्ता अपनाया. सवाल है कि ट्रंप और ओबामा में से किसका डील ईरान पर ज्यादा भारी था. 

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस डील को पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने संदेह की नजर से देखा है. उन्होंने कहा है कि, "इस बात पर संदेह है कि कोई भी नया समझौता उस समझौते से बहुत अलग या उसमें कोई बड़ा सुधार होगा, जो पहले हुआ था और जिस पर हमने लंबे समय तक काम किया था."

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ओबामा ने सकारात्मक संदेश देते हुए उम्मीद जताई है कि बमबारी रुकेगी और आम लोग अब युद्ध की वजह से परेशान नहीं होंगे. 

उन्होंने कहा कि, "पीछे मुड़कर देखें तो यह याद दिलाता है कि विदेश नीति की कई मुश्किल समस्याओं के मामले में, कभी-कभी यह सोच आकर्षक लग सकती है कि हम बस धौंस जमाकर या बमबारी करके समाधान निकाल सकते हैं. असल बात यह है कि कूटनीति का रास्ता अपनाने और ऐसे समझौते करने की संभावनाओं को पूरी तरह आज़माने के लिए समय निकालना ज़रूरी है, जो भले ही समस्या को 100 प्रतिशत हल न करें, लेकिन युद्ध की नौबत आए बिना 80-90 प्रतिशत समस्या का समाधान कर दें."

कूटनीति का ज्ञान देते हुए ओबामा ने कहा कि आपको लगेगा कि हमने अब तक यह सबक सीख लिया होगा, लेकिन ऐसा लगता है कि हमें समय-समय पर यह सबक फिर से सीखना पड़ता है. 

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दोनों राष्ट्रपतियों की डील का ईरान पर असर जानने से पहले इनके डील को अलग अलग समझना जरूरी है. 

ओबामा की डील

2013 से 2015 के बीच तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा के नेतृत्व में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी ने ईरान के साथ लंबी बातचीत की. नतीजा था 2015 का ऐतिहासिक परमाणु समझौता, जिसे आधिकारिक तौर पर JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) कहा गया. इस समझौते के तहत ईरान ने यूरेनियम संवर्धन की क्षमता सीमित करने, सेंट्रीफ्यूज की संख्या घटाने और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण स्वीकार करने पर सहमति दी. बदले में उस पर लगे कई आर्थिक प्रतिबंध हटा दिए गए. इस दौरान अली खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता थे.

यह समझौता ईरान के परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण रखने के लिए डिज़ाइन किया गया था. ईरान ने अपनी यूरेनियम संवर्धन क्षमता को सीमित करने, 98% संवर्धित यूरेनियम के स्टॉक को घटाने, दो-तिहाई सेंट्रीफ्यूज हटाने और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को अभूतपूर्व निरीक्षण की अनुमति देने पर सहमति जताई. 

बदले में अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने परमाणु संबंधी प्रतिबंध हटा दिए, जिससे ईरान को अरबों डॉलर की जब्त संपत्तियां वापस मिलीं. प्रतिबंध हटने से निर्यात बढ़ा. ओबामा प्रशासन का तर्क था कि इससे ईरान का ब्रेकआउट टाइम (परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त सामग्री जुटाने का समय) 2-3 महीने से बढ़कर एक साल हो गया. 

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शुरू में IAEA ने कहा कि ईरान समझौते का पालन कर रहा है. 

यह डील कूटनीतिक सफलता मानी गई क्योंकि इसमें कोई युद्ध नहीं हुआ और अंतरराष्ट्रीय सहमति बनी. हालांकि आलोचकों खासकर इजरायल और अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी का कहना था कि यह अस्थायी है. कई प्रावधान 10-15 साल बाद समाप्त हो जाते थे. मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रॉक्सी युद्ध पर कोई रोक नहीं थी और ईरान को आर्थिक राहत मिलने से उसकी क्षेत्रीय गतिविधियां बढ़ीं.  

