अक्सर हमें बचपन से सिखाया जाता है कि किसी ने गलती की है तो उसे तुरंत माफ कर देना चाहिए. लेकिन साइकोलॉजिकल रिसर्च बताती है कि हर स्थिति में तुरंत माफ कर देना जरूरी नहीं है. इमोशनल रूप से मजबूत और समझदार व्यक्ति कई बार माफ करने में समय लेते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि वे बदले की भावना रखते हैं या उनके दिल में नफरत है. बल्कि वे पहले अपने दुख, गुस्से और भरोसे से जुड़े सवालों को समझना चाहते हैं.
मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, माफी एक प्रक्रिया है, जिसे सिर्फ 'मैंने तुम्हें माफ किया' कह देने से पूरा नहीं माना जा सकता. किसी करीबी व्यक्ति ने धोखा दिया, झूठ बोला या ