रेपिडो-उबर में कब लगता है ज्यादा किराया? ये ट्रिक जान लेंगे तो पैसे लगेंगे कम

कभी 5 किलोमीटर की कैब 120 रुपये में मिल जाती है, तो कभी उसी रूट का किराया 300 रुपये से भी ऊपर पहुंच जाता है. बारिश हो या ऑफिस का पीक टाइम, उबर और रैपिडो का किराया अचानक बढ़ने की शिकायत लगभग हर यूजर करता है. आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या कंपनियां मनमर्जी से किराया बढ़ाती हैं या इसके पीछे कोई तय सिस्टम है? आइए आसान भाषा में समझते हैं.

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उबर और रैपिडो जैसी ऐप्स में किराया हमेशा एक जैसा नहीं रहता (Photo:ITG) उबर और रैपिडो जैसी ऐप्स में किराया हमेशा एक जैसा नहीं रहता (Photo:ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 जून 2026,
  • अपडेटेड 6:30 PM IST

अगर आपने भी कभी कैब बुक करते समय सोचा है कि कल तक यही राइड 180 रुपये की थी, आज 350 रुपये क्यों दिख रही है? तो इसका जवाब सर्ज प्राइसिंग में छिपा है.

उबर और रैपिडो जैसी ऐप्स में किराया हमेशा एक जैसा नहीं रहता. यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस वक्त कितने लोग कैब बुक कर रहे हैं और आसपास कितने ड्राइवर उपलब्ध हैं. यानी मांग ज्यादा और गाड़ियां कम होंगी, तो किराया अपने आप बढ़ जाएगा.

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उबर अपनी वेबसाइट पर भी बताता है कि जब किसी इलाके में अचानक राइड की डिमांड बढ़ जाती है और ड्राइवर कम होते हैं, तब सिस्टम किराया बढ़ा देता है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि ज्यादा ड्राइवर उस इलाके की तरफ आएं और लोगों को जल्दी कैब मिल सके.

आखिर किन मौकों पर सबसे ज्यादा बढ़ता है किराया?

अगर आप रोज कैब से सफर करते हैं तो आपने जरूर नोटिस किया होगा कि कुछ समय ऐसे होते हैं, जब किराया लगभग हर बार ज्यादा दिखता है. जैसे सुबह ऑफिस जाने का समय, शाम को घर लौटने का वक्त, तेज बारिश, त्योहार या किसी बड़े इवेंट के दौरान. एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन और बड़े मॉल के आसपास भी अक्सर यही स्थिति रहती है.इन जगहों पर एक साथ बड़ी संख्या में लोग कैब बुक करते हैं, जबकि ड्राइवर सीमित होते हैं. ऐसे में ऐप का एल्गोरिदम किराया बढ़ा देता है.

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रैपिडो में भी यही नियम लागू होता है?

हां. रैपिडो भी डिमांड और सप्लाई के हिसाब से डायनामिक प्राइसिंग का इस्तेमाल करता है. हालांकि कई बार बाइक टैक्सी होने की वजह से रैपिडो का किराया उबर से कम दिखाई देता है. इसलिए बुकिंग से पहले दोनों ऐप्स पर किराया देख लेना समझदारी है.

क्या आपकी पुरानी हिस्ट्री देखकर भी किराया तय होता है?

इंटरनेट पर अक्सर ऐसी बातें सामने आती रहती हैं कि ऐप आपकी पुरानी राइड्स, लोकेशन या व्यवहार के आधार पर भी किराया तय करती है.फोर्ब्स की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि आधुनिक एल्गोरिदम कई तरह के डेटा का इस्तेमाल करके यह अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं कि ग्राहक कितना भुगतान करने के लिए तैयार हो सकता है. हालांकि उबर का कहना है कि उसका सर्ज प्राइसिंग सिस्टम मुख्य रूप से डिमांड और ड्राइवरों की उपलब्धता पर आधारित है.

फोन की बैटरी कम होने पर क्या ज्यादा किराया लगता है?

यह दावा सोशल मीडिया पर कई बार वायरल हो चुका है कि अगर फोन की बैटरी कम हो तो ऐप ज्यादा किराया दिखाती है, क्योंकि यूजर जल्दी में होगा.लेकिन इस दावे की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. उबर पहले भी साफ कर चुका है कि वह फोन की बैटरी का इस्तेमाल सीधे तौर पर किराया तय करने के लिए नहीं करता. इसलिए इस दावे को सच मानने की बजाय अफवाह की तरह ही देखना चाहिए.

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ज्यादा किराया देने से कैसे बचें?

अगर हर बार बढ़ा हुआ किराया नहीं देना चाहते तो कुछ आसान बातों का ध्यान रखें. समय की बहुत जल्दी नहीं है तो 5 से 10 मिनट इंतजार कर लें. कई बार सर्ज प्राइसिंग अपने आप खत्म हो जाती है और किराया कम दिखाई देने लगता है.बुकिंग करने से पहले उबर और रैपिडो दोनों पर किराया जरूर चेक करें. कई बार दोनों ऐप्स के किराए में 100 रुपये तक का अंतर देखने को मिल जाता है.

अगर आप एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन के बिल्कुल बाहर खड़े हैं तो थोड़ा आगे जाकर बुकिंग करने पर भी किराया कम मिल सकता है, क्योंकि हाई-डिमांड जोन से बाहर आते ही कीमत बदल जाती है.जहां शेयर्ड राइड या पूल का विकल्प उपलब्ध हो, वहां उसका इस्तेमाल करना भी जेब पर हल्का पड़ सकता है.

सबसे जरूरी बात यह है कि बुकिंग करने से पहले ऐप में दिख रहा अपफ्रंट फेयर ध्यान से देखें. अगर कीमत सामान्य से काफी ज्यादा लगे और आपको जल्दी न हो, तो कुछ मिनट बाद दोबारा कोशिश करें.

उबर और रैपिडो का किराया किसी तय रेट पर नहीं चलता. यह हर मिनट बदल सकता है और इसके पीछे सबसे बड़ा कारण डिमांड और सप्लाई का संतुलन है. ऐसे में अगर आप थोड़ी प्लानिंग करें, अलग-अलग ऐप्स पर किराया तुलना करें और पीक टाइम से बचें, तो कई बार अच्छी-खासी बचत हो सकती है. अगली बार कैब का किराया देखकर चौंकने से पहले यह जरूर समझ लें कि उसके पीछे का गणित क्या है.

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