"जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता. इसलिए भारत को एक भाषा की आवश्यकता है. हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है, जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया."
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के इस कथन में ही हिंदी की शक्ति, प्रासंगिकता और संभवत: उसके हाशिये पर पहुंचने की वजह भी है. बरसों से राष्ट्रभाषा का दर्जा पाने, राजभाषा के आदर्श रूप में प्रयोग होने को लेकर संघर्ष कर रही हिंदी अब संवाद की भाषा के तौर पर भी संक्रमण झेल रही है. यदि हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिल जाता तो उसे सारे वैधानिक अधिकार अपने आप प्राप्त हो जाते, जैसे राष्ट्रगान व राष्ट्रीय ध्वज को हैं.
हिंदी को लिपि के संदर्भ में भी संघर्ष करना पड़ रहा है. हिंदी देवनागरी में लिखी जाती है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 (1) कहता है कि देवनागरी में लिखित हिंदी भारतीय संघ की राजभाषा होगी. हालांकि, राजभाषा के सिंहासन पर व्यवहारिक रूप से अंग्रेजी ही विराजमान है. अधिकतर सरकारी विभागों में कागजी कामकाज अंग्रेजी के साथ (या कहें बाद में) हिंदी में किया जाता है, क्योंकि नौकरशाही की भाषा अंग्रेजी ही है. सरकारी कामकाज में हिंदी मूलत: न होकर अनुवाद की भाषा बनकर रह गई है. न्याय व्यवस्था में भी औपनिवेशिक काल से अब तक अंग्रेजी या उर्दू का ही बोलबाला दिखाई देता है.
यहां यह उल्लेखनीय है कि सरकारी कार्यालयों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और हवाई अड्डों पर सूचना पटलों पर अंग्रेजी, स्थानीय भाषा और हिंदी, तीनों माध्यमों को जगह देकर औपचारिकता पूरी कर ली गई. लेकिन विडबंना यह रही कि यहां हिंदी की जगह संस्कृत या संस्कृत से लिए गए शब्दों को लाद दिया गया. आगमन, प्रस्थान, पेयजल, प्रसाधन, मुख्य अभियंता जैसे शब्दों के प्रयोग कर 'इतिश्री' कर लिया गया.
आज की हिंदी समाचार पत्रों और पत्रकारों ने बनाई है, ऐसा कहना बिलकुल भी अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं है. आज समाचारपत्रों में पाठकों को आकर्षित करने रंग-बिरंगे चटखदार पन्नों में सामग्री (कंटेंट) खिचड़ी भाषा यानी हिंग्लिश में ही परोसी जा रही है. इसके दूरगामी परिणाम ये हैं कि कई मामलों में तो पूरे के पूरे वाक्यों में ही हिंदी मात्र सहायक क्रियाओं तक ही सीमित रह गई है. उदाहरण के लिए- यूनिवर्सिटी के डीन का ट्रांसफर रोका गया.
वहीं, समाचार चैनल हिंदी को लेकर खुद को यह तर्क देकर अलग कर करते हैं कि उनके लिए भाषा नहीं, दृश्य (विजुअल) सबसे अहम है और इस विजुअल के आसपास जो भी भाषा अधिक सटीक बैठती है, उनके लिए वही सही है.
इससे इतर संवाद की भाषा को लेकर अलग-अलग मनीषियों में मतांतर हैं. अधिकतर का मानना है कि भाषा का संबंध सिर्फ दैनिक बोलचाल से ही है. कहावत भी है- 'चार कोस पर पानी बदले आठ कोस पर बानी'. लेकिन इस बात को भी याद रखना होगा कि बोल-चाल की भाषाएं ही धीरे-धीरे सीखने और पढ़ने की भाषा के तौर पर विकसित होती हैं.
हिंदी राजभाषा और लोकभाषा, दो परिपाटी में बंट गई. अब हम अपनी राष्ट्रीय हिंदी में तत्सम और तद्भव शब्दों के साथ ही उर्दू, फारसी, अरबी और विशेषकर अंग्रेजी शब्दों को नि:संकोच स्थान देते हैं. जबकि, उर्दू में ही अलग-अलग भाषाओं से शब्द लिए गए, लेकिन इसमें भारतीय भाषाओं का समावेश सबसे ज्यादा मिलता है. हिंदी के पाठक को उर्दू के माध्यम से खड़ी बोली ऐसे स्वरूप में मिली, जिसमें फारसी का तड़का लगा हुआ है. अंग्रेजी में भी कई भाषाओं का प्रभाव देखा गया. अंग्रेजी के शब्दकोश में प्रतिवर्ष दूसरी भाषा के शब्दों को जोड़ा जाता है. और उन्हें अंग्रेजी का ही मान लिया जाता है.
स्थिति यह है कि आम जनजीवन में लोगों को यह ही नहीं मालूम होता कि अपनी बातचीत में उसने जिस शब्द का प्रयोग किया वह किस भाषा से आ रहा है.
हिंदी में क्लिष्टता और शुद्धता को सर्वमान्यता मिलना अब असंभव ही है. कहने का अर्थ यह कि वह युग बीत चुका है. स्कूली शिक्षा में लागू किया गया त्रिभाषा समीकरण हिंदी को भारतीय समाज में आत्मसात होने की दिशा में एक कारगर और अभूतपूर्व प्रयास है.
वर्तमान में तो संवाद या संप्रेषण 'भाषा मुक्त' से दिखाई दे रहे हैं, जहां जेनज़ी वर्ग अपनी भाषा स्वयं ही तैयार कर उसका पुरजोर प्रयोग कर रहा है. इसमें कई संवाद तो केवल हावभाव, संकेतों या चित्रों से पूरे हो जाते हैं. उनकी इस 'शब्दावली' को समझने के लिए 'नॉनजेनज़ी' को अलग से प्रयास करने होते हैं.
कुल मिलाकर अब सारी आशाएं साहित्य जगत पर ही आ टिकती है. क्योंकि इसने सभी तरह के रोड़ों और प्रतिकूल परिस्थितियों के बाद भी हिंदी की आत्मा को इसकी अधिकतम सीमा तक बचाए रखा है.
दूसरी भाषा से आने वाले शब्दों से हिंदी को अछूता रखना संभव नहीं है, लेकिन व्याकरण समेत अन्य अनुशासनों में इनके प्रयोग में सावधानी अपनाई जा सकती है. यदि हम हिंदी भाषा और साहित्य को निरंतर समृद्ध नहीं करते रहेंगे तो निश्चित ही इसकी पहचान संकट में आ जाएगी. किसी भी भाषा के अस्तित्व की कल्पना उसे बोलने वालों की चेतना से मुक्त होकर नहीं की जा सकती. आवश्यकता है एक ऐसे भारत की, जो हिंदी को सहज रूप से बोलने में सक्षम हो और उसे बोलने में शर्म-लज्जा महसूस न करता हो.
राहुल झारिया