हूटर बजते ही भारतीय खेमे में जैसे सब कुछ थम गया. जिस पदक के लिए खिलाड़ियों ने महीनों पसीना बहाया था, जिस सपने को लेकर वे विश्व कप में उतरी थीं, वह आंखों के सामने छूट गया. डगआउट में बैठी भारत की सबसे अनुभवी खिलाड़ी सविता पूनिया और उनकी साथी गोलकीपर बिछू देवी अपने आंसू नहीं रोक सकीं. ठीक पीछे बैठी इशिका चौधरी को तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि अपने पहले ही विश्व कप में पदक के इतने करीब पहुंचकर टीम सेमीफाइनल की दौड़ से बाहर हो गई.
ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दूसरे चरण का मुकाबला ड्रॉ (0-0) रहा. दोनों टीमों के अंक बराबर रहे, लेकिन गोल अंतर ने भारत की राह रोक दी. मैदान पर खिलाड़ी आखिरी सीटी तक जूझती रहीं, लेकिन गोल नहीं आया और इसके साथ ही सेमीफाइनल का सपना भी टूट गया.
मैच के बाद का मंजर और भी भावुक था. मैदान से निकलकर टीम बस का इंतजार कर रही खिलाड़ियों की आंखें लाल थीं. कोई चुपचाप बैठी थी, तो कोई साथियों से लिपटकर अपने आंसू छिपाने की कोशिश कर रही थी. चेहरे बता रहे थे कि इस एक नतीजे ने उनके भीतर कितना कुछ तोड़ दिया है.
मुख्य कोच शोर्ड मारिन मीडिया से बात कर रहे थे, लेकिन उनकी आवाज और चेहरे पर छाई उदासी भी खिलाड़ियों के दर्द को छिपा नहीं सकी. टीम के वैज्ञानिक सलाहकार और एथलीट परफॉर्मेंस प्रमुख वेन लोम्बार्ड के साथ सीनियर खिलाड़ी पहली बार विश्व कप खेल रही साथियों का हौसला बढ़ा रहे थे.
भारतीय टीम में 11 खिलाड़ियों के लिए यह पहला विश्व कप था. वे इतनी बड़ी उम्मीद के साथ यहां पहुंची थीं और सेमीफाइनल के इतने करीब आकर बाहर होने का दर्द शायद उनके लिए शब्दों से परे था.
सीढ़ियों पर बैठकर फोन पर अपनी मां से बात कर रही एक खिलाड़ी ने अपने दर्द को सिर्फ एक वाक्य में बयां कर दिया. उसने कहा, 'यह सबसे अच्छा मौका था. हम इतने करीब पहुंच गए थे और अब पता नहीं कब ये मौका मिलेगा.'
तीसरा विश्व कप खेल रही सविता पूनिया चुपचाप खड़ी थीं. उनके पास कहने को ज्यादा कुछ नहीं था. वह सिर्फ इतना कह सकीं, 'यह सर्वश्रेष्ठ मौका था.'
अनुभवी मिडफील्डर नेहा गोयल के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. जब उनसे कहा गया कि आगे एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतना है, तो उन्होंने सिर्फ सिर हिलाकर ‘हां’ कहा. शायद उस वक्त शब्दों से ज्यादा उनकी आंखें बोल रही थीं.
भारत की महिला हॉकी टीम ने विश्व कप में कभी पदक नहीं जीता है. उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 1974 में फ्रांस में खेले गए पहले विश्व कप में आया था, जब टीम चौथे स्थान पर रही थी. अब 27 अगस्त को पांचवें-छठे स्थान के लिए मुकाबला खेलना है. जीत भारत को विश्व कप में उसका सर्वश्रेष्ठ स्थान दिला सकती है, लेकिन खिलाड़ियों के लिए उस वक्त यह सांत्वना काफी नहीं थी.
उन्हें ढांढस देने के लिए जब यह बताया गया कि पांचवां स्थान भी भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन होगा, तो एक खिलाड़ी का जवाब दिल छू गया- 'पदक तो पदक ही होता है ना.'
कप्तान सलीमा टेटे ने भी टीम की भावनाओं को सामने रखा. उन्होंने कहा, 'हम खुश नहीं हैं क्योंकि पदक के इतने करीब आने के बाद चूकना नहीं था. हमने इसके लिए इतनी मेहनत की थी. अच्छा भी खेले, लेकिन फिनिश नहीं कर पाए.'
सलीमा ने कहा कि टीम हार में भी साथ है और जीत में भी. उन्होंने कहा, 'हमें इससे सीख मिली है कि कोई मौका नहीं गंवाना है. अब पांचवें स्थान के लिए खेलना है और दोबारा वापसी करेंगे. हमने अभी तक जुझारूपन नहीं छोड़ा है और इस आखिरी मैच में भी नहीं छोड़ेंगे.'
उन्होंने माना कि यह दिन उनकी टीम का नहीं था, जबकि इससे पहले खिलाड़ियों ने हर मैच में बेहतरीन प्रदर्शन किया था.
सलीमा ने कहा, 'इतने बड़े मंच पर आप खेल रहे हैं तो यहां आकर खाली हाथ जाना अच्छा नहीं लग रहा. लेकिन हम टीम का मनोबल बढ़ाएंगे और पांचवां स्थान लेकर ही जाएंगे.'
पदक इस बार भी भारत की पहुंच से दूर रह गया. लेकिन हूटर के बाद बहते आंसुओं के बीच इस टीम की एक तस्वीर जरूर रह गई.एक ऐसी भारतीय टीम की, जिसने आखिरी पल तक लड़ाई लड़ी, पदक के दरवाजे तक पहुंची, लेकिन उसे छूने से पहले ही सपना आंखों के सामने छूट गया.
आजतक स्पोर्ट्स डेस्क