निकाय चुनाव में मिली हार पर कांग्रेस में हाहाकार, बीजेपी में भी शुरू हुआ मंथन

राजस्थान के निकाय चुनाव में भाजपा ने 309 निकायों में से 200 में बोर्ड बनाए हैं जबकि कांग्रेस 100 से कम में सफल रही. भाजपा ने 10,235 वार्डों में 4,179 सीटें जीतीं, कांग्रेस को 3,613 और निर्दलीयों को 2,273 सीटें मिलीं.

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राजस्थान निकाय चनाव में बीजेपी और कांग्रेस में क्लोज फाइट (Photo-ITG) राजस्थान निकाय चनाव में बीजेपी और कांग्रेस में क्लोज फाइट (Photo-ITG)

शरत कुमार

  • जयपुर,
  • 22 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 10:32 PM IST

राजस्थान के निकाय चुनाव के नतीजे आने के बाद अब भाजपा और कांग्रेस दोनों के भीतर मंथन का दौर शुरू हो गया है. भाजपा ने 309 निकायों में से 200 में बोर्ड बनाए हैं, लेकिन पार्टी की नजर अब उन जगहों पर है जहां जीत की उम्मीद के बावजूद समीकरण बिगड़ गए. कांग्रेस के लिए सवाल और बड़ा है,

पार्टी में नेताओं में विवाद की वजह क्या है, कहां संगठन कमजोर पड़ा, कहां टिकट का फैसला गलत हुआ और क्यों बढ़त वाली जगहों पर भी चुनाव जीतने के बावजूद पार्टी बोर्ड बनाने में पीछे रह गई.

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इन सभी सवालों पर विचार किया जा रहा है. राजस्थान से कांग्रेस को बहुत उम्मीदें था इसलिए हार के बाद संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल को राहुल गांधी ने फौरन राजस्थान भेजा जहां दो दिनों तक जयपुर में कमजोरियों पर मंथन होता रहा और ये फैसला किया गया कि वरिष्ठ नेताओं की अगुवाई में हार की वजहों के लिए जांच कमेटी बनाई जाएगी.

बता दें कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ये कहकर पार्टी में सनसनी फैला दी कि पार्टी ने ठीक से चुनाव नहीं लड़ा. जो निर्दलीय जीते हैं वो वोट कांग्रेस को मिलने चाहिए थे. रही सही कसर निकायों के मेयर, सभापति और पालिका अध्यक्षों के चुनाव में हो गई, जहां 305 में से 200 निकाय प्रमुख बीजेपी ने बना लिए और कांग्रेस सौ का आंकड़ा भी पार नही कर पाई . दस नगर निगमों में बीकानेर को छोड़कर नौ में बीजेपी को बहुमत है. बीकानेर में स्पष्ट बहुमत के बावजूद डिप्टी मेयर के चुनाव में बीजेपी जीत गई.

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पार्टी की नजर पंचायत चुनाव पर है. ऐसे में निकाय चुनाव में सामने आई संगठन की कमियों, बगावत, भितरघात और स्थानीय नेताओं के तालमेल की पूरी तस्वीर को अगली चुनावी रणनीति में शामिल करने की तैयारी है.

भाजपा की बड़ी जीत, लेकिन कमजोर कड़ियों की तलाश

निकाय चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई. 10,235 घोषित वार्डों में भाजपा ने 4,179 वार्ड जीते, जबकि कांग्रेस को 3,613 और निर्दलीयों को 2,273 वार्ड मिले. यानी सीटों के लिहाज से भाजपा आगे रही, लेकिन निर्दलीयों की बड़ी संख्या ने कई जगह चुनावी गणित बदल दिया.  यही वजह है कि भाजपा अब सिर्फ जीते हुए निकायों का आंकड़ा नहीं देख रही. पार्टी उन जगहों का हिसाब भी लगा रही है जहां संगठन मजबूत होने के बावजूद अपेक्षित नतीजा नहीं आया.

टिकट वितरण में नाराजगी कहां हुई?
कहां से बागी उम्मीदवार मैदान में उतरे?
कहां पार्टी के ही वोट निर्दलीयों की तरफ चले गए?
कहां स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल नहीं बना?
और सबसे अहम, किन जगहों पर पार्टी के अपने पार्षद ही अधिकृत उम्मीदवार के साथ नहीं खड़े हुए?

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने भी कमजोर प्रदर्शन वाले इलाकों की संगठनात्मक समीक्षा की बात कही है. पार्टी विधानसभा क्षेत्रवार प्रदर्शन की रिपोर्ट तैयार करने की दिशा में बढ़ रही है और जरूरत के मुताबिक स्थानीय नेताओं की भूमिका की भी समीक्षा की जा सकती है.

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मुंडवा ने भाजपा के सामने खड़ा किया बड़ा सवाल

नागौर की मुंडवा नगरपालिका इसका सबसे अलग उदाहरण बनकर सामने आई है. यहां भाजपा 25 सदस्यीय बोर्ड में 10 पार्षदों के साथ सबसे बड़ा दल थी, लेकिन अध्यक्ष चुनाव में पार्टी की अधिकृत उम्मीदवार गीता देवी को एक भी वोट नहीं मिला. आरएलपी उम्मीदवार अलका देवी कंडोई ने 13 वोट लेकर जीत दर्ज की, जबकि निर्दलीय घनश्याम सादावत को 12 वोट मिले. 

