Jyeshtha Purnima 2026: वट सावित्री पूर्णिमा पर आज पढ़ें ये व्रत कथा, श्रीहरि करेंगे हर इच्छा पूरी

Jyeshtha Purnima 2026: वट पूर्णिमा 2026 के मौके पर जानें इस व्रत का महत्व, बरगद की पूजा का कारण और सावित्री-सत्यवान की पौराणिक कथा, जिसे सुनना बेहद शुभ माना जाता है.

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ज्येष्ठ पूर्णिमा कथा (Photo: Getty Image) ज्येष्ठ पूर्णिमा कथा (Photo: Getty Image)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 जून 2026,
  • अपडेटेड 8:20 AM IST

Jyeshtha Purnima 2026: ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा तिथि को वट पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है. इस खास दिन पर विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से व्रत रखती हैं. सनातन परंपरा में इस व्रत को अत्यंत पवित्र और फलदायी माना गया है.

वट पूर्णिमा के दिन बरगद के पेड़ की पूजा का विशेष महत्व है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस वृक्ष में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास होता है. इसलिए महिलाएं पूरे विधि-विधान से वट वृक्ष की पूजा करती हैं और उसके चारों ओर धागा बांधकर अपने दांपत्य जीवन की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं.

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यह पर्व मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और पश्चिम भारत के अन्य हिस्सों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ व्रत कथा सुनना या पढ़ना भी जरूरी माना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि बिना कथा सुने व्रत अधूरा रहता है.

वट पूर्णिमा व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, सावित्री नाम की एक राजकुमारी थीं, जिनका विवाह सत्यवान से हुआ था. सावित्री राजा अश्वपति की पुत्री थीं, जबकि सत्यवान राजा द्युमत्सेन के बेटे थे. विवाह से पहले ही नारद मुनि ने सावित्री के पिता को यह बता दिया था कि सत्यवान गुणी और धर्मपरायण हैं, लेकिन उनकी आयु बहुत कम है और शादी के एक वर्ष के भीतर ही उनकी मृत्यु हो जाएगी. पिता के समझाने के बावजूद सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं और सत्यवान से विवाह किया था. विवाह के बाद वे अपने पति के साथ वन में रहने लगीं. जब सावित्री को अपने पति की अल्प आयु का स्मरण हुआ, तो उन्होंने कठोर व्रत और तपस्या शुरू कर दी.

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निर्धारित दिन जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए, तो सावित्री भी उनके साथ चली गईं. काम करते समय अचानक सत्यवान को तेज पीड़ा हुई और वे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए. उसी समय यमराज वहां पहुंचे और सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे.

सावित्री ने हार नहीं मानी और यमराज के पीछे-पीछे चलती रहीं. उनकी अटूट निष्ठा और पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांगने को कहा. सावित्री ने बुद्धिमानी से अपने पति के जीवन की कामना कर ली. वचनबद्ध होने के कारण यमराज को सत्यवान के प्राण वापस करने पड़े. इसके बाद सावित्री उसी स्थान पर लौटीं जहां बरगद के पेड़ के नीचे सत्यवान का शरीर पड़ा था. जैसे ही प्राण वापस मिले, सत्यवान जीवित हो उठे. तभी से वट पूर्णिमा का व्रत अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु के लिए किया जाने लगा.

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