ट्रंप की डील

2017 में अमेरिकी की सत्ता बदल गई. अब पावर रिपब्लिकन पार्टी के हाथों में आ गई थी. और इसके अगुआ थे ट्रंप. ट्रंप ने सत्ता संभालने के बाद इस समझौते को "सबसे खराब डील" बताया और अमेरिका को इससे बाहर निकाल लिया. 

इसके बाद शुरू हुई उनकी "मैक्सिमम प्रेशर" नीति. ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाए, तेल निर्यात को निशाना बनाया और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से उसे काफी हद तक अलग-थलग कर दिया. 2020 में ईरान के सबसे प्रभावशाली सैन्य कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी की अमेरिकी हमले में मौत ने दबाव को और बढ़ा दिया. 

ट्रंप का मानना था कि ओबामा की डील कमजोर थी और ईरान को आखिरकार बम बनाने के लिए राहें आसान कर रही थी. ट्रंप ने ईरान की बैंकिंग, शिपिंग और विदेशी कंपनियों पर सेकेंडरी सैंक्शंस लगाकर ईरान की इकोनॉमी को पंगु बना दिया. 

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ट्रंप का दावा था कि उनकी नीति ने ईरानी अर्थव्यवस्था को घुटनों पर ला दिया. वास्तव में ही ईरान की मुद्रा रियाल कमजोर हुई, महंगाई बढ़ी और तेल राजस्व में भारी गिरावट आई. प्रतिबंधों से ईरान कराहने लगा. लेकिन इसके बावजूद तेहरान नई और व्यापक परमाणु डील के लिए तैयार नहीं हुआ. इसके विपरीत अमेरिका के समझौते से बाहर निकलने के बाद ईरान ने धीरे-धीरे JCPOA की कई सीमाओं का उल्लंघन करना शुरू कर दिया और यूरेनियम संवर्धन का स्तर बढ़ा दिया और IAEA का निरीक्षण को सीमित करना शुरू कर दिया. 

एक बार फिर ईरान द्वारा परमाणु बम बनाने का ब्रेकआउट टाइम एक वर्ष से घटकर सप्ताह के स्तर तक आ गया. ईरान ने क्षेत्रीय हमले भी बढ़ाए, जैसे तेल टैंकरों पर हमले और प्रॉक्सी हमले. 

यहीं दोनों नेताओं के बीच सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है. ओबामा ने ईरान को ऐसी डील पर हस्ताक्षर करने के लिए राजी किया, जिसने उसके परमाणु कार्यक्रम पर वास्तविक और सत्यापित प्रतिबंध लगाए. दूसरी तरफ ट्रंप ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर कहीं ज्यादा दर्दनाक दबाव डाला, लेकिन उसे नई डील पर हस्ताक्षर कराने में सफल नहीं हुए. 

इसके बाद 2025 और 2026 में ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने हमला किया. इस हमले से न सिर्फ पश्चिम एशिया बल्कि भारत समेत पूरी दुनिया ही सहम गई. ईरान को इस हमले से तगड़ी चोट सहनी पड़ी, लेकिन वो युद्ध के मैदान में डटा रहा. हमले के पहले दिन यानी कि 28 फरवरी को ही अमेरिकी हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत हो गई थी.

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ट्रंप के डील में क्या है?

अमेरिका ईरान के इस नए डील के अनुसार:

1. होर्मुज स्ट्रेट फिर से खुलेगा

होर्मुज स्ट्रेट को सभी व्यावसायिक जहाजों के लिए खोला जाएगा. बदले में अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगी अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाएगा. यह समझौते का सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक आर्थिक पहलू है क्योंकि दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है.

2. ईरान को आर्थिक राहत

अमेरिका अंतिम समझौते तक ईरान पर नए प्रतिबंध नहीं लगाएगा. साथ ही ईरानी तेल निर्यात पर कुछ प्रतिबंधों में छूट दी जाएगी ताकि तेहरान फिर से तेल बेच सके और राजस्व कमा सके.

