तो शुभेंदु को लेकर भी चूक गए राहुल गांधी? 'नो-वैकेंसी' के बहाने को बीजेपी ने भुनाया

शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बन चुके हैं. बीजेपी में शामिल होने से पहले शुभेंदु अधिकारी तृणमूल कांग्रेस में हुआ करते थे. मालूम हुआ है कि बीजेपी से पहले शुभेंदु अधिकारी कांग्रेस में शामिल होना चाहते थे, लेकिन राहुल गांधी की मंजूरी नहीं मिल पाई.

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी. (Photo: PTI) कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी. (Photo: PTI)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 23 जून 2026,
  • अपडेटेड 3:43 PM IST

शुभेंदु अधिकारी को लेकर एक बहुत बड़ी खबर आई है. खबर के हिसाब से देखें तो एकबारगी लगता है, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की पहली पसंद बीजेपी नहीं रही होगी. यह भी हो सकता है, एक ही वक्त शुभेंदु अधिकारी कांग्रेस और बीजेपी दोनों को आजमा रहे हों - मुद्दे की बात यह है कि कांग्रेस से बड़ी चूक हो गई, और हीरे के पारखी जौहरी की तरह बीजेपी ने बाजी मार ली. 

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खबर यह है कि बीजेपी में शामिल होने से पहले शुभेंदु अधिकारी ने कांग्रेस से संपर्क किया था. और, सीनियर पत्रकार रशीद किदवई के मुताबिक, राहुल गांधी और शुभेंदु अधिकारी की इस सिलसिले में मुलाकात भी हुई थी. लेकिन, बात नहीं बन पाई. शायद शुभेंदु अधिकारी की किस्मत कांग्रेस पर भारी पड़ गई. 

आखिर बात नहीं बन पाने की क्या वजह हो सकती है? क्या वजह ममता बनर्जी हो सकती हैं? या फिर, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के कट्टर राजनीतिक विरोधी अधीर रंजन चौधरी?

राहुल गांधी से शुभेंदु अधिकारी की वो मुलाकात

न्यूज एजेंसी ANI के एक पॉडकास्ट में सीनियर पत्रकार रशीद किदवई ने बताया, बीजेपी से पहले शुभेंदु अधिकारी कांग्रेस में शामिल होना चाहते थे. और, ऐसा करने की वजह वही बताई गई है, जो अब जगजाहिर है. वजह वही है जो तृणमूल कांग्रेस के विधायक और बागी सांसद एक सुर में बोल रहे थे. 

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तृणमूल कांग्रेस में हाल की बगावत के घटनाक्रम पर नजर डालें, तो सारे बागियों को अभिषेक बनर्जी से ही शिकायत है. अभिषेक बनर्जी के कामकाज के तौर तरीके से पश्चिम बंगाल के टीएमसी विधायक भी नाराज थे, और टीएमसी के सांसद भी. ऋतब्रत बनर्जी से लेकर काकोली घोष दस्तीदार तक, सभी के मुंह से करीब करीब एक जैसी ही बातें सुनने को मिली हैं. 

बताते हैं कि शुभेंदु अधिकारी ममता बनर्जी के काम करने के तरीके से नाराज थे, और इसलिए वो कांग्रेस में आना चाहते थे. कांग्रेस में शुभेंदु अधिकारी के लिए फिट होना भी आसान था. कांग्रेस से निकली तृणमूल कांग्रेस की भी पॉलिटिकल लाइन मिलती जुलती ही है. फर्क रहा है, तो टीएमसी में ममता बनर्जी के तेवर, और मौजूदा कांग्रेस में राहुल गांधी के स्टाइल का. 

रशीद किदवई के मुताबिक, शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का नेतृत्व करना चाहते थे. शुभेंदु अधिकारी चाहते थे कि कांग्रेस उनको पश्चिम बंगाल में पार्टी का चेहरा बना दे. और, इसी सिलसिले में शुभेंदु अधिकारी ने राहुल गांधी से मुलाकात भी की थी. वैसे राहुल गांधी से मुलाकात सीधे तो हुई ही नहीं होगी. जब कांग्रेस के बड़े नेताओं को ऐसा मौका नहीं मिलता, तो किसी बाहरी के बारे में कौन कहे. बाहरी भी ऐसा जिसकी अपनी स्वतंत्र पहचान न हो. जैसे क्षेत्रीय दलों के नेता हैं. 

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निश्चित तौर पर राहुल गांधी से मुलाकात कराने में कोई मजबूत माध्यम रहा होगा. कांग्रेस के जो नेता राहुल गांधी से नहीं मिल पाते, प्रियंका गांधी ऐसे टास्क लेती हैं. पहले बात करके सोच विचार करती हैं, फिर मामला आगे बढ़ाती हैं. आगे चलकर नतीजा जो भी निकले, प्रियंका गांधी मुलाकात और बात तो सुनिश्चित कर ही देती हैं. 

बताते हैं कि राहुल गांधी ने तब शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात तो की, लेकिन जवाब यही दिया कि 'फिलहाल कोई वैकेंसी नहीं है'. करीब करीब वैसे ही जैसे कभी प्रशांत किशोर को लौटा दिया था, और बाद में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगे बढ़कर लपक लिया था. प्रशांत किशोर के साथ तो दूसरी मुलाकात और प्रेजेंटेशन का अनुभव भी पहली बार जैसा ही रहा. 

