Gen-Z को 'ना' सुनना इतना मुश्किल क्यों लगता है? Psychologist ने बताई वजह

Gen Z के लोगों को कई बार किसी की ‘ना’ सुनना या रिजेक्ट होना बहुत बुरा लगता है. इसके पीछे एक वजह सोशल मीडिया भी हो सकता है, जहां लोगों को अक्सर लाइक, कमेंट और तारीफ मिलती रहती है. इससे कभी-कभी उन्हें दूसरों की तारीफ और मंजूरी की आदत हो जाती है.

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 आज के समय में सोशल मीडिया का भी लोगों की भावनाओं पर असर पड़ सकता है. ( Photo: ITG) आज के समय में सोशल मीडिया का भी लोगों की भावनाओं पर असर पड़ सकता है. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 23 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 3:14 PM IST

आज के समय में किसी की 'ना' सुनना किसी को भी अच्छा नहीं लगता. चाहे दोस्त मिलने से मना कर दे, कोई पसंद का व्यक्ति रिलेशनशिप के लिए इनकार कर दे या फिर नौकरी के लिए दिया गया आवेदन रिजेक्ट हो जाए. ऐसे समय में दुख होना बिल्कुल सामान्य है. लेकिन आजकल जेन-जी को लेकर अक्सर कहा जाता है कि इस पीढ़ी के लिए रिजेक्शन यानी अस्वीकार किया जाना एक्सेप्ट करना थोड़ा ज्यादा मुश्किल हो रहा है. आखिर ऐसा क्यों है? इस बारे में साइकोलॉजिस्ट पवन गुगरी ने आसान शब्दों में समझाया कि हर 'ना' को अपनी कमी समझ लेना ही सबसे बड़ी परेशानी बन सकता है.

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हर 'ना' का मतलब आपकी कमी नहीं है
साइकोलॉजिस्ट पवन गुगरी के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति हमें मना करता है तो हम कई बार तुरंत सोचने लगते हैं कि शायद हममें ही कोई कमी है. उदाहरण के लिए, अगर आपने किसी दोस्त को मिलने के लिए कहा और उसने मना कर दिया तो आपके मन में आ सकता है कि शायद वह आपको पसंद नहीं करता. लेकिन जरूरी नहीं कि ऐसा ही हो. हो सकता है वह उस दिन व्यस्त हो, थका हुआ हो या उसके पास कोई जरूरी काम हो.

इसे छोटे बच्चे के उदाहरण से भी समझ सकते हैं. मान लीजिए एक बच्चा अपने दोस्त से कहता है कि चलो खेलते हैं, लेकिन उसका दोस्त कहता है कि आज मैं नहीं खेल सकता. अब पहला बच्चा अगर यह सोचने लगे कि मेरा दोस्त मुझे पसंद नहीं करता, तो यह जरूरी नहीं कि उसकी सोच सही हो. हो सकता है दोस्त को पढ़ाई करनी हो या वह किसी काम में व्यस्त हो. ठीक इसी तरह, बड़े लोगों की जिंदगी में भी हर 'ना' का मतलब यह नहीं होता कि सामने वाला व्यक्ति आपको खराब या कम समझता है.

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सोशल मीडिया की तारीफ की पड़ सकती है आदत
साइकोलॉजिस्ट पवन गुगरी के मुताबिक, आज के समय में सोशल मीडिया का भी लोगों की भावनाओं पर असर पड़ सकता है. जेन-जी इंटरनेट और सोशल मीडिया के बीच बड़ी हुई है. यहां फोटो डालने पर लाइक मिलते हैं, वीडियो पर व्यूज आते हैं और लोग कमेंट करके तारीफ करते हैं. जब लगातार तारीफ और ध्यान मिलता है तो अच्छा महसूस होता है.

