सोनम वांगचुक अगर अनशन तोड़ भी दें, तो भी कम नहीं होगी इस आंदोलन की धार

एक्टिविस्ट और शिक्षाविद सोनम वांगचुक पिछले 19 दिनों से नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे हैं. नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' के धरना स्थल पर कॉकरोचों के बीच बिताई एक रात ने मुझे वहां के कड़े हालातों का एहसास करा दिया और यह भी समझा दिया कि भूख से तड़पते इन प्रदर्शनकारियों के मुंह में निवाले का एक कौर चले जाने से इस आंदोलन की धार रत्ती भर भी कम नहीं होगी.

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दिल्ली के जानलेवा मौसम में 19 दिन से अनशन पर सोनम वांगचुक (Photo-PTI) दिल्ली के जानलेवा मौसम में 19 दिन से अनशन पर सोनम वांगचुक (Photo-PTI)

अविनाश कटील

  • नई दिल्ली ,
  • 16 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 4:32 PM IST

हवा में भारी उमस है, पसीना सूखने का नाम नहीं ले रहा, एसी तो भूल ही जाइए, चढ़ते पारे के बीच वहां हवा के लिए पंखे तक नहीं हैं. पूरे इलाके में पसीने और टॉयलेट की बदबू आती है. नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' के प्रदर्शन स्थल पर बिताई सिर्फ एक रात मुझे यह समझाने के लिए काफी थी कि सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक किन बदतर और कड़े हालातों के बीच अपना आमरण अनशन कर रहे हैं. गुरुवार को उनके इस अनशन का 19वां दिन था.

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जहां एक तरफ 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के युवा नेता बारी-बारी से धरना स्थल पर रुकते हैं और बीच-बीच में खुद को रिचार्ज करते रहते हैं, वहीं वांगचुक वहां लगातार डटे हुए हैं. राहत के नाम पर उनके पास सिर्फ एक आईपैड और एक छोटा सा टेबल फैन है. ऐसे में, अलग-अलग क्षेत्रों की कई दिग्गज हस्तियों की अपील पर अगर वांगचुक आज अन्न का एक निवाला मुंह में डाल भी लेते हैं, तो इससे उनके इस आंदोलन की धार रत्ती भर भी कम नहीं होगी. 

मैं यह बात किसी दूर के देखने वाले की तरह नहीं, बल्कि विरोध प्रदर्शन वाली जगह पर एक रात बिताने के बाद कह रहा हूं. कल रात मैंने एक पत्रकार के तौर पर रिपोर्टिंग करने के बजाय, खुद को एक प्रदर्शनकारी या यूं कहें कि एक 'कॉकरोच' की तरह हालात को महसूस किया. मेरा निष्कर्ष यही है कि दिल्ली के इस मौजूदा मौसम में बेमियादी भूख हड़ताल पर बैठना असाधारण रूप से कठिन है. यहां की भीषण गर्मी, उमस और बीच-बीच में अचानक होने वाली बारिश धरना स्थल पर मौजूद हर शख्स के सब्र और हौसले की परीक्षा ले रही है.

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और यही वजह थी कि मेरा दिमाग बार-बार घूमकर सोनम वांगचुक पर जाकर टिक जाता था, जो पिछले करीब तीन हफ्तों से बिना कुछ खाए-पिए इन्हीं बदतर हालातों को झेल रहे हैं. इस रिपोर्ट के पब्लिश होने तक, वांगचुक को अन्न का एक भी दाना खाए 19 दिन हो चुके हैं. 59 साल के यह सामाजिक कार्यकर्ता अब उस बड़े आंदोलन का चेहरा बन चुका है, जो NEET-UG 2026 पेपर लीक विवाद के गुस्से और हमारी शिक्षा व्यवस्था के प्रति गहरी निराशा के बीच उपजा है. 

सोनम वांगचुक अपना अनशन कब खत्म करेंगे?

