Hindu Dharam: यहां आज भी मौजूद हैं भगवान गणेश का कटा हुआ सिर! रहस्य जान हो जाएंगे हैरान

Hindu Dharam: क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव द्वारा त्रिशूल से काटा गया गणेश जी का सिर आज भी पृथ्वी पर मौजूद है? उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट के पास स्थित 'पाताल भुवनेश्वर गुफा' में इस मस्तक को 'आदि गणेश' के रूप में पूजा जाता है.

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भगवान गणेश जी से जुड़ा रहस्य (Photo: ITG) भगवान गणेश जी से जुड़ा रहस्य (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 09 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 8:36 AM IST

Hindu Dharam: इस रहस्यमयी गुफा में लाखों साल से महादेव द्वारा काटा गया गणेश जी का सिर आज भी मौजूद होने की मान्यता है. यह जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे. क्या आप जानते हैं कि एक बार भगवान शिव ने क्रोध में आकर अपने ही पुत्र गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया था? हालांकि, इसके बाद उन्होंने हाथी का सिर उनके धड़ पर लगाकर उन्हें पुनः जीवित कर दिया था. लेकिन सवाल यह है कि भगवान शिव द्वारा काटा गया गणेश जी का वह सिर आखिर गया कहां और आज कहां मौजूद है?

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इस रहस्य को जानने से पहले आपको बताते हैं कि इस पूरी घटना की शुरुआत कैसे हुई.

प्रचलित कथा के अनुसार, भगवान गणेश का सृजन माता पार्वती ने अपने हाथों से किया था. कथा के मुताबिक, एक दिन माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं. उन्होंने अपने उबटन से एक बालक की आकृति बनाई और उसमें अपनी शक्तियों से प्राण प्रतिष्ठित किए. इस तरह एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम माता पार्वती ने गणेश रखा था. माता पार्वती ने गणेश को आदेश दिया कि जब तक वह स्नान कर रही हैं, तब तक वह द्वार पर पहरा दें और किसी को भी अंदर प्रवेश न करने दें. बालक गणेश ने अपनी माता की आज्ञा मानी और द्वार पर पहरा देने लगे.

इसी दौरान वहां भगवान शिव पहुंचे और उन्होंने अंदर जाने का प्रयास किया. बालक गणेश भगवान शिव को पहचानते नहीं थे. इसलिए उन्होंने माता पार्वती की आज्ञा का पालन करते हुए भगवान शिव को अंदर जाने से रोक दिया. भगवान शिव ने कई बार गणेश को समझाने की कोशिश की, लेकिन गणेश अपने स्थान से नहीं हटे. यह देखकर भगवान शिव को क्रोध आ गया. उन्होंने गणेश को चेतावनी दी, लेकिन इसके बावजूद जब गणेश नहीं माने तो भगवान शिव ने त्रिशूल से प्रहार कर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया.

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मान्यता है कि भगवान शिव के त्रिशूल का प्रहार इतना तेज था कि बालक गणेश का मानव सिर धड़ से अलग होकर कैलाश पर्वत से दूर पाताल लोक में जा गिरा. जब माता पार्वती स्नान करके बाहर आईं और उन्हें इस घटना के बारे में पता चला तो वह बेहद दुखी और क्रोधित हो गईं. अपने पुत्र की ऐसी स्थिति देखकर माता पार्वती ने भगवान शिव से गणेश को पुनर्जीवित करने की मांग की.

पार्वती का दुख देखकर भगवान शिव ने अपने गणों को गणेश का सिर खोजकर लाने का आदेश दिया. हालांकि, जब सभी गण खाली हाथ लौटे तो भगवान शिव ने उन्हें आदेश दिया कि रास्ते में जो भी प्राणी सबसे पहले दिखाई दे, उसका सिर लेकर आएं.

इसके बाद गण एक हाथी के बच्चे का सिर लेकर आए. भगवान शिव ने उस हाथी के सिर को गणेश के धड़ पर स्थापित किया और उन्हें पुनः जीवित कर दिया. तभी से गणेश जी को गजानन के नाम से भी जाना जाता है.

