नारंगी होंठ, अलग आवाज... 16 साल की खोज, फिर मिला दुनिया को नया बंदर

16 साल तक वैज्ञानिक जिस बंदर की पहचान नहीं कर पाए, अब वही दुनिया की नई प्रजाति बन गया है. कांगो के जंगल में मिला 'लिक्वेली' अपने नारंगी होंठ, अलग आवाज और अनोखे डीएनए की वजह से चर्चा में है.

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ये है नारंगी होंठ वाला 'लिक्वेली' बंदर. (Photo: Getty) ये है नारंगी होंठ वाला 'लिक्वेली' बंदर. (Photo: Getty)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 17 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 9:13 AM IST

अफ्रीका के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के घने जंगलों में रहने वाले एक अनजान बंदर को वैज्ञानिकों ने नई प्रजाति माना है. इस बंदर का नाम 'लिक्वेली' रखा गया है. इसकी जानकारी PLOS ONE जर्नल में छपी नई स्टडी में दी गई है. वैज्ञानिकों ने कई साल तक इसकी बनावट, आवाज, रहने के तरीके और डीएनए की जांच की. इसके बाद पता चला कि यह पहले से पहचानी गई किसी भी बंदर की प्रजाति से अलग है. यह खोज इसलिए भी खास है क्योंकि पिछले 75 साल में अफ्रीका में मिली यह सिर्फ पांचवीं नई बंदर प्रजाति है.

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इस बंदर की पहली तस्वीर साल 2008 में ली गई थी, लेकिन फोटो साफ नहीं थी. इसके बाद करीब 10 साल तक वैज्ञानिक इसे फिर नहीं देख पाए. बाद में जब लोमामी नेशनल पार्क में रिसर्च शुरू हुई, तब यह बंदर दोबारा दिखाई दिया. इसके बाद इसकी पहचान पता करने के लिए कई साल तक लगातार रिसर्च की गई.

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वैज्ञानिक कई साल तक इस बंदर का पीछा करते रहे. उन्होंने जंगल में इसके रहने की जगह देखी, इसकी आवाज रिकॉर्ड की और इसके व्यवहार को समझा. रिसर्च टीम आसपास के 52 गांवों में भी गई. इनमें से सिर्फ 8 गांवों के लोगों ने बताया कि वे इस बंदर को पहचानते हैं. इससे पता चलता है कि यह बंदर बहुत छोटे इलाके में ही रहता है.

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दूसरे बंदरों से कैसे अलग है?

वैज्ञानिकों के मुताबिक लिक्वेली कोलोबस परिवार का बंदर है, लेकिन इसकी पहचान अलग है. इसके होंठों के आसपास नारंगी और हल्के क्रीम रंग का हिस्सा है. इसके शरीर के पीछे सफेद रंग का एक पैच भी होता है. इसके बाल और इसकी आवाज भी दूसरे कोलोबस बंदरों से अलग हैं.

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वैज्ञानिकों ने इसका डीएनए भी जांचा. जांच में पता चला कि इसका सबसे करीबी रिश्ता ब्लैक कोलोबस से है, लेकिन दोनों प्रजातियां करीब 50 लाख साल पहले एक-दूसरे से अलग हो गई थीं. इसी वजह से वैज्ञानिकों ने इसे नई प्रजाति माना. इसका वैज्ञानिक नाम Colobus congoensis रखा गया है.

इस बंदर पर क्यों है खतरा?

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बंदर सिर्फ करीब 1700 वर्ग किलोमीटर के इलाके में ही मिलता है. यानी इसकी पूरी आबादी बहुत छोटे क्षेत्र में रहती है. इसलिए इसके खत्म होने का खतरा ज्यादा है.

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रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों को कुछ ऐसे बंदर भी मिले, जिनका अवैध शिकार किया गया था. इसके अलावा जंगलों की कटाई और खेती के लिए जमीन बढ़ने से भी इनके रहने की जगह कम होती जा रही है.

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अब क्या करना होगा?

रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों ने कहा है कि Colobus congoensis को लुप्तप्राय प्रजातियों की सूची में शामिल किया जाना चाहिए. उनका कहना है कि अगर समय रहते इसके जंगल और रहने की जगह को नहीं बचाया गया, तो यह नई प्रजाति भी खतरे में पड़ सकती है.

लिक्वेली की खोज बताती है कि दुनिया के कई जंगलों में आज भी ऐसे जानवर मौजूद हैं, जिनके बारे में वैज्ञानिकों को अभी तक पूरी जानकारी नहीं है. यह खोज इस बात की भी याद दिलाती है कि जंगलों और वन्यजीवों को बचाना बहुत जरूरी है, ताकि ऐसी दुर्लभ प्रजातियां भविष्य में भी सुरक्षित रह सकें.

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