तकनीकी रूप से बताया जाए तो रेपो रेट वह ब्याज दर होती है जिस पर रिजर्व बैंक देश के कमर्शियल बैंकों को उनके दैनिक कामकाज के लिए कर्ज देता है. देखने-सुनने में यह भले दो बैंकों के बीच की बात लगे, लेकिन जैसे ही रेप रेप बढ़ने की खबर आती है, आम आदमी की जेब पर इसका असर बेहद पेंचीदा और खर्चीला हो जाता है. साढ़े तीन साल बाद RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की है. इसके पीछे तर्क ये दिया गया है कि ईरान वॉर के कारण देश में बढ़ती महंगाई को 6 फीसदी के भीतर रोके रखने के लिए यह कदम उठाया गया है.
रिजर्व बैंक की दलील और उसके सामने के हालात अपनी जगह है, लेकिन आपकी और हमारी रसोई तक पहुंचने वाला यह एक बड़ा झटका भी है. बैंक को मिलने वाला महंगा कर्ज घूम-फिरकर आखिरकार आम इंसान की EMI, मकान के सपने और महीने के बजट पर ही भारी पड़ता है.
रेपो रेट बढ़ने की पूरी कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. 2020 में जब कोविड महामारी की वजह से सब कुछ बंद पड़ गया था, तब बाजार में पैसे का बहाव बनाए रखने के लिए रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें घटा दी थीं, ताकि लोग आसानी से लोन ले सकें और ठप पड़ी अर्थव्यवस्था में थोड़ी जान आए. लेकिन महामारी का दौर ढलते ही दुनिया में एक के बाद एक नए संकट शुरू हो गए.
पहले रूस-यूक्रेन का झगड़ा और अब ईरान-अमेरिका के बीच जारी जंग ने कच्चे तेल से लेकर दुनिया भर के बाजारों में आग लगा दी है. भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल बाहर से मंगवाता है. जब दुनिया में तेल महंगा होता है, तो देश के भीतर माल ढुलाई महंगी हो जाती है, जिससे बाजार में हर चीज का भाव चढ़ जाता है. इस वैश्विक उथल-पुथल ने भारत में महंगाई को इस कदर भड़का दिया कि रिजर्व बैंक को साढ़े तीन साल बाद दरों में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी का फैसला लेना ही पड़ा.
रिजर्व बैंक की नजरिया: महंगाई की आग बुझाने की मजबूरी
रिजर्व बैंक की अपनी एक तय जिम्मेदारी है- बाजार में घूम रहे पैसे को इस तरह संभालना कि कीमतें काबू से बाहर न जाएं. जब बाजार में महंगाई का ग्राफ ऊपर भागने लगता है, तो रिजर्व बैंक का मानना होता है कि लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसा थोड़ा कम किया जाए. ताकि डिमांड घटे और कीमतें स्थिर हों.
अर्थशास्त्री इस पहलू पर सहमति देते हुए समझाते हैं कि जब महंगाई लंबी खिंच जाती है, तो वह आम परिवार की पूरी बचत को निगल जाती है. रिजर्व बैंक ने रेपो रेट बढ़ाकर एक तरह से ब्रेक लगाने की कोशिश की है. उसके लिए प्राथमिकता विकास की रफ्तार से ज्यादा इस बात की है कि रोजमर्रा के सामान इतने महंगे न हो जाएं कि आम इंसान की खरीदने की ताकत ही खत्म हो जाए.
मोदी सरकार का नजरिया: भले राजनीतिक जोखिम हो, अर्थव्यवस्था का संतुलन जरूरी
मोदी सरकार के लिए रिजर्व बैंक का यह फैसला एक कड़वी दवा जैसा है. एक तरफ सरकार चाहती है कि देश में नए उद्योग लगें, लोग कारोबार शुरू करें और युवाओं को नौकरियां मिलें, जिसके लिए सस्ते लोन की जरूरत होती है. कर्ज महंगा होने से व्यापार की रफ्तार धीमी पड़ने का डर रहता है. इतना ही नहीं, सरकार यह अच्छी तरह जानती है कि रेपो रेट बढ़ने से जब EMI बढ़ेगी, तो भी लोग सरकार को ही कोसेंगे.