एएनआई के साथ पॉडकास्ट में रशीद किदवई कहते हैं, '... जब शुभेंदु अधिकारी ममता (बनर्जी), अभिषेक बनर्जी और उनके काम करने के तरीके से काफी नाराज थे, तब शुभेंदु अधिकारी ने राहुल गांधी से दिल्ली आकर मुलाकात की थी. 

रशीद किदवई के अनुसार शुभेंदु अधिकारी ने राहुल गांधी से तब कहा था, मुझे पार्टी में ले लीजिए और (बंगाल में) पार्टी का चेहरा बना लीजिए... राहुल गांधी ने शुभेंदु अधिकारी से कहा कि अभी वैकेंसी नहीं है. रशीद किदवई तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति विजय का भी जिक्र करते हैं, यही उन्होंने विजय के साथ भी किया था... कोई वैकेंसी नहीं है.

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क्या बंगाल में बीजेपी की जगह कांग्रेस सरकार होती?

शुभेंदु अधिकारी को तृणमूल कांग्रेस से चाहे जैसे भी संभव हो, निकलना ही था. राहुल गांधी की तरफ से ठुकराए जाने पर शुभेंदु अधिकारी ने बीजेपी का रुख किया. बीजेपी ने शुभेंदु अधिकारी से पहले मुकुल रॉय को भी आजमाया था. सफलता नहीं मिली तो वैसा ही नया प्रयास किया. मुकुल नहीं चले, लेकिन शुभेंदु में संभावना थी. शुभेंदु ने पहले ही चुनाव में बड़ा झटका दिया. ममता बनर्जी को हरा पाना आसान भी नहीं था. शुभेंदु तो ऐसा दो दो बार कर चुके हैं. पहले कोई कह सकता था कि नंदीग्राम तो उनका गढ़ था, तो शुभेंदु ने भवानीपुर जाकर भी अपना जौहर दिखा दिया. 

अब सवाल यह भी उठता है कि क्या बीजेपी की तरह कांग्रेस भी शुभेंदु अधिकारी को ममता बनर्जी के खिलाफ उतनी ही मजबूती से खड़ा कर पाती? 

बीजेपी को तो पहले से ही तलाश थी. शुभेंदु अधिकारी को पाते ही बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में पार्टी का चेहरा बना दिया. शुभेंदु अधिकारी मोर्चे पर थे, और बीजेपी कदम कदम पर मौजूद होती थी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक. 

क्या राहुल गांधी और कांग्रेस भी शुभेंदु अधिकारी को बीजेपी की तरह प्रोजेक्ट कर पाती? सबसे बड़ा सवाल यही है.

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क्या वाकई बंगाल कांग्रेस में वैकेंसी नहीं थी?

राहुल गांधी से शुभेंदु अधिकारी की मुलाकात वैसी ही लगती है, जैसी कभी अभिनेता से टीवीके नेता बने सी. जोसेफ विजय की हुई थी. संयोग देखिए, दोनों ही अपने अपने राज्यों में एक ही कालखंड में मुख्यमंत्री बन गए हैं. टीवीके नेता विजय के मामले में तो मान सकते हैं कि राहुल गांधी और कांग्रेस का भी थोड़ा योगदान है, लेकिन शुभेंदु अधिकारी का मामला तो बिल्कुल ही अलग है. 

सवाल है कि राहुल गांधी ने आखिर पश्चिम बंगाल में वैकेंसी नहीं होने वाली बात क्यों कही होगी? क्या राहुल गांधी ने अधीर रंजन चौधरी के कारण शुभेंदु अधिकारी से बोल दिया था कि वैकेंसी नहीं है. असल में, 2014 के बाद से पश्चिम बंगाल कांग्रेस की कमान ज्यादातर अधीर रंजन चौधरी के पास ही रही है. 2018 से 2020 तक के दो साल को छोड़ दें, तो 2014 से 2024 तक अधीर रंजन चौधरी ही पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे. 

अगर अधीर रंजन चौधरी नहीं, तो क्या शुभेंदु अधिकारी को कांग्रेस में नहीं लेने में राहुल गांधी के सामने ममता बनर्जी भी कोई अड़चन बनी होंगी?

रशीद किदवई पॉडकास्ट में बताते हैं, ममता बनर्जी और सोनिया गांधी के रिश्ते हमेशा अच्छे रहे, लेकिन ममता बनर्जी और राहुल गांधी के नहीं. पांच साल पहले कुछ दिनों के लिए सोनिया गांधी से ममता बनर्जी जरूर नाराज दिखी थीं, लेकिन 8 जून को दिल्ली में हुई INDIA ब्लॉक की बैठक में गले मिलते देखकर तो सारे गिले शिकवे खत्म ही लगते हैं. 

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रशीद किदवई याद दिलाते हैं, 2020-22 में हुई ममता बनर्जी और सोनिया गांधी की मीटिंग में ममता बनर्जी ने ज्यादा बात नहीं की थी... जब बाहर आईं तो एक व्यक्ति से बोली थीं कि सोनिया गांधी ने मेरे साथ ठीक नहीं किया, क्योंकि वहां राहुल गांधी बैठे हुए थे. 

शुभेंदु अधिकारी को कांग्रेस के लिए रिजेक्ट कर देना क्या राहुल गांधी की तरफ से कोई 'एरर ऑफ जजमेंट' जैसा मामला था? और, क्या बाद में महसूस होने पर राहुल गांधी ने तमिलनाडु में विजय को समर्थन देकर भूल सुधार किया है?

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