नेताओं, अभिनेताओं, लेखकों और अन्य प्रमुख हस्तियों ने वांगचुक से अपना अनशन खत्म करने की अपील की है. हालांकि, वह अपनी मांग पर अड़े हुए हैं और उनका कहना है कि वह नरेंद्र मोदी सरकार के साथ सीधे संवाद चाहते हैं.

बुधवार को जारी एक वीडियो संदेश में वांगचुक ने कहा, "मेरी तबीयत बहुत अच्छी तो नहीं है, लेकिन उतनी बुरी भी नहीं है." उन्होंने आगे कहा, "मुझसे अनशन तोड़ने के लिए कहने के बजाय, कृपया 20 जुलाई को संसद की ओर निकलने वाले हमारे शांतिपूर्ण मार्च में मेरे साथ शामिल हों."

59 वर्षीय इस सामाजिक कार्यकर्ता ने अपने समर्थकों से आग्रह किया कि वे उनसे अनशन खत्म करने के लिए न कहें, बल्कि इसकी जगह 20 जुलाई को होने वाले संसद मार्च का हिस्सा बनें, इससे पहले, बुधवार को ही दिल्ली हाईकोर्ट ने वांगचुक को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की मांग वाली एक जनहित याचिका पर केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया था. याचिकाकर्ता ने कोर्ट में वहां के हालातों को बयां करते हुए कहा कि स्थिति ऐसी बन गई है, जहां एक सामाजिक कार्यकर्ता पूरे देश के सामने एक तरह से आत्महत्या कर रहा है.

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इन घटनाओं ने उस बात को और पक्का कर दिया जो मैंने जंतर-मंतर वाली उस रात के बाद सोचना शुरू किया था, वांगचुक ने वह हासिल कर लिया है जो कई भूख हड़तालें करने वाले हासिल करने की उम्मीद करते हैं, उन्होंने देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है और देश में इस मुद्दे पर बातचीत शुरू करने के लिए मजबूर किया है.

इस आंदोलन की व्यापक मांगों को पूरे देश का समर्थन मिला है, और 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के इस प्रदर्शन ने इतनी रफ्तार पकड़ ली है कि अगर वांगचुक अपनी भूख हड़ताल खत्म भी कर दें, तब भी यह आंदोलन जारी रहेगा. दोनों ही सूरतों में, वह इस विरोध प्रदर्शन का मुख्य चेहरा बने रहेंगे. मेरा यह मानना कि वांगचुक को अपना अनशन अब खत्म कर देना चाहिए, किसी वैचारिक वजह से नहीं है, इसकी वजहें बेहद दर्दनाक और शारीरिक हैं.

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भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक कैसे बने CJP प्रदर्शन का मुख्य चेहरा

जब मैं मंगलवार शाम जंतर-मंतर पहुंचा, तो एक बात तुरंत साफ हो गई, वहां आने वाले ज्यादातर लोग सोनम वांगचुक की वजह से वहां थे. वे उस शख्स के साथ एकजुटता दिखाने आए थे, जिसने शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग को लेकर हफ्तों से अन्न का एक दाना तक नहीं चखा था.

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यह आंदोलन NEET-UG 2026 पेपर लीक को लेकर जनता में उपजे भारी गुस्से के बीच शुरू हुआ था. इस परीक्षा में 22 लाख से ज्यादा छात्र शामिल हुए थे, जिसे बाद में पेपर लीक के आरोपों के चलते रद्द कर दिया गया था. 21 जून को देशव्यापी दोबारा परीक्षा कराए जाने और इस बीच के हफ्तों में छात्रों की आत्महत्या की खबरों ने इस संकट से निपटने के सरकारी तौर-तरीकों की आलोचना को और तेज कर दिया.

इसके बाद, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की ओर से बेरोजगार युवाओं को "परजीवी" और "कॉकरोच" कहने वाली टिप्पणियों ने लोगों के दुख और गुस्से को और बढ़ा दिया. इन टिप्पणियों की तीखी आलोचना हुई और बोस्टन में मौजूद अभिजीत दिपके ने व्यंग्यात्मक "कॉकरोच जनता पार्टी" बनाने का फैसला किया.

