मध्य प्रदेश में कस्टोडियल डेथ का आंकड़ा चौंकाने वाला, 5 साल में 46 मौतें, गरमाई सियासत

छतरपुर में दो संदिग्ध हिरासत मौतों ने पुलिस पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. परिवारों ने पुलिस प्रताड़ना के आरोप लगाए हैं. पिछले पांच साल में 46 कस्टोडियल डेथ के आंकड़े सामने आए हैं. मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है और निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है.

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पुलिस हिरासत में मौतों से उठे सवाल. (Photo: Representational) पुलिस हिरासत में मौतों से उठे सवाल. (Photo: Representational)

रवीश पाल सिंह

  • छतरपुर ,
  • 14 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 6:59 PM IST

मध्य प्रदेश में एक के बाद एक सामने आ रही हिरासत में मौत की घटनाओं ने कानून व्यवस्था और पुलिस पर भरोसे को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. छतरपुर जिले में हाल ही में हुई दो संदिग्ध मौतों ने इस बहस को फिर से जिंदा कर दिया है. कार्रवाई जरूर हुई है, लेकिन जिन परिवारों ने अपने लोगों को खोया है, उनके लिए न्याय अब भी अधूरा नजर आ रहा है.

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अस्पताल का एक दर्दनाक दृश्य इस पूरे मामले की गंभीरता को दर्शाता है, जहां एक मां की चीखें हर किसी को झकझोर देती हैं. उसका 23 वर्षीय बेटा रामविशाल अहिरवार, जो चंदला थाना क्षेत्र के नाहरपुर गांव का रहने वाला था, अब इस दुनिया में नहीं है. उसे पत्नी के साथ विवाद के बाद काउंसलिंग के लिए थाने बुलाया गया था.

परिवार के अनुसार, थाने में समझौते की प्रक्रिया चल रही थी, तभी रामविशाल ने जहरीला पदार्थ खा लिया. हालत बिगड़ने पर उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी. पीड़ित मां का आरोप है कि पुलिस ने थाने में बेटे के साथ मारपीट की और उसे प्रताड़ित किया, जिसके चलते उसने यह कदम उठाया.

काउंसलिंग के लिए बुलाए युवक की मौत

मामला बढ़ने के बाद छतरपुर के पुलिस अधीक्षक अगम जैन ने चंदला थाना प्रभारी संदीप दीक्षित को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया. हालांकि, यह घटना अकेली नहीं है. इससे पहले भी छतरपुर में एक और संदिग्ध मौत का मामला सामने आया था.

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करीब एक सप्ताह पहले 45 वर्षीय सुरेंद्र सिंह को गुंडा परेड के लिए थाने बुलाया गया था. कुछ समय बाद वह बेसुध हालत में मिला. उसे अस्पताल ले जाया गया और हालत गंभीर होने पर ग्वालियर रेफर किया गया, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई. परिवार का आरोप है कि सुरेंद्र की मौत पुलिस यातना के कारण हुई. इस मामले में थाना प्रभारी अरविंद दांगी को लाइन अटैच कर दिया गया है.

इन घटनाओं ने एक कई सवालों को खड़ा किया है.  क्या यह सिर्फ अलग-अलग घटनाएं हैं या फिर एक पैटर्न बनता जा रहा है. आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले पांच सालों में मध्य प्रदेश में कुल 46 लोगों की मौत पुलिस हिरासत में हो चुकी है.

2021-22 में 8
2022-23 में 8
2023-24 में 12
2024-25 में 8
2025-26 में अब तक 10 मौतें दर्ज हो चुकी हैं

रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी शैलेंद्र श्रीवास्तव का कहना है कि हर हिरासत में मौत पुलिस प्रताड़ना के कारण नहीं होती. कई मामलों में बीमारी या अन्य कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं. लेकिन उनका मानना है कि हर ऐसे मामले में सख्त जांच और कानूनी कार्रवाई जरूरी है ताकि सच्चाई सामने आ सके.

उन्होंने बताया कि हर कस्टोडियल डेथ के मामले में एफआईआर दर्ज होती है और न्यायिक जांच कराई जाती है. संबंधित थाने से अलग किसी अन्य अधिकारी द्वारा विभागीय जांच की जाती है. अगर कोई पुलिसकर्मी दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होता है और नौकरी तक जा सकती है. हालांकि, कई मामलों में पुलिसकर्मी जांच में निर्दोष भी पाए जाते हैं.

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अब यह मुद्दा राजनीतिक रंग भी ले चुका है. कांग्रेस के मीडिया विभाग के अध्यक्ष मुकेश नायक ने सरकार और पुलिस दोनों को कटघरे में खड़ा किया है. उन्होंने इन मामलों की निष्पक्ष जांच की मांग की है और कहा है कि कांग्रेस इस मुद्दे को विधानसभा में उठाएगी और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करेगी.

निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग तेज

छतरपुर की इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि मामला सिर्फ दो मौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सिस्टम और उस पर लोगों के भरोसे का सवाल बन चुका है. कार्रवाई और सस्पेंशन अपनी जगह हैं, लेकिन असली सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या इन मौतों की सच्चाई पूरी तरह सामने आ पाएगी या यह मामला भी लंबी कानूनी प्रक्रिया में उलझकर रह जाएगा.
 

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