मंत्री, सांसद और विधायकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा तय करने की मांग पर जस्टिस सैयद अब्दुल नजीर की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ आज अपना फैसला सुनाने वाली है. सुप्रीम कोर्ट यह तय कर सकता है कि मंत्रियों, सांसदों या विधायकों को किसी आपराधिक मामले पर गैर जिम्मेदाराना बयान देने से रोकने के लिए दिशानिर्देश बनाने चाहिए या नहीं. कोर्ट अपने फैसले में तय करेगा कि क्या जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग संवेदनशील मामलों पर विचार व्यक्त करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दावा कर सकते हैं?
अब जानकारी के लिए बता दें कि बुलंदशहर की एक बलात्कार पीड़िता के पिता द्वारा दायर रिट याचिका पर 2016 में मामले को एक बड़ी पीठ के पास भेजा गया था, जहां यह आरोप लगाया गया था कि राज्य के मंत्री और प्रमुख राजनीतिक व्यक्तित्व (आजम खान) ने पूरी घटना को "केवल राजनीतिक साजिश और कुछ नहीं" के रूप में करार दिया था. बाद में, आजम खान ने सामूहिक बलात्कार को "राजनीतिक साजिश" कहने के लिए माफी मांगी थी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया था. लेकिन मामले के अन्य पहलुओं को देखते हुए सुनवाई को जारी रखा था.
संविधान पीठ में जस्टिस सैयद अब्दुल नजीर के साथ जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस ए एस बोपन्ना, जस्टिस वी राम सुब्रमण्यम और जस्टिस बी वी नागरत्ना शामिल हैं. कोर्ट की ये सुनवाई कई मामलों में अहम साबित होने वाली है. राजनीतिक पार्टियां और उनके नेताओं द्वारा समय-समय पर विवादित बयान दे दिए जाते हैं. किसी आपराधिक मामले पर टिप्पणी करते हुए तो असंवेदनशील बयान भी दिए गए हैं. ऐसे में अब कोर्ट अगर कोई सख्त रवैया अपनाता है, उस स्थिति में वो सभी पार्टियों के लिए एक मिसाल साबित हो सकती है.
संजय शर्मा