कुछ ही हफ्तों के भीतर, कॉकरोच के मुखौटे पहने युवा प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर जुटने लगे और जवाबदेही के साथ-साथ केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करने लगे. वांगचुक 6 जून को CJP के पहले विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए थे, और बाद में उन्होंने बेमियादी भूख हड़ताल की घोषणा कर दी. प्रदर्शन स्थल के मेरे तीसरे दौरे के बाद, एक निष्कर्ष बिल्कुल साफ तौर पर सामने आया यह आंदोलन अब काफी हद तक एक ही शख्स के इर्द-गिर्द घूम रहा है. यहां तक कि जंतर-मंतर पर तैनात सुरक्षाकर्मियों की भी यही राय थी.

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बैरिकेड्स के पास खड़े रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के एक जवान ने भीड़ को बढ़ते हुए देखकर मुझसे कहा, "लोग वांगचुक को देखने आ रहे हैं, यह सारी भीड़ उन्हीं की वजह से है. लोग आ रहे थे और जा रहे थे, लेकिन दो बार के सामान्य दौरे और एक पूरी रात प्रदर्शन स्थल पर गुजारने के बाद, मुझे इस बात की झलक मिल गई कि दिल्ली का यह मौसम शरीर को किस हद तक तोड़ सकता है. अगर सिर्फ एक रात ने मुझे शारीरिक रूप से पूरी तरह निचोड़ कर रख दिया, तो यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि पिछले करीब तीन हफ्तों से बिना कुछ खाए-पिए रहने का वांगचुक के शरीर पर क्या असर हुआ होगा.

दिल्ली का मौसम वांगचुक के अनशन को और भी कठिन क्यों बनाता है

प्रदर्शन स्थल पर मेरे पिछले दौरे भीषण गर्मी के दौरान हुए थे, और मैं हमेशा वहां से पूरी तरह थककर लौटता था. इस बार के दौरे से पहले, मैंने सोचा था कि शाम को जाना आसान होगा क्योंकि तब तक सूरज ढल चुका होगा, लेकिन मैं गलत था.
सूरज भले ही ढल चुका था, लेकिन गर्मी बरकरार थी, उमस आधी रात बीत जाने के बाद भी दम घोटने वाली थी. प्रदर्शनकारियों के बीच बैठे हुए, मैं बार-बार वांगचुक और उन अन्य लोगों के बारे में सोच रहा था जिन्होंने अनशन का रास्ता चुना था.

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वांगचुक चौबीसों घंटे उस मंच पर डटे हुए थे, और खबरों के मुताबिक केवल पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स के सहारे जी रहे थे, जो लोग सामान्य रूप से खाना खा रहे थे, जब यह मौसम उन्हें भी पस्त कर रहा था, तो ऐसे में वांगचुक के अनशन की गंभीरता और भी भयावह व हैरान करने वाली लगती है.

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आधी रात के बाद, वांगचुक के इर्द-गिर्द मंच पर सन्नाटा पसर गया

रात के करीब 1 बजे, मेरे कानों में एक ऐसी बातचीत पड़ी जिसने मेरा ध्यान खींच लिया, उस रात पहली बार, मैंने प्रदर्शनकारियों को CJP के कुछ सबसे प्रमुख चेहरों की खुलकर आलोचना करते सुना, जिनमें इसके संस्थापक अभिजीत दिपके भी शामिल थे.
मुख्य मंच पर सन्नाटा पसर चुका था, वांगचुक एक पतले गद्दे पर सो रहे थे, जबकि मुट्ठी भर स्वयंसेवक पास में ही पहरा दे रहे थे..दिन के समय भीड़ को संबोधित करने वाले सौरव दास, आशुतोष रांका और विजेता दहिया जैसे CJP के प्रमुख चेहरे कहीं नजर नहीं आ रहे थे.

