मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दमोह स्कूल मामले में दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया है. स्कूल के पदाधिकारियों पर छात्राओं को हिजाब पहनने और खास धार्मिक रीति-रिवाजों को मानने के लिए मजबूर करने का आरोप है. राहत देने से इनकार करते हुए जस्टिस हिमांशु जोशी की बेंच ने कहा कि छात्राओं को धमकी देकर मजबूर करने के खास आरोपों को बेबुनियाद नहीं कहा जा सकता और इनकी सच्चाई का पता सबूतों के आधार पर ही लगाया जाना चाहिए.
हाई कोर्ट ने गंगा जमना स्कूल के पूर्व पदाधिकारी शैलेंद्र कुमार जैन, अब्दुल वसीम बारी, टीचर अनस अथर और चपरासी रुस्तम अली की याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिन्होंने FIR को रद्द करने की मांग की थी.
हिजाब, नमाज और उर्दू को लेकर क्या आरोप?
FIR में आरोप लगाया गया था कि स्कूल में छात्राओं के लिए हिजाब पहनना, नमाज पढ़ना और उर्दू भाषा सीखना अनिवार्य किया गया था. साथ ही आरोप था कि हिंदू और जैन छात्राओं को तिलक लगाने और कलावा बांधने से रोका जाता था.
मामले में IPC की धारा 295-A, 120-B और 506 के अलावा जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और मध्य प्रदेश धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 के प्रावधानों के तहत भी केस दर्ज किया गया था.
कोर्ट ने गौर किया कि FIR में खास आरोप थे कि छात्रों को धमकी और दबाव के जरिए उनकी मर्जी के खिलाफ एक खास ड्रेस कोड और धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने के लिए मजबूर किया गया था.
कोर्ट ने कहा कि इसलिए याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आरोपों को शुरुआती तौर पर बेबुनियाद नहीं कहा जा सकता और उनकी सच्चाई का पता सबूतों के आधार पर ही लगाया जाना चाहिए. बता दें कि पुलिस इस मामले में पहले ही चार्जशीट दाखिल कर चुकी है.
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