मध्य प्रदेश के जंगलों में क्या दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले जानवर भी सुरक्षित नहीं हैं. कूनो नेशनल पार्क से जुड़े 19 महीने के नर चीते KNG22 की मौत ने इस सवाल को गंभीर बना दिया है. चीते के शरीर से एक-दो नहीं, बल्कि पांच गोली के छर्रे निकाले गए. उसे बचाने के लिए इलाज किया गया, विशेषज्ञों की मदद ली गई और सर्जरी भी हुई, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद 27 अक्टूबर को उसकी मौत हो गई. अब इस घटना की जांच के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने विशेष कार्यबल यानी एसटीएफ गठित की है. वहीं केंद्र सरकार ने भी उच्चस्तरीय टीम को जांच के लिए मध्य प्रदेश भेजा है.
यह घटना सिर्फ एक चीते की मौत तक सीमित नहीं है. इसने भारत में चीतों को फिर से बसाने के लिए शुरू किए गए प्रोजेक्ट चीता की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. सवाल यह है कि जिस परियोजना के तहत चीतों की निगरानी के लिए टीमें और आधुनिक तकनीक इस्तेमाल की जा रही है, वहां एक चीता गोली के छर्रों से गंभीर रूप से घायल कैसे हो गया. हालांकि, घटना के पीछे किसका हाथ है और चीते को गोली किन परिस्थितियों में लगी, इसका जवाब जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा.
25 अक्टूबर को घायल मिला था KNG22
कूनो नेशनल पार्क की मादा चीता निरवा का 19 महीने का नर शावक KNG22, 25 अक्टूबर को घायल हालत में मिला था. वह कूनो के संरक्षित क्षेत्र से बाहर एमपी के मुरैना इलाके के जंगल में था. उसे रेस्क्यू कर इलाज के लिए कूनो लाया गया. शुरुआती जांच के बाद उसकी हालत को देखते हुए बेहतर इलाज के लिए जबलपुर स्थित पशु चिकित्सा सुविधा में भेजा गया.
डॉक्टरों ने चीते की चोटों की गंभीरता का पता लगाने के लिए एक्स-रे और सीटी स्कैन किया. जांच में उसके शरीर के अलग-अलग हिस्सों में बाहरी वस्तुएं दिखाई दीं. इसके बाद इलाज के दौरान सर्जरी की गई. सर्जरी में उसके शरीर से पांच फायरआर्म पेलेट्स यानी गोली के छर्रे निकाले गए. इन छर्रों के कारण उसके आंतरिक अंगों, मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा था.
डॉक्टरों ने उसे बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन चोटें इतनी गंभीर थीं कि 27 अक्टूबर की सुबह KNG22 ने दम तोड़ दिया. इसके बाद साफ हो गया कि यह मामला सामान्य चोट या किसी जानवर के हमले तक सीमित नहीं था. चीते के शरीर से मिले छर्रों ने गोली लगने की आशंका को सामने ला दिया और मामले की गंभीरता बढ़ गई.
निगरानी के बावजूद कैसे घायल हुआ चीता
KNG22 की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल निगरानी व्यवस्था को लेकर उठ रहा है. प्रोजेक्ट चीता के तहत चीतों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए निगरानी टीमें तैनात हैं. रेडियो या सैटेलाइट कॉलर जैसी तकनीक से उनकी लोकेशन का पता लगाने में मदद मिलती है. इसके बावजूद चीता संरक्षित क्षेत्र से बाहर घायल हालत में मिला और उसकी जान नहीं बचाई जा सकी.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चीते की गतिविधियों पर नजर रखने में कोई चूक हुई. क्या उसके घायल होने के बाद समय रहते मदद पहुंच पाई. क्या संरक्षित क्षेत्र के आसपास वन्यजीवों के लिए खतरा बन सकने वाली गतिविधियों पर पर्याप्त निगरानी थी. इन सवालों के जवाब फिलहाल जांच के दायरे में हैं.
यह भी समझना जरूरी है कि किसी जानवर की लोकेशन का पता चलना और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना दो अलग-अलग बातें हैं. कॉलर या दूसरी तकनीक से जानवर की मौजूदगी का संकेत मिल सकता है, लेकिन खतरे की स्थिति में समय पर मौके पर पहुंचना और उसे सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है. KNG22 की मौत के बाद निगरानी से लेकर मैदानी कार्रवाई तक की व्यवस्था की जांच महत्वपूर्ण हो गई है.
राज्य सरकार ने बनाई एसटीएफ, केंद्र ने भेजी टीम
घटना की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने वन और पुलिस अधिकारियों को शामिल करते हुए विशेष कार्यबल यानी एसटीएफ का गठन किया है. यह टीम चीते के घायल होने और उसकी मौत के कारणों की जांच करेगी. जांच में यह पता लगाने की कोशिश होगी कि चीते को गोली कैसे लगी और इसके लिए कौन जिम्मेदार है.
