नीतीश कुमार को लेकर BJP के पास कोई प्‍लान-बी नहीं, सवाल मोदी सरकार का भी है

बिहार विधानसभा चुनावों के बाद अगर एनडीए जीतती है तो क्या एक बार सीएम नीतीश कुमार ही बनेंगे? यह सवाल आज बिहार ही नहीं देश की जनता के बीच भी उलझा हुआ है. गृहमंत्री अमित शाह के एक बयान को लेकर विपक्ष तरह तरह की बातें कर रहा है. पर क्या यह संभव है कि बीजेपी नीतीश कुमार को फिर सीएम बनने से रोक ले?

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नीतीश कुमार और अमित शाह नीतीश कुमार और अमित शाह

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 17 अक्टूबर 2025,
  • अपडेटेड 3:05 PM IST

दिल्ली के एक बहुत पुराने पत्रकार जो अब मशहूर यूट्यूबर बन चुके हैं, पटना के एक मैदान में जुटी लड़कियों से मिलते हैं. ये सभी लड़कियां राज्य के सुदूरवर्ती इलाकों से पुलिस भर्ती की तैयारी के लिए पटना आईं हुईं हैं. किसी कोचिंग सेंटर में वे क्लास लेती हैं और फिजिकल टेस्ट के लिए मैदान में कुछ एक्सरसाइज वगैरह कर रही हैं. इस पुराने पत्रकार से बात करते हुए लड़कियां खुलकर नीतीश कुमार को वोट देने की बात करती हैं. ये पत्रकार महोदय आम तौर पर बीजेपी विरोधी के रूप में जाने जाते हैं. करीब 2 से 3 दर्जन लड़कियों के बीच उन्हें केवल 2 लड़कियां ऐसी मिलती हैं जो एक बार जन सुराज पार्टी को आजमाना चाहती हैं. हालांकि ये दोनों लड़कियां भी नीतीश कुमार से प्रभावित हैं.

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उपरोक्त कहानी सुनाने का मतलब सिर्फ इतना है कि बिहार में पिछले 20 साल से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार यूं ही नहीं कब्जा जमाए हुए हैं. यूं ही नहीं कम विधायक होते हुए भी बीजेपी हो या आरजेडी थाली में सजाकर सीएम की कुर्सी उन्हें भेंट करने को तैयार रहती हैं. दरअसल नीतीश कुमार राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं. उन्होंने बिहार में ईबीसी वोटर्स और महिला वोटर्स का अपना इतना बड़ा बैंक तैयार कर रखा है कि दिल्ली में बैठे लोग उसे बिना बिहार में पहुंचे समझ नहीं सकते हैं.

शायद यही कारण है कि देश के गृहमंत्री अमित शाह शुक्रवार को नीतीश कुमार से मिलने पटना में उनके घर पहुंचे हैं. दरअसल गुरुवार को शाह के आज तक पंचायत में दिए गए बयान का अर्थ यह निकाला गया कि एनडीए के जीतने पर विधायक तय करेंगे कि बिहार का सीएम कौन होगा? जाहिर है कि कहीं मतदाताओं के बीच गलत संदेश न चला जाए इसलिए शाह खुद ही सीएम के घर पहुंच गए.

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1-सीट बंटवारे में ही तय हो गया था कि जेडीयू को इग्नोर नहीं किया जा सकता है

एनडीए का सीट बंटवारा एक स्पष्ट संदेश देता है कि जनता दल यूनाइटेड को इग्नोर करना नामुमकिन है. कुल 243 सीटों में बीजेपी और जेडीयू को 101-101 सीटें मिलीं. यह समानता न सिर्फ नीतीश कुमार के नेतृत्व को मजबूत करती है, बल्कि बीजेपी की रणनीतिक मजबूरी को उजागर करती है. LJP(रामविलास) को 29 सीटें और HAM-RLM को 6-6 सीटें मिली हैं. जाहिर है कि एनडीए विरोधी यह आरोप लगा रहे हैं कि नीतीश कुमार को बाहर करने की पूरी तैयारी कर ली गई है. इसके लिए लोजपा को जानबूझकर 29 सीट दी गई है. 

अब सोचिए कि जब 2020 में बीजेपी ने जनता दल यूनाइटेड से 29 सीटें अधिक जीतकर भी सीएम नीतीश कुमार को बनाया था. अगर नीतीश कुमार को किनारे लगाने की मंशा होती तो 2020 के आधार पर उनकी सीटें कम कर दी गईं होती. पर ऐसा नहीं किया गया. जो लोग महाराष्ट्र और एकनाथ शिंदे का उदाहरण देते हैं उन्हें समझ लेना चाहिए कि वहां पर चुनाव के पहले ही एकनाथ शिंदे की पार्टी शिवसेना को बीजेपी से कम सीटें देकर यह जता दिया गया था कि बीजेपी हर हाल में बड़ा भाई ही है. पर बिहार में बीजेपी को ऐसा करने की हिम्मत नहीं हुई.

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2-न नीतीश कुमार एकनाथ शिंदे हैं, और न बिहार में बीजेपी के पास कोई फडणवीस

नीतीश कुमार देश के एक बड़े नेता रहे हैं. कभी उनकी गिनती प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में होती थी. 2022 में फडणवीस ने शिवसेना फोड़ी, शिंदे को CM बनाया. नीतीश कुमार किसी पार्टी को तोड़कर एनडीए में नहीं आए हैं. नीतीश का कुर्मी-कोइरी-EBC वोट (40%) BJP के मुकाबले आज भी बड़ा है. नीतीश कुमार ने 9 बार सरकार बदली, लेकिन JDU कभी टूटा नहीं, बल्कि उनके नेतृत्व में हमेशा मजबूत बना रहा. 

