भारत का आर्टिफिशियल सूरज ट्रायल में Pass! असली सूर्य से 20 गुना ज्यादा गर्म

भारत के SST-1 टोकामक पर नया 82.6 गीगाहर्ट्ज जाइरोट्रॉन लगा. यह कृत्रिम सूर्य प्लाज्मा को और बेहतर तरीके से गर्म करेगा. तापमान सूर्य से कई गुना ज्यादा है.

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ये आर्टिफिशियल सूरज की काल्पनिक तस्वीर है. (Photo: Getty) ये आर्टिफिशियल सूरज की काल्पनिक तस्वीर है. (Photo: Getty)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 14 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:36 PM IST

भारत न्यूक्लियर फ्यूजन एनर्जी के क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहा है. गुजरात स्थित प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान के SST-1 टोकामक पर एक नया शक्तिशाली जाइरोट्रॉन चालू कर दिया गया है. यह 82.6 गीगाहर्ट्ज फ्रिक्वेंसी और 400 किलोवाट क्षमता वाला उपकरण है. 

SST-1 भारत का सुपरकंडक्टिंग फ्यूजन रिएक्टर है जिसे सूर्य जैसी प्रक्रिया दोहराने के लिए बनाया गया है. इसमें चुंबकीय क्षेत्रों की मदद से बेहद गर्म प्लाज्मा को नियंत्रित किया जाता है. भारतीय प्रयोगों में प्लाज्मा का तापमान 20 करोड़ डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा पहुंच चुका है जो सूर्य के केंद्र से कई गुना गर्म है. नया जाइरोट्रॉन इस प्लाज्मा को और प्रभावी तरीके से गर्म करने तथा लंबे समय तक स्थिर रखने में मदद करेगा.

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जाइरोट्रॉन क्या है और कैसे काम करता है? 

जाइरोट्रॉन एक खास तरह का उपकरण है जो हाई फ्रिक्वेंसी वाली माइक्रोवेव एनर्जी पैदा करता है. इस ऊर्जा को टोकामक के अंदर प्लाज्मा में इंजेक्ट किया जाता है जिससे प्लाज्मा और गर्म हो जाता है. पहले SST-1 पर 42 गीगाहर्ट्ज वाला सिस्टम काम कर रहा था. नया 82.6 गीगाहर्ट्ज वाला जाइरोट्रॉन उससे कहीं ज्यादा बेहतर हीटिंग क्षमता प्रदान करता है. फ्यूजन प्रक्रिया में सिर्फ तापमान पहुंचाना काफी नहीं होता. 

असली चुनौती प्लाज्मा को लंबे समय तक नियंत्रित और स्थिर रखना है ताकि ऊर्जा पैदा की जा सके. नया उपकरण वैज्ञानिकों को इस दिशा में बेहतर प्रयोग करने का मौका देगा. इससे प्लाज्मा की स्थिरता बढ़ेगी और शोधकर्ता ज्यादा समय तक उच्च तापमान वाले प्लाज्मा का अध्ययन कर सकेंगे.

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फ्यूजन ऊर्जा का महत्व और भारत की स्थिति

फ्यूजन ऊर्जा भविष्य की सबसे स्वच्छ और स्थायी एनर्जी सोर्सेस में से एक मानी जाती है. इसमें ईंधन के रूप में हाइड्रोजन के आइसोटोप इस्तेमाल होते हैं जो समुद्री जल से आसानी से मिल सकते हैं. पारंपरिक परमाणु ऊर्जा यानी फिशन की तुलना में इसमें लंबे समय तक रहने वाला रेडियोधर्मी कचरा बहुत कम पैदा होता है. 

व्यावसायिक स्तर पर फ्यूजन पावर प्लांट बनाना अब भी बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती है. SST-1 अभी बिजली पैदा नहीं कर रहा है. यह शोध रिएक्टर है जिसकी मदद से वैज्ञानिक फ्यूजन तकनीक को समझने और नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं. नया जाइरोट्रॉन भारत की क्षमता को मजबूत करेगा और देश को अंतरराष्ट्रीय फ्यूजन अनुसंधान में आगे बढ़ाएगा.

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आगे की संभावनाएं और चुनौतियां

यह उपलब्धि दिखाती है कि भारत धीरे-धीरे लेकिन लगातार फ्यूजन प्रौद्योगिकी में महारत हासिल कर रहा है. SST-1 जैसे प्रयोगों से मिले अनुभव भविष्य में बड़े रिएक्टर बनाने में काम आएंगे. वैज्ञानिकों को प्लाज्मा को और लंबे समय तक स्थिर रखने तथा ऊर्जा उत्पादन के करीब पहुंचने के लिए और कई तकनीकी बाधाएं पार करनी होंगी. फिर भी नया जाइरोट्रॉन एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है. 

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इससे भारत के कृत्रिम सूर्य परियोजना को नई ताकत मिली है. देश स्वच्छ और असीमित ऊर्जा के सपने की ओर एक कदम और आगे बढ़ गया है. शोधकर्ता अब ज्यादा जटिल प्रयोग कर सकेंगे जो व्यावसायिक फ्यूजन ऊर्जा के सपने को हकीकत बनाने में मददगार साबित होंगे.

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