पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक और ममता बनर्जी के सबसे पुराने सहयोगियों में शामिल मदन मित्रा ने बुधवार को विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के खेमे का दामन थाम लिया. हालांकि उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी है, बल्कि सिर्फ अपना खेमा बदला है.
पाला बदलने के बाद अपने पहले इंटरव्यू में मदन मित्रा ने इस फैसले के लिए सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि पार्टी में जो कुछ हुआ, उसके लिए अभिषेक बनर्जी जिम्मेदार हैं. कई वरिष्ठ नेता भी इसी वजह से ममता बनर्जी के खेमे से दूर हुए हैं.
उन्होंने आगे कहा, 'मैंने इस मुद्दे को कई बार ममता बनर्जी के सामने उठाया, लेकिन कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया. मुझे ममता बनर्जी का खेमा छोड़ने का अफसोस है लेकिन परिस्थितियां हमारे पक्ष में नहीं थीं.'
कमारहाटी से विधायक मदन मित्रा ने पार्टी की मौजूदा कार्यशैली पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा, 'पहले पार्टी में सिर्फ एक ही पद था और वह थीं ममता बनर्जी. अब ममता बनर्जी के साथ बाकी लोग सिर्फ लैम्पपोस्ट (नाममात्र) बनकर रह गए हैं और अभिषेक बनर्जी ही एकमात्र पद हैं.'
हालांकि उन्होंने ममता बनर्जी के प्रति सम्मान जताते हुए कहा कि उनका फैसला किसी व्यक्तिगत नाराजगी का परिणाम नहीं है. उन्होंने दोहराया कि वह अब भी खुद को तृणमूल कांग्रेस का ही विधायक मानते हैं और उनकी लड़ाई पार्टी की मूल विचारधारा को लेकर है.
बता दें कि मदन मित्रा का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह 1998 में टीएमसी की स्थापना के समय से ही ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में रहे हैं. परिवहन, खेल और अंतर्देशीय जल परिवहन जैसे विभागों के मंत्री रह चुके मित्रा लंबे समय तक पार्टी का जनाधार मजबूत करने वाले नेताओं में गिने जाते रहे हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मदन मित्रा के इस फैसले से ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट को बड़ी मजबूती मिलेगी. वहीं, यह ममता बनर्जी के संगठनात्मक नेतृत्व के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर खींचतान लगातार बढ़ती जा रही है.
अनिर्बन सिन्हा रॉय