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कहर कुदरत का, गलती इंसान की... वायनाड लैंडस्लाइड की ये तस्वीरें हैं गवाह!

आजतक साइंस डेस्क
  • नई दिल्ली,
  • 08 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 12:24 PM IST
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केरल के वायनाड जिले में पिछले दो सालों में दो बड़े लैंडस्लाइड्स ने पूरे देश को झकझोर दिया. जुलाई 2024 में मुंडक्कई-चूरलमाला क्षेत्र में हुए भयंकर लैंडस्लाइड ने सैकड़ों लोगों की जान ले ली, जबकि जुलाई 2026 में अनक्कम्पोयिल-कल्लाड़ी-मेप्पाड़ी टनल प्रोजेक्ट साइट पर हुए लैंडस्लाइड में 3 मजदूर मारे गए और कई लापता हो गए. Photo: PTI

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दोनों घटनाओं में भारी बारिश को मुख्य वजह बताया गया, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि प्रकृति के साथ-साथ इंसानी गलतियां भी इन आपदाओं को बढ़ावा दे रही हैं. 30 जुलाई 2024 (फोटो में) की सुबह वायनाड के मेप्पाड़ी पंचायत के मुंडक्कई, चूरलमाला और अट्टमाला गांवों पर कहर टूटा. 48 घंटों में 570 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश ने पहाड़ों को अस्थिर कर दिया. Photo: AP

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पहाड़ी से निकली विशाल मिट्टी, पत्थर और पानी की धार ने गांवों को तबाह कर दिया. इस आपदा में 420 से ज्यादा लोग मारे गए, सैकड़ों घायल हुए और कई लापता रहे. यह केरल के इतिहास की सबसे घातक लैंडस्लाइड में से एक थी. Photo: PTI

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7 जुलाई 2026 को वायनाड में फिर लैंडस्लाइड हुआ. इस बार यह अनक्कम्पोयिल-कल्लाड़ी-मेप्पाड़ी टनल प्रोजेक्ट साइट पर हुआ. भारी बारिश में खुदाई का मलबा ढह गया, जिससे कई मजदूर दब गए. कम से कम तीन लोगों की मौत हुई, पांच लापता रहे और कई घायल हुए. Photo: ITG

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स्थानीय लोगों ने तुरंत बचाव कार्य शुरू किया, लेकिन यह घटना 2024 की याद दिला गई. मुख्यमंत्री ने निर्माण कार्य रोक दिया और जांच का आदेश दिया है. दोनों घटनाओं में भारी मानसूनी बारिश मुख्य ट्रिगर रही. 2024 में 400 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश एक दिन में पड़ी, जबकि 2026 में भी 265 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई. Photo: Reuters

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विशेषज्ञ कहते हैं कि बारिश अकेली जिम्मेदार नहीं. वेस्टर्न घाट्स का भू-आकृति विज्ञान यानी खड़ी ढलान और ढीली मिट्टी पहले से ही संवेदनशील है. जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश की तीव्रता बढ़ रही है, जो इन क्षेत्रों को और जोखिम में डाल रही है. Photo: ITG

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वायनाड में 1950 से 2018 तक 62% हरे-भरे क्षेत्र कम हो गए, जबकि चाय के बागान 1800% बढ़ गए. वनों की कटाई ने मिट्टी को अस्थिर कर दिया. पहाड़ी ढलानों पर बिना सोचे-समझे निर्माण, सड़कें बनाना और टनल प्रोजेक्ट्स ने स्थिति बदतर की. Photo: PTI

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2026 के मामले में निर्माण स्थल पर मलबा इकट्ठा करने की चेतावनी को नजरअंदाज किया गया, जो सीधे इंसानी लापरवाही को दर्शाता है. वायनाड में मिट्टी की परत पतली और कमजोर है. चट्टानों में दरारें, पुरानी फेलियर जोन और तेज ढलान लैंडस्लाइड को आसान बनाते हैं. Photo: PTI
 

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डिफॉरेस्टेशन के कारण मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता कम हो गई है, जिससे बारिश का पानी तेजी से बहता है और पहाड़ी ढह जाती है. जलवायु परिवर्तन ने अरब सागर को गर्म कर दिया, जिससे मॉनसून की तीव्रता बढ़ी है. Photo: PTI

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2024 की आपदा के बाद कई रिपोर्ट्स आईं, जिनमें वन संरक्षण, लैंड यूज प्लानिंग और अर्ली वार्निंग सिस्टम पर जोर दिया गया. लेकिन 2026 की घटना बताती है कि अमल अभी भी कमजोर है. निर्माण कार्यों में सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हो रहा. स्थानीय समुदायों को जागरूक करना और पहाड़ी क्षेत्रों में विकास को नियंत्रित करना जरूरी है. Photo: ITG

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वायनाड जैसे क्षेत्रों में लैंडस्लाइड जोखिम बढ़ रहा है. जरूरत है कि वैज्ञानिक मैपिंग, रियल-टाइम मौसम निगरानी, वनरोपण और सख्त कानूनों का पालन हो. सरकार, विशेषज्ञ और स्थानीय लोग मिलकर काम करें तो इन आपदाओं को कम किया जा सकता है. प्रकृति हमेशा चेतावनी देती है, लेकिन इंसान अगर नहीं सुनेगा तो त्रासदियां दोहराती रहेंगी. Photo: PTI

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