लेकिन अगर अचानक कोई व्यक्ति हमें नजरअंदाज कर दे, मैसेज का जवाब न दे या सीधे 'ना' कह दे, तो हमें बहुत बुरा लग सकता है. कई बार ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम अपनी खुशी और अपनी अहमियत को दूसरों की तारीफ से जोड़ने लगते हैं. अगर लोग हमारी तारीफ करें तो हम खुश होते हैं और अगर कोई मना कर दे तो हमें लगता है कि हमारी कीमत कम हो गई.

दूसरों का फैसला आपकी कीमत तय नहीं करता
साइकोलॉजिस्ट पवन गुगरी के मुताबिक, यह समझना बहुत जरूरी है कि दूसरे व्यक्ति का फैसला आपकी पूरी वैल्यू तय नहीं करता. किसी का आपको चुनना या न चुनना आपकी अच्छाई या बुराई का फैसला नहीं है. मान लीजिए आपने किसी नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन आपका सिलेक्शन नहीं हुआ. इसका मतलब यह नहीं कि आप काम के लायक नहीं हैं. हो सकता है कंपनी को उस समय किसी दूसरे तरह के अनुभव वाले व्यक्ति की जरूरत हो. इसी तरह, अगर कोई व्यक्ति रिलेशनशिप के लिए मना करता है तो इसका मतलब यह नहीं कि आपमें कोई कमी है. हर व्यक्ति की अपनी पसंद और अपनी परिस्थितियां होती हैं.

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सिर्फ जेन-जी को ही नहीं होता रिजेक्शन का दर्द
यह कहना सही नहीं होगा कि सिर्फ जेन-जी को ही रिजेक्शन से दुख होता है. पहले के लोगों को भी रिजेक्ट होने पर दुख, गुस्सा और निराशा होती थी. फर्क इतना हो सकता है कि आज के युवा अपनी फीलिंग्स के बारे में ज्यादा खुलकर बात करते हैं. सोशल मीडिया और इंटरनेट की वजह से लोग अपनी परेशानियां और भावनाएं दूसरों के साथ आसानी से शेयर कर लेते हैं. आज एंग्जायटी, स्ट्रेस और मेंटल हेल्थ जैसी बातों पर भी पहले की तुलना में ज्यादा चर्चा होती है. इसलिए कई बार हमें लगता है कि आज की जेन-जी रिजेक्शन को ज्यादा मुश्किल से संभालती है, जबकि हो सकता है कि वह सिर्फ अपनी फीलिंग्स को ज्यादा खुलकर बता रही हो.

पवन गुगरी कहते हैं कि किसी की 'ना' सुनकर दुखी होना बिल्कुल गलत नहीं है. अगर आपका मन खराब होता है तो यह सामान्य बात है. लेकिन जरूरी बात यह है कि दुखी होकर हम कैसे व्यवहार करते हैं. सामने वाले को बार-बार परेशान करना, गुस्सा करना या खुद को बेकार समझना सही तरीका नहीं है. हमें अपनी फीलिंग्स को समझना चाहिए और सामने वाले के फैसले का भी सम्मान करना चाहिए. अगर कोई व्यक्ति हमारे साथ दोस्ती या रिलेशनशिप नहीं रखना चाहता तो उसे अपनी मर्जी से फैसला लेने का अधिकार है.

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'ना' सुनना भी जिंदगी की एक जरूरी सीख है
साइकोलॉजिस्ट कहते हैं जिंदगी में हर बार हमें हमारी पसंद की चीज नहीं मिलती. कभी दोस्त मना कर सकता है, कभी नौकरी नहीं मिल सकती और कभी कोई रिश्ता आगे नहीं बढ़ता. लेकिन हर 'ना' को अपनी हार या अपनी कमी नहीं मानना चाहिए. किसी का 'हां' आपकी कीमत नहीं बढ़ाता और किसी का 'ना' आपकी कीमत कम नहीं करता. इसलिए जेन-जी ही नहीं, हर उम्र के व्यक्ति को यह सीखना चाहिए कि दुखी होना ठीक है, लेकिन अपनी भावनाओं को समझ कर खुद को संभालना और आगे बढ़ना भी जरूरी है.

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