महाकुंभ आयोजन की खामियों पर मोदी-योगी को घेरने का मौका इसलिए चूक गया विपक्ष

अगर कांग्रेस सहित प्रमुख विपक्षी पार्टियां कुंभ में उत्साह से शामिल हुईं होतीं तो कुंभ में हुए हादसे, नई दिल्ली स्टेशन पर हुईं मौतें और भारी दुर्व्यवस्था की बात पर देश की जनता उनकी बातों पर जरूर गौर करती. चूंकि विपक्ष ने पहले ही कुंभ को बीजेपी का आयोजन बना दिया था इसलिए उनकी बातों पर आम लोगों को कैसे यकीन हो?

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महाशिवरात्रि के दिन महाकुंभ में अंतिम शाही स्नान महाशिवरात्रि के दिन महाकुंभ में अंतिम शाही स्नान

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 28 फरवरी 2025,
  • अपडेटेड 12:27 PM IST

प्रयागराज में 2025 का महाकुंभ संपन्न हो चुका है. सरकारी आंकड़ों की मानें तो करीब 65 करोड़ लोगों ने कुंभ में स्नान किया. इस तरह देश की कुल आबादी के आधे से कुछ कम लोगों ने संगम में डुबकी लगा ली. देश में कुल 90 करोड़ मतदाता हैं. मान लीजिए कि संगम में स्नान करने वालों में कुल 20 प्रतिशत बच्चे रहे हों तो भी देश के आधे से अधिक मतदाता प्रयागराज पहुंचे. जाहिर है कि अगर देश की इतनी बड़ी जनसंख्या को कोई राजनीतिक दल इग्नोर करता है तो वह अपने पैर पर कुल्हाड़ी ही मार रहा है.

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हो सकता है कि कुंभ में स्नान करने वाले में बहुत से बीजेपी के विरोधी हों पर वो थे तो हिंदू ही. अगर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आरजेडी और टीएमसी जैसे राजनीतिक दलों के नेताओं ने इन श्रद्धालुओं का मजाक बनाया है तो जाहिर है बीजेपी उसे कैश कराने के लिए हर हथकंडे का इस्तेमाल करेगी. अगर कांग्रेस सहित सभी प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने कुंभ में उत्साह से शामिल हुए होते तो कुंभ में हुए हादसे, नई दिल्ली स्टेशन पर हुईं मौतें और भारी दुर्व्यवस्था की होती तो देश की जनता उनकी बातों पर जरूर गौर करती. चूंकि विपक्ष ने पहले ही कुंभ को बीजेपी का आयोजन बना दिया था, इसलिए यूपी सरकार और केंद्र सरकार को घेरने का मौका भी उन्होंने अपने हाथे से जाने दिया.

विपक्ष के बड़े नेताओं का महाकुंभ को लेकर रवैया दुखदायी था

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विपक्षी दलों ने केंद्र और यूपी सरकार को प्रयागराज और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुई दो भगदड़ों के लिए जिम्मेदार ठहराया, जिनमें कई लोगों की जान चली गई. विपक्ष के आरोपों में दम है कि आयोजन का बड़े पैमाने पर प्रचार करने के बावजूद सरकार भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए. लेकिन जब विपक्ष ने महाकुंभ पर राजनीति ही गलत तरीके से की तो जनता कैसे उस पर विश्वास करे.पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस आयोजन को मृत्यु-कुंभ कहती हैं. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे कहते हैं कि क्या गंगा में डुबकी लगाने से गरीबी खत्म हो जाएगी? क्या इससे आपको पेट भरने के लिए खाना मिल जाएगा? आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने तो कुंभ को फालतू ही बता दिया.अब जो लोग तमाम परेशानियां झेलकर महाकुंभ पहुंच रहे थे क्या इन नेताओं की बातें उन्हें पसंद आई होगी. जब पहले ही दिमाग में ये बैठ गया कि विपक्षी महाकुंभ का मजाक उड़ा रहे है तो आम जनता का पहला परसेप्शन यही बनता है कि विपक्ष नहीं चाहता है कि यह आयोजन सफल हो. इस परसेप्शन के बाद विपक्ष कोई भी सवाल उठाए उसका मतलब आम लोगों के लिए कुछ भी नहीं रह जाता है.