दूसरी तरफ BJP के पास देवेंद्र फडणवीस की तरह पूरे राज्य भर में मशहूर कोई लीडर नहीं है.सम्राट चौधरी/दिलीप जायसवाल फडणवीस जितने चतुर और जनता के बीच पैठ नहीं रखते है. दूसरे प्रशांत किशोर ने तो सम्राट चौधरी पर ऐसे ऐसे आरोप लगा दिए हैं कि अब वो बीजेपी के लिए बोझ बन चुके हैं.

इसके अलावा नीतीश का कद इतना बड़ा है कि यदि वे आज भी बीजेपी से छिटक कर महागठबंधन का हिस्‍सा बनना चाहें तो वहां उनका स्‍वागत मुख्‍यमंत्री बनाकर ही होगा. यानी, नीतीश एनडीए में रहें या महागठबंधन में, बिहार की राजनीति के किंग वही हैं. ऐसे में बीजेपी जबरन कोई मुसीबत मोल नहीं लेगी. वो भी तब जबकि जेडीयू के 12 सांसद केंद्र में मोदी सरकार को समर्थन दे रहे हैं. ऐसे में नीतीश को बिहार का सीएम बनाए रखने में ही दोनों पार्टियों का फायदा है.

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3-बीजेपी के लिए लोकप्रियता पैमाना नहीं है पर बिहार में नीतीश की बात अलग है

नीतीश कुमार की बिहार में लोकप्रियता से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है. आज भी महिला वोटर्स और ईबीसी उनके साथ मजबूती से खड़े हैं. पर राजनीति में यह कोई महत्व नहीं रखता है. आपको याद होगा कि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान कितने लोकप्रिय मुख्यमंत्री थे. महिलाओं के बीच भी वो लोकप्रिय थे. पर चुनाव जीतने के बाद उन्हें हटाने में बीजेपी ने तनिक भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई.

इसी तरह महिलाओं के खाते में हर महीने कैश पहुंचाने की स्कीम और कई लोककल्याणकारी योजनाओं को लागू करने को लेकर महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को भी हटाने में बीजेपी ने देर नहीं लगाई . जाहिर है कि विपक्ष इन दोनों उदाहरणों को लेकर बीजेपी को आए दिन घेरता रहता है. इसी आधार पर विपक्ष कहता है कि चुनावों के बाद नीतीश कुमार को बीजेपी एकनाथ शिंदे बना देगी.

पर क्या आप यह नहीं समझते कि एकनाथ शिंदे के पास महाराष्ट्र में और शिवराज सिंह चौहान के पास मध्यप्रदेश में किसी के साथ जाने का कोई विकल्प ही नहीं था. जबकि बिहार में ऐसा नहीं है. बीजेपी यह अच्छी तरह से समझती है कि चुनाव परिणाम आने के बाद नीतीश कुमार कभी भी महागठबंधन की ओर जा सकते हैं. और यह भी तय है कि आरजेडी उन्हें सीएम की कुर्सी देने को तैयार भी हो जाएगी. ऐसी दशा में बीजेपी कोई भी ऐसा काम नहीं करने वाली है जो  शायद यही कारण है कि चुनावों के बाद नीतीश कुमार का महत्व बना रहेगा.

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4-अमित शाह ने क्या कहा जिसके चलते बढ़ गई हलचल

दरअसल विपक्ष ने शाह के बयान लपक लिया गया. मीडिया में तमाम तरीके के अटकलें लगाई जाने लगीं. माहौल को भांपते हुए शुक्रवार को गृहमंत्री अमित शाह ने सीएम नीतीश कुमार के सीधे घर पहुंचकर इस चर्चा को विराम देने की कोशिश की है. पर क्या तार्किक तौर पर ऐसा संभव है कि विधानसभा चुनावों के बाद नीतीश कुमार को बीजेपी किनारे लगा सके?

दरअसल 16 अक्टूबर को पटना के एक प्रमुख सभागार में 'पंचायत आजतक-बिहार' कार्यक्रम में अमित शाह ने एनडीए की रणनीति पर खुलकर बात की. कार्यक्रम के दौरान उनसे आज तक ने पूछा कि क्या नीतीश कुमार ही एनडीए के सीएम फेस रहेंगे, तो शाह ने जवाब दिया कि हम नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ रहे हैं. 2020 चुनावों के बाद भी, जब बीजेपी को ज्यादा सीटें मिलीं, तो नीतीश को ही सीएम बनाया गया, क्योंकि गठबंधन का सम्मान जरूरी है. जीत के बाद सभी सहयोगी मिलकर फैसला लेंगे. 

शाह ने नीतीश की स्वास्थ्य और 'पलटी' की अफवाहों को भी खारिज किया, कहा कि नीतीश जेपी आंदोलन के प्रमुख नेता रहे, इमरजेंसी के खिलाफ लड़े. उनका राजनीतिक जीवन कांग्रेस-विरोधी रहा है. इस बयान का तात्कालिक प्रभाव गठबंधन पर पड़ा. जेडीयू ने इसे 'सम्मान' का प्रतीक बताया, जबकि विपक्ष (आरजेडी) ने इसे 'बीजेपी की मजबूरी' करार दिया. शाह ने आगे कहा, एनडीए का फोकस विकास पर है. नीतीश के नेतृत्व में बिहार ने सड़कें, बिजली और शिक्षा में प्रगति की है. शाह का बयान गठबंधन को मजबूत करने का प्रयास था, जो दर्शाता है कि नीतीश को इग्नोर करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है.

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