नाजियों के जुल्म की कहानी सुनाने के लिए एडल्ट कंटेंट क्रिएटर को बनाया एंबेसडर, पोलैंड में मचा बवाल

पोलैंड में इस फैसले की घोषणा होते ही सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए. आलोचकों ने सवाल उठाए कि पोलैंड के इतिहास की इतनी संवेदनशील घटना को बताने के लिए एडल्ट कंटेंट से जुड़ी सोशल मीडिया हस्ती को चुनना कितना सही है.

Advertisement
पोलैंड में मोनिका का तगड़ा विरोध हुआ है. (Photo:X/@OlenaRohoza) पोलैंड में मोनिका का तगड़ा विरोध हुआ है. (Photo:X/@OlenaRohoza)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 21 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 9:31 PM IST

पोलैंड में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सोशल मीडिया से लेकर राजनीति की दुनिया तक में तीखी बहस छेड़ दी है. यहां 1944 के ऐतिहासिक वारसा विद्रोह की याद को लोगों तक पहुंचाने के लिए एक एडल्ट कंटेंट क्रिएटर को एम्बेसडर बनाया गया था. 

जिस युवती को इस अभियान से जोड़ा गया था, उसका नाम मोनिका लास्कोव्स्का है,  पोलैंड में वह एडल्ट कंटेट क्रिएटर के तौर पर जानी जाती हैं. वारसा विद्रोह की 82वीं वर्षगांठ से जुड़े अभियान के तहत Warszawa44 नाम के संगठन ने उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट की. तस्वीर में वह विद्रोह की याद में बनी टी-शर्ट पहने नजर आईं और उन्हें ‘Ambassador of Remembrance’ बताया गया. 

Advertisement

मोनिका ओनली फैंस नाम के प्लेटफॉर्म के लिए कंटेंट बनाती हैं. OnlyFans एक सब्सक्रिप्शन प्लेटफ़ॉर्म है जो मुख्य रूप से एडल्ट कंटेंट से जुड़ा हुआ है.

रसिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार पोलैंड में सोशल मीडिया पर यह तस्वीर वायरल होते ही लोगों ने इसका जबर्दस्त विरोध किया. इसके बाद आयोजकों को अपना फैसला वापस लेना पड़ा. और प्रोग्राम से मोनिका को हटा दिया गया. 

क्या है वारसा विद्रोह?

वारसा विद्रोह पोलैंड के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है. 1 अगस्त 1944 को पोलिश प्रतिरोध आंदोलन के लड़ाकों ने नाजी जर्मनी के कब्जे से राजधानी वारसा को आजाद कराने के लिए विद्रोह शुरू किया था. उस समय सोवियत सेना भी शहर के करीब पहुंच रही थी. 

बता दें कि नाजियों ने द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होते ही पोलैंड पर कब्जा कर लिया था. यहां के यहूदियों पर नाजियों ने इतिहास की क्रूरतम यातनाओं में से एक को अंजाम दिया था. 

Advertisement

लेकिन मौका देखते ही पोलिश लड़ाकों ने पोलैंड को नाजियों के कब्जे से आजाद करने के लिए युद्ध शुरू किया था. पोलिश लड़ाकों ने करीब 63 दिनों तक जर्मन सेना का मुकाबला किया, लेकिन आखिरकार विद्रोह को कुचल दिया गया. 

इस दौरान वारसा शहर का बड़ा हिस्सा तबाह हो गया और करीब 1.5 से 2 लाख नागरिकों की मौत हुई. इसलिए पोलैंड में इस विद्रोह की स्मृति को राष्ट्रीय इतिहास का बेहद संवेदनशील हिस्सा माना जाता है. 

सोशल मीडिया की पहुंच के लिए चुना गया था

Warszawa44 ने लास्कोव्स्का को चुनने की वजह बताते हुए कहा कि वह एक चर्चित सार्वजनिक शख्सियत हैं और सोशल मीडिया पर उनकी अच्छी पहुंच है. संगठन के मुताबिक वह खुद भी वारसा विद्रोह की याद को आगे बढ़ाने के लिए तैयार थीं. 

लेकिन घोषणा होते ही सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए. आलोचकों का कहना था कि राष्ट्रीय इतिहास की इतनी गंभीर घटना को प्रचारित करने के लिए एडल्ट कंटेंट से जुड़ी सोशल मीडिया हस्ती को चुनना उचित नहीं है.

रसिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार पोलैंड की चर्चित मीडिया हस्ती करोलिना कोर्विन-पियोटोव्स्का ने भी इस फैसले की आलोचना की. उनके पिता वारसा विद्रोह में लड़ चुके थे. उन्होंने आरोप लगाया कि आयोजक ऐतिहासिक स्मृति के बजाय सोशल मीडिया की पहुंच और विवाद से लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. 

Advertisement

सरकार ने बनाई दूरी

विवाद बढ़ने के बाद पोलैंड के संस्कृति मंत्रालय ने इस फैसले से दूरी बना ली. मंत्रालय ने कहा कि एम्बेसडर्स की सूची तैयार करने से पहले उससे सलाह नहीं ली गई थी. मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अभियान को उसका औपचारिक संरक्षण जरूर मिला था, लेकिन उसने इसके लिए कोई वित्तीय सहायता नहीं दी थी. 

आखिरकार Warszawa44 के अध्यक्ष डेरियुश मिचालाक ने पुष्टि की कि लास्कोव्स्का को संगठन ने खुद चुना था. विवाद बढ़ने के बाद संगठन ने उनका ‘Ambassador of Remembrance’ का दर्जा निलंबित कर दिया और सोशल मीडिया से उनकी तस्वीर भी हटा दी. 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »