भारतीय क्रिकेट में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन खिलाड़ी कब फिट होगा. असली सवाल है... फिट होने के बाद वह कितने दिन तक फिट रहेगा?
क्योंकि चार महीने बाद खिलाड़ी की वापसी की खबर जरूर अच्छी लगती है, लेकिन अगर वह कुछ मैच खेलकर फिर उसी या किसी दूसरी चोट के कारण बाहर हो जाए तो उस जल्दबाजी का मतलब क्या है? यही वह सवाल है जिसने अब टीम इंडिया के चोट प्रबंधन व्यवस्था (Injury Management System) पर बहस छेड़ दी है.
इस बहस के बीच भारतीय टीम के फिजियोथेरेपिस्ट कमलेश जैन का कॉन्ट्रैक्ट खत्म किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है. जैन फिलहाल नोटिस पीरियड पर हैं और उनकी जगह जल्द नया मेडिकल सपोर्ट स्टाफ लाए जाने की बात सामने आई है. यह बदलाव ऐसे वक्त हुआ है जब भारतीय टीम में फिटनेस और चोट को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. हालांकि जैन के फैसले को सीधे किसी खिलाड़ी की चोट से जोड़ना उचित नहीं होगा.
सवाल चोट का नहीं, ‘इंजरी साइकिल’ का है
तेज गेंदबाजों का चोटिल होना क्रिकेट का हिस्सा है. लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब एक खिलाड़ी चोट से लौटता है, रिहैब पूरा करता है और फिर दोबारा मेडिकल रूम पहुंच जाता है.
यहीं से तीन सवाल पैदा होते हैं- क्या क्या चोट की सही पहचान ( Diagnosis) हुई थी? क्या रिहैब में ही खामी थी? और क्या वापसी का फैसला समय से पहले तो नहीं कर दिया गया?
यही वजह है कि अब ‘जल्दी वापसी’ की सोच पर भी सवाल उठना चाहिए. चार महीने में लौटाने से बेहतर है छह महीने लगें, लेकिन खिलाड़ी ऐसी स्थिति में लौटे कि अगली चोट के डर के बिना लगातार खेल सके.
किसी खिलाड़ी की उपलब्धता को सिर्फ कैलेंडर से नापना खतरनाक हो सकता है. असली सफलता यह नहीं कि वह चार महीने बाद मैदान पर खड़ा हो गया. असली सफलता यह है कि वह चार महीने, छह महीने या एक साल बाद भी मैदान पर मौजूद रहे.
बुमराह का मामला सबसे ताजा उदाहरण
जसप्रीत बुमराह भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े उदाहरणों में से एक हैं कि फिटनेस का फैसला कितना पेचीदा हो सकता है. जुलाई 2026 में इंग्लैंड के खिलाफ वनडे के दौरान बाएं घुटने में चोट लगने के बाद वह श्रीलंका टेस्ट सीरीज से बाहर हो गए. बीसीसीआई सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (COE) में रिहैब के बावजूद वह समय पर पूरी तरह फिट नहीं हो पाए.
अब सितंबर में फिर उनकी फिटनेस चर्चा में है. अफगानिस्तान टी20 सीरीज और एशियन गेम्स के लिए उनका नाम है, लेकिन उनकी उपलब्धता को लेकर फिटनेस आकलन अहम रहा. हालिया रिपोर्टों के मुताबिक बुमराह ने फिटनेस टेस्ट पास कर लिया है और चयन के लिए उपलब्ध हैं.
यही बताता है कि सवाल सिर्फ ‘फिट है या नहीं’ का नहीं है. सवाल यह भी है कि कितने वर्कलोड के लिए फिट है?
प्रसिद्ध से शमी तक, लॉन्ग रिहैब कोई नई बात नहीं
प्रसिद्ध कृष्णा का केस भी इसी बहस में महत्वपूर्ण है. 2023 में वह सर्जरी के लिए न्यूजीलैंड गए थे और बाद में बीसीसीआई के मेडिकल अपडेट में बताया गया कि वह जसप्रीत बुमराह के साथ NCA में रिहैब कर रहे थे. कृष्णा ने खुद बताया था कि सर्जरी के बाद दोबारा बॉलिंग तक पहुंचने में करीब 24-26 हफ्ते लगे.
यानी यहां ‘जल्दी लौटने’ की जगह लंबी प्रक्रिया का उदाहरण सामने आता है.
मोहम्मद शमी का मामला भी याद कीजिए. एड़ी की सर्जरी के कारण वह लंबे समय तक क्रिकेट से बाहर रहे. 2024 IPL से भी वह बाहर थे.
और फिर ऋषभ पंत हैं. दिसंबर 2022 के भयानक हादसे के बाद कई सर्जरी और करीब 14 महीने की रिहैब के बाद उन्होंने वापसी की. उन्हें जल्दबाजी में नहीं, लंबी प्रक्रिया से तैयार किया गया.
इन मामलों से साफ है कि लंबा रिहैब हमेशा बुरा नहीं होता. कई बार खिलाड़ी को पूरी तरह ठीक होने के लिए ज्यादा समय देना जरूरी होता है.
हर्षित राणा का ताजा मामला भी सवाल छोड़ गया
2026 में हर्षित राणा का मामला इस बहस को और ताजा करता है. वह पहले हैमस्ट्रिंग चोट के कारण T20 वर्ल्ड कप और IPL से बाहर रहे. वापसी के बाद फिटनेस टेस्ट के दौरान उन्हें फिर हैमस्ट्रिंग चोट लगी और वह अफगानिस्तान सीरीज के अलावा एशियन गेम्स से भी बाहर हो गए.
यहीं ‘इंजरी साइकिल’ शब्द सबसे ज्यादा मायने रखता है. अगर खिलाड़ी रिहैब के बाद लौटता है और फिटनेस टेस्ट में ही फिर चोटिल हो जाता है, तो सवाल सिर्फ उसकी किस्मत पर नहीं छोड़ा जा सकता. पूरी प्रक्रिया की समीक्षा जरूरी है- ट्रेनिंग, वर्कलोड, रिकवरी, चोट की पहचान और रिहैब, सबकी.
अब फैसला ‘जल्दी’ नहीं, ‘सही’ वापसी का होना चाहिए
भारतीय क्रिकेट के पास दुनिया की सबसे मजबूत क्रिकेट व्यवस्था और आधुनिक मेडिकल सुविधाएं हैं. ऐसे में कोशिश सिर्फ खिलाड़ी को जल्द मैदान पर लौटाने की नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह फिट करके वापस लाने की होनी चाहिए.
विश्व मोहन मिश्र