लेकिन दूसरी तरफ, सरकार यह भी अच्छी तरह जानती है कि आम इंसान के लिए महंगाई से बड़ा कोई दर्द नहीं होता. अगर राशन, तेल और सब्जियों के दाम लगातार बढ़ते रहे, तो जनता का गुस्सा सीधे सरकार पर ही फूटता है. इसलिए सरकार के नजरिये से यह कदम भले ही थोड़े समय के लिए अप्रिय हो, लेकिन देश की आर्थिक साख बचाए रखने और रुपये को टूटने से रोकने के लिए यह कदम उठाना उसकी भी एक राजनीतिक मजबूरी बन गया है.
आम नागरिक का संकट: बजट और सपनों पर टूटा पहाड़
मध्यमवर्गीय और कामकाजी परिवारों के लिए इस फैसले का मतलब है हर महीने का गणित गड़बड़ा जाना. जब रिजर्व बैंक से बैंकों को महंगा कर्ज मिलेगा, तो बैंक बिना देर किए इसका बोझ अपने ग्राहकों पर डाल देंगे. इसका सबसे बड़ा थप्पड़ उन लोगों को लगेगा जिन्होंने होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन ले रखा है.
इसे ऐसे समझिये कि अगर आपने 50 लाख रुपये का होम लोन 20 साल के लिए 8.5 प्रतिशत की दर से लिया है, तो 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी से आपकी मासिक EMI तो थोड़ी ही बढ़ेगी, लेकिन पूरे लोन की अवधि में कुल ब्याज भुगतान लाखों रुपये बढ़ जाएगा.
अब आम आदमी के पास दो ही रास्ते बचते हैं- या तो वह अपनी महीने की EMI बढ़ाए, जिससे महीने का बाकी खर्च चलाना मुश्किल हो जाएगा, या फिर वह अपने लोन की समय-सीमा बढ़वाए. लोन की अवधि बढ़ाना देखने में राहत भरा लगता है, लेकिन लंबे समय में यह और भी महंगा साबित होता है क्योंकि इसमें ब्याज का जाल बढ़ता ही चला जाता है.
हालांकि, इसका एक छोटा सा फायदा उन बुजुर्गों या बचतकर्ताओं को मिल सकता है जो अपनी जमा पूंजी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में रखते हैं, क्योंकि आने वाले समय में बैंक जमा पर भी ब्याज बढ़ा सकते हैं. लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि लोन की ब्याज दरें रातों-रात बढ़ा दी जाती हैं, जबकि एफडी पर बढ़ा हुआ ब्याज मिलने में महीनों लग जाते हैं.
कुल मिलाकर देखा जाए तो रेपो रेट में इस बढ़ोतरी से रिजर्व बैंक कागजों पर अपना हिसाब-किताब दुरुस्त कर लेगा और महंगाई का आंकड़ा टारगेट के भीतर आ जाएगा.
सरकार के सिर से भी यह बोझ हट जाएगा कि उसने अंतरराष्ट्रीय संकटों और महंगाई को रोकने के लिए जरूरी आर्थिक कदम उठा लिए हैं. देश की मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिति का रिपोर्ट कार्ड देखने में भले ही ठीक-ठाक लगने लगे.
लेकिन इन सारे बड़े-बड़े आंकड़ों, पॉलिसी डिबेट और रिजर्व बैंक के फैसलों के बीच आखिर में पिसने वाला सिर्फ और सिर्फ आम आदमी ही है. एक तरफ बाजार में पहले से ही खाने-पीने की चीजें महंगी हैं, तो दूसरी तरफ अब बैंक खाते से कटने वाली EMI का मैसेज दिल की धड़कनें बढ़ाएगा.
धीरेंद्र राय