पाताल भुवनेश्वर में मौजूद है गणेश जी का सिर?

आपको जानकर हैरानी होगी कि एक मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश का असली मानव सिर आज भी एक गुफा में मौजूद है. कहा जाता है कि भगवान शिव ने क्रोध में आकर गणेश जी का जो मस्तक काटकर उनके शरीर से अलग किया था, उसे इसी गुफा में स्थापित कर दिया था. इस गुफा को पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है. यहां भगवान गणेश की एक शिला रूपी आकृति को आदि गणेश के नाम से जाना जाता है. यह गुफा उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में गंगोलीहाट से करीब 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. मान्यता है कि कलयुग में इस गुफा की खोज आदि शंकराचार्य ने की थी.

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108 पंखुड़ियों वाला ब्रह्म कमल

मान्यता है कि पाताल भुवनेश्वर गुफा में भगवान गणेश के कटे हुए सिर की रक्षा स्वयं भगवान शिव करते हैं. यहां गणेश जी की शिला रूपी आकृति के ठीक ऊपर 108 पंखुड़ियों वाले ब्रह्म कमल के आकार की एक चट्टान है.

कहा जाता है कि इस ब्रह्म कमल से दिव्य बूंदें लगातार भगवान गणेश की शिला रूपी आकृति पर टपकती रहती हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस ब्रह्म कमल को भगवान शिव ने स्वयं यहां स्थापित किया था.

चारों युगों से जुड़ा है रहस्य

इस गुफा में चारों युगों के प्रतीक के रूप में चार पत्थर स्थापित होने की भी मान्यता है. इनमें से एक पत्थर को कलयुग का प्रतीक माना जाता है. कहा जाता है कि यह पत्थर धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ रहा है. मान्यता है कि जिस दिन यह पत्थर गुफा की छत से टकरा जाएगा, उस दिन कलयुग का अंत हो जाएगा. हालांकि, यह धार्मिक मान्यता है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है.

गुफा में होते हैं कई धार्मिक प्रतीक

पाताल भुवनेश्वर गुफा के अंदर कई धार्मिक प्रतीक और आकृतियां मौजूद हैं. मान्यता है कि यहां भगवान केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ के भी दर्शन होते हैं. बाबा अमरनाथ की गुफा से जुड़ी आकृति के पास पत्थर की बड़ी-बड़ी संरचनाएं दिखाई देती हैं, जिन्हें भगवान शिव की जटाओं का प्रतीक माना जाता है. इसके अलावा गुफा के भीतर भगवान शिव की तपस्या से जुड़े कमंडल और खड़ाऊं जैसी आकृतियां भी मौजूद होने की मान्यता है.

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इसी गुफा में काल भैरव की जीभ की आकृति के भी दर्शन होने की बात कही जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति काल भैरव के मुख से प्रवेश कर उनकी पूंछ तक पहुंच जाए तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है.

कैलाश पर्वत तक जाता है गुप्त रास्ता?

पाताल भुवनेश्वर गुफा से जुड़ी एक और मान्यता काफी रहस्यमयी है. कहा जाता है कि इस गुफा के अंदर से एक गुप्त रास्ता कैलाश पर्वत तक जाता है. हालांकि, इस दावे का भी कोई प्रमाणित वैज्ञानिक या ऐतिहासिक आधार नहीं है.

महाभारत से जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि स्वर्ग जाने के मार्ग पर पांडव इस गुफा के पास रुके थे. कहा जाता है कि उन्होंने यहां भगवान गणेश का आशीर्वाद लिया और भगवान शिव के साथ चौपड़ भी खेला था. आज पाताल भुवनेश्वर अपनी रहस्यमयी गुफा, धार्मिक मान्यताओं और अनोखी प्राकृतिक संरचनाओं के कारण श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. यहां मौजूद हर आकृति के साथ कोई न कोई पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जो इस गुफा को देश के सबसे रहस्यमयी धार्मिक स्थलों में शामिल करती है.

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