केंद्र सरकार ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए 28 अक्टूबर को उच्चस्तरीय टीम मध्य प्रदेश भेजी. इस टीम में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी एनटीसीए के वन महानिरीक्षक, वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो यानी डब्ल्यूसीसीबी के अतिरिक्त निदेशक और डब्ल्यूसीसीबी के क्षेत्रीय उपनिदेशक शामिल हैं.
केंद्रीय टीम घटना से जुड़े सबूतों की जांच करेगी और मध्य प्रदेश वन विभाग के साथ मिलकर काम करेगी. उसे यह भी देखना है कि चीतों की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियमों, निगरानी व्यवस्था और सुरक्षा उपायों को किस तरह लागू किया जा रहा है. जांच के बाद टीम अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपेगी. इसके आधार पर आगे की कार्रवाई और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी कदम तय किए जा सकते हैं.
क्या आसपास के जंगलों में शिकारियों का खतरा बढ़ रहा है
KNG22 की मौत ने कूनो और आसपास के जंगलों में वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस क्षेत्र में पहले भी तेंदुओं के शिकार से जुड़े मामले सामने आए हैं. बीते दिनों छह तेंदुओं के शिकार का मामला सामने आने की बात भी कही गई है. ऐसे मामलों के कारण वन्यजीवों के शिकार और वन विभाग की निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठते रहे हैं.
हालांकि, तेंदुओं के शिकार से जुड़े मामलों और KNG22 की मौत के बीच किसी संबंध की पुष्टि नहीं हुई है. यह जांच का विषय है कि चीते को किसने और किन परिस्थितियों में गोली मारी. बिना जांच पूरी हुए किसी व्यक्ति या समूह को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा.
फिर भी इस घटना ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि जंगलों में वन्यजीवों को गोली लगने जैसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं. अगर संरक्षित क्षेत्र से बाहर जाने वाले चीतों को खतरा है, तो उनकी निगरानी के साथ आसपास के इलाकों में सुरक्षा और वन्यजीव अपराधों पर रोक लगाने की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी.
विशेषज्ञों ने उठाए सवाल, कांग्रेस ने सरकार को घेरा
चीते की मौत के बाद वन्यजीव विशेषज्ञों ने सुरक्षा व्यवस्था और घटना की जांच को लेकर सवाल उठाए हैं. वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट अजय दुबे ने इस मामले पर चिंता जताई है. वहीं, मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी चीते की मौत के बाद प्रोजेक्ट चीता और बीजेपी सरकार पर सवाल उठाए हैं.
इस मामले में राजनीतिक बयानबाजी के साथ-साथ जांच के निष्कर्ष भी महत्वपूर्ण होंगे. सबसे जरूरी यह पता लगाना है कि चीते को गोली कैसे लगी, घटना के समय उसकी निगरानी किस तरह की जा रही थी और क्या सुरक्षा व्यवस्था में कोई कमी रही. जांच से यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या बदलाव जरूरी हैं.
सितंबर 2022 में भारत में चीतों की वापसी के साथ प्रोजेक्ट चीता की शुरुआत हुई थी. इस परियोजना का उद्देश्य देश में चीतों को फिर से बसाना और उनके लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करना है. अब तक इस परियोजना को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. चीतों की मौतों के अलग-अलग कारण रहे हैं, लेकिन KNG22 की मौत इस वजह से अलग है कि उसके शरीर से पांच गोली के छर्रे निकाले गए.
2022 में शुरू हुई परियोजना के सामने नई चुनौती
दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में अब 58 चीते बचे हैं और परियोजना शुरू होने के बाद से अब तक 28 चीतों की मौत हो चुकी है. इन आंकड़ों के बीच KNG22 की मौत ने सुरक्षा व्यवस्था पर ध्यान देने की जरूरत को और बढ़ा दिया है.
चीतों की संख्या बढ़ाना इस परियोजना का एक अहम हिस्सा है, लेकिन उनकी सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है. सुरक्षित आवास, प्रभावी निगरानी, जंगलों के आसपास शिकार पर रोक और वन्यजीव अपराधों के खिलाफ समय पर कार्रवाई के बिना परियोजना के लक्ष्यों को हासिल करना मुश्किल होगा.
अब सबकी नजर एसटीएफ और केंद्र की टीम की जांच पर है. जांच में यह साफ होना चाहिए कि KNG22 को गोली कैसे लगी और ऐसी घटना को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए. क्योंकि प्रोजेक्ट चीता की सफलता केवल चीतों की वापसी से नहीं, बल्कि जंगलों में उनके सुरक्षित रहने से भी तय होगी.
रवीश पाल सिंह