महाकुंभ पर कन्फ्यूज विपक्ष सरकार को कैसे घेर सकता है?

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राम मंदिर के उद्घाटन पर आयोजन समिति ने देश भर के बहुत से लोगों को आमंत्रित किया था. माना जा रहा था कि सरकार जिसे चाह रही थी उसे बुला रही थी. मंदिर समिति ने विपक्ष के लगभग हर नेता को बुलावा भेजा था. बहुत से लोगों ने राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में न जाने का बहाना यही बनाया कि उन्हें ठीक ढंग से बुलाया नहीं गया. अखिलेश यादव उनमें से एक थे. पर अखिलेश यादव ने महाकुंभ में डुबकी लगाकर पहले ही यह जता दिया था कि वह सनातन विरोधी नहीं हैं. इसलिए उनका आयोजन में कमियों को उजागर करना काफी हद तक ठीक लग रहा था. पर बाद में अखिलेश भी केवल विरोध के नाम पर विरोध करने लगे. पहले यह कहते रहे कि कुंभ में कोई जा नहीं रहा है, फिर ये कहे कि वहां जाने लायक नहीं है, फिर कहा कि पानी जहरीला हो गया है. हद तो तब हो गई जब अखिलेश ने कहा कि चूंकि देश में अभी बहुत से लोग कुंभ में नहीं जा सके हैं इसलिए इसकी अवधि कुछ दिनों के लिए बढ़ा दी जाए. यह कहकर उन्होंने साबित कर दिया कि कुंभ कोई धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सरकार का आयोजन है. सरकार जब चाहे कुंभ करा सकती है और जब चाहे खत्म कर सकती है. जबकि पूरे देश का हिंदू जानता है कि कुंभ का आयोजन निश्चित समय पर हिंदू पंचांग के अनुसार ही आरंभ और संपन्न होता है. 

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अगर अखिलेश महाकुंभ जा सकते थे दूसरे क्यों नहीं

एक तरफ विपक्ष के नेता महाकुंभ पर इस तरह का सवाल उठाते हैं जो हास्यास्पद है. देश के टॉप क्रम में आने वालों में अखिलेश यादव को छोड़कर कोई भी विपक्ष का नेता महाकुंभ में नहीं पहुंचा. गांधी फैमिली इसके पहले महाकुंभ में जाती रही है. 2001 में, जब सोनिया गांधी विपक्ष की नेता थीं और उनकी भारतीयता पर सवाल उठाए जा रहे थे, तब भी उन्होंने कुंभ में स्नान किया था. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि कांग्रेस नेताओं के अनुसार, 2007 में सोनिया गांधी दोबारा कुंभ जाना चाहती थीं, लेकिन तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार द्वारा सुरक्षा न दिए जाने के कारण उनकी यात्रा रद्द हो गई. प्रियंका गांधी ने भी प्रयागराज पहुंचकर एक बार कुंभ में डुबकी लगाई थी. पर इस बार गांधी परिवार ने महाकुंभ से दूरी बनाकर इसे बीजेपी का आयोजन बना दिया. पर कन्फ्यूजन देखिए कि पार्टी के दूसरे नंबर के नेतृत्व ने कूद-कूद कर संगम नहाया है. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू, कर्नाटक के डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार, सचिन पायलट तक संगम में डुबकी लगाने पहुंचे. मतलब साफ है कि विपक्ष यह तय नहीं कर सका कि कुंभ का विरोध करना है या निश्चित दूरी बनाकर रहना है. 

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