यानी भाजपा के पास 10 पार्षद थे, लेकिन उसके अधिकृत उम्मीदवार को अपने ही बोर्ड में एक वोट भी नहीं मिला. दरअसल, यही मामला अब भाजपा की संगठनात्मक समीक्षा के लिए अहम हो गया है. पार्टी यह समझना चाहेगी कि पार्षदों की संख्या होने के बावजूद अधिकृत उम्मीदवार तक वोट क्यों नहीं पहुंचा. बगावत, स्थानीय समीकरण और पार्षदों के बीच बनी दूरी ने किस तरह पूरा गणित बदल दिया, इसकी पड़ताल होगी.

बागी, भीतरघात और निर्दलीय- भाजपा के सामने तीन बड़े सवाल

निकाय चुनाव के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन बागियों की भूमिका समझने की है जिन्होंने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव लड़ा.
पार्टी यह भी देखेगी कि टिकट नहीं मिलने के बाद कितने पुराने कार्यकर्ता निर्दलीय मैदान में उतरे और उनका असर भाजपा के वोट पर कितना पड़ा. क्योंकि चुनाव में निर्दलीयों ने 2,273 वार्ड जीते हैं और कई निकायों में वे बोर्ड गठन के समय निर्णायक स्थिति में रहे. 

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यानी अब समीक्षा सिर्फ इस बात की नहीं होगी कि भाजपा कहां हारी. सवाल यह भी होगा कि भाजपा की जीत को किसने कमजोर किया और पार्टी के वोट का कितना हिस्सा बागियों या निर्दलीयों के खाते में गया.

कांग्रेस के सामने हार की कड़ियां जोड़ने की चुनौती

उधर कांग्रेस में भी चुनाव परिणामों का हिसाब शुरू हो गया है. पार्टी की समीक्षा में संगठन, टिकट वितरण, उम्मीदवार चयन, स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल और चुनावी मैनेजमेंट को शामिल किया जा रहा है. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन निकायों में पार्टी के पास मजबूत संख्या थी, वहां बोर्ड क्यों नहीं बन पाया.

अजमेर इसका उदाहरण है. यहां कांग्रेस 37 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन 41 के बहुमत के आंकड़े से चार सीट पीछे रही. बाद में भाजपा की अनामिका शर्मा ने 43 वोट लेकर महापौर चुनाव जीत लिया. यानी कांग्रेस के सामने अब सिर्फ वार्ड जीतने का सवाल नहीं है. पार्टी यह भी देख रही है कि चुनाव के बाद अपने पार्षदों और निर्दलीयों को साथ लेकर चलने में कहां कमी रह गई.

पाली ने भी बदला पूरा चुनावी गणित

पाली में भी यही तस्वीर सामने आई. निकाय चुनाव में कांग्रेस 29 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी थी, जबकि भाजपा के 21 और निर्दलीयों के 15 पार्षद जीते. लेकिन महापौर चुनाव में भाजपा की नमिता बूबकिया 33 वोट लेकर जीत गईं. कांग्रेस की बागी राजबाला हिंगड़ को 29 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की अधिकृत उम्मीदवार को सिर्फ तीन वोट मिले. 

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दरअसल, ऐसे नतीजे कांग्रेस के लिए सिर्फ हार नहीं बल्कि संगठन के भीतर तालमेल का सवाल भी हैं. पार्टी अब यह देख रही है कि उम्मीदवार चयन से लेकर पार्षदों के मैनेजमेंट तक किस स्तर पर चूक हुई.

कांग्रेस चुनाव प्रक्रिया पर भी उठाएगी सवाल

कांग्रेस की समीक्षा सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं रहने वाली. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने चुनाव प्रक्रिया, प्रशासनिक तंत्र के कथित इस्तेमाल और परिसीमन को लेकर सवाल उठाए हैं. इन दावों को कांग्रेस ने अपनी चुनावी समीक्षा का हिस्सा बनाया है. डोटासरा ने वार्ड परिसीमन को लेकर भी सवाल उठाए हैं. कांग्रेस का दावा है कि अलग-अलग वार्डों में मतदाताओं की संख्या में बड़ा अंतर रहा और इससे उसके चुनावी आकलन पर असर पड़ा. परिसीमन को लेकर कांग्रेस के दावों पर स्वतंत्र रूप से अलग-अलग विश्लेषण भी सामने आए हैं. 

अब पंचायत चुनाव पर नजर

असल में निकाय चुनाव ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को अलग-अलग तरह के सवाल दिए हैं. भाजपा के सामने सवाल है कि बड़ी जीत के बावजूद बागियों, निर्दलीयों और स्थानीय खींचतान से जिन जगहों पर पार्टी का गणित बिगड़ा, उसे कैसे ठीक किया जाए. कांग्रेस के सामने सवाल है कि जहां वार्डों में पार्टी मजबूत रही, वहां बोर्ड बनाने के लिए जरूरी राजनीतिक तालमेल क्यों नहीं बन पाया.

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यही वजह है कि अब निकाय चुनाव की रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगी. बूथ से लेकर वार्ड, निकाय और विधानसभा क्षेत्र तक प्रदर्शन का हिसाब जोड़ा जाएगा. दरअसल, पंचायत चुनाव से पहले दोनों पार्टियां यही तलाशेंगी कि संगठन की कौन सी कमजोर कड़ी चुनाव के दौरान सामने आई और उसे समय रहते कैसे मजबूत किया जाए.

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