एक प्रदर्शनकारी ने कहा, "उनमें से किसी न किसी को सोनम सर के साथ यहां रुकना चाहिए था.' एक बुजुर्ग व्यक्ति ने बात आगे बढ़ाई, "इससे पता चलता है कि वे इस विरोध प्रदर्शन को लेकर गंभीर नहीं हैं." हालांकि, समूह के कुछ अन्य लोगों ने अनुपस्थित नेताओं का बचाव करते हुए तर्क दिया कि वे दिनभर मौजूद थे और उन्हें भी आराम करने का हक है. यह एक वाजिब दलील थी, जिसे खारिज करना मुश्किल था.

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लाइमलाइट से दूर, भूख हड़ताल पर बैठे अन्य प्रदर्शनकारी

जब मैंने इस बहस से परे देखा कि कौन मौजूद है और कौन नहीं, तो एक और बात ने मुझे सबसे ज्यादा झकझोरा. जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह केवल वांगचुक की हालत नहीं थी, बल्कि मंच के पीछे मौजूद वे करीब 10 अन्य प्रदर्शनकारी भी थे जो बेमियादी भूख हड़ताल पर बैठे हैं, लेकिन, किसी न किसी वजह से, वे काफी हद तक मीडिया की सुर्खियों से दूर रहे.

बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से यहां आए हैं, जब यह रिपोर्ट लिखी जा रही है, तब तक उनकी भूख हड़ताल को 16 दिन हो चुके हैं. सिंह ने इंडिया टुडे डिजिटल से कहा, "मैं यहां देश के लिए आया हूं और जब तक अपना मकसद हासिल नहीं कर लेता, घर वापस नहीं जाऊंगा.' उनके बगल में लखनऊ के दीपक यादव बैठे थे, जो इस रिपोर्ट के प्रकाशन तक अपनी भूख हड़ताल के 10 दिन पूरे कर चुके थे, उनके साथ कई अन्य लोग भी थे जिन्होंने हाल ही में अपना अनशन शुरू किया था.

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उनसे थोड़ी ही दूरी पर आइसा (AISA) छात्र संगठन से जुड़े आमीन, नेहा और मनीष बैठे थे. इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक वे पिछले 18 दिनों से बेमियादी अनशन पर हैं. उनके नाम इंटरनेट पर ट्रेंड नहीं कर रहे हैं, उनके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल नहीं हो रहे हैं. इसके बावजूद, वे भी उसी मौसम की मार झेल रहे हैं और उसी अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं, जिसका सामना सोनम वांगचुक कर रहे हैं.

बाद में, CJP के नेताओं ने भूख हड़ताल पर बैठे सभी प्रदर्शनकारियों को मुख्य मंच पर आमंत्रित किया और उनसे अपना अनशन खत्म करने का आग्रह किया, ताकि वे सब मिलकर वांगचुक को भी ऐसा ही करने के लिए मना सकें. लेकिन किसी ने भी इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया, उन्होंने अपनी भूख हड़ताल जारी रखने का फैसला किया.

सूर्योदय के बाद जब मैं जंतर-मंतर से वापस लौट रहा था, तो एक विचार मेरे जहन में ठहर गया, अगर सोनम वांगचुक अपना अनशन तोड़ भी देते हैं, तो इससे इस आंदोलन का महत्व रत्ती भर भी कम नहीं होगा.

वांगचुक के अनशन ने परीक्षाओं, जवाबदेही और छात्रों व युवाओं के दर्द की तरफ पूरे देश का ध्यान खींचने का काम बखूबी किया है, वांगचुक का अनशन वह कर दिखाने में कामयाब रहा है, जिसमें दिपके नाकाम रहे थे. अब उनका अनशन खत्म होने से यह बहस कमजोर नहीं पड़ेगी. यह फैसला सिर्फ 59 वर्ष के एक सामाजिक कार्यकर्ता के शरीर को उस संदेश की भारी कीमत चुकाने से बचा लेगा, जिसे यह देश पहले ही सुन और समझ चुका है.

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