3. अरबों की फ्रीज की संपत्ति रिलीज होगी

अमेरिका ईरान की लगभग 25 अरब डॉलर की फ्रीज की गई संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से जारी करने पर सहमत हुआ है. इसमें नकद हस्तांतरण, क्षेत्रीय वित्तीय व्यवस्था और क्रेडिट लाइनों का उपयोग शामिल है.

4. परमाणु हथियार नहीं बनाएगा ईरान

ईरान ने सिद्धांततः और प्रतिबद्धता के साथ यह स्वीकार किया है कि वह परमाणु हथियार न तो बनाएगा और न ही हासिल करेगा. साथ ही यूरेनियम संवर्धन को आगे नहीं बढ़ाएगा और नई परमाणु सुविधाओं का विस्तार नहीं करेगा.

5. 60 दिनों में अंतिम परमाणु समझौते पर बातचीत

यह MoU अंतिम परमाणु डील नहीं है. दोनों पक्षों ने 60 दिनों की वार्ता अवधि तय की है, जिसमें यूरेनियम संवर्धन, उच्च संवर्धित यूरेनियम के भंडार और प्रतिबंधों को हटाने की रूपरेखा पर अंतिम समझौता होगा. 

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ट्रंप के क्या तर्क हैं?

ईरान पर अपनी नीतियों को डिफेंड करते हुए ट्रंप ने हाल ही में ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा था कि बराक हुसैन ओबामा की ईरान के साथ हुई डील, यानी JCPOA, परमाणु हथियार हासिल करने का एक आसान, शानदार और सीधा रास्ता थी. अगर वह डील रहती, तो ईरान के पास छह साल पहले ही परमाणु हथियार आ गए होते और उसने उनका इस्तेमाल भी बहुत पहले कर लिया होता."

उन्होंने कहा कि ईरान के साथ उनका समझौता ठीक इसके उलट है. यह परमाणु हथियार न होने देने की एक दीवार है. असल में अब वे परमाणु हथियार चाहते ही नहीं हैं और न ही उन्हें यह मिलेगा. चाहे खरीदकर, बनाकर या किसी और तरीके से हासिल करके. 

कौन ज्यादा झुका पाया?

ओबामा की डील ने छोटी अवधि के लिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम को तो रोक दिया, ईरान के न्यूक्लियर केंद्रों में IAEA के निरीक्षण भी बढ़ गए, लेकिन इस समझौते में लंबे समय की कमजोरियां भी छोड़ दीं. इसलिए ईरान को मौका मिलने ही उसने अपना परमाणु कार्यक्रम फिर से शुरू कर दिया. अब ट्रंप ने दावा किया है कि इस बार अमेरिका ईरान का न्यूक्लियर डस्ट भी समय के साथ उठाकर ले जाएगा. 

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ओबामा की नीतियों ने ईरान पर दबाव तो जरूर बनाया लेकिन ईरान का परमाणु कार्यक्रम रुका नहीं. ईरान ने दबाव सहा और प्रतिक्रिया दी, जिससे तनाव बढ़ा. 

कुछ विश्लेषकों के अनुसार ट्रंप की सख्ती ने ईरान को कमजोर किया, जबकि ओबामा ने समझौते से अस्थायी नियंत्रण हासिल किया. ओबामा की डील कूटनीति की मिसाल थी, ट्रंप की नीति शक्ति प्रदर्शन की. ईरान दोनों मामलों में पूरी तरह नहीं झुका. वह अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा और परमाणु महत्वाकांक्षा को बनाए रखने में सफल रहा. लेकिन 2026 में हुए ईरान और अमेरिका के समझौते से पश्चिम एशिया का परमाणु परिदृश्य बदल सकता है. लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि ईरान परमाणु मुद्दा आज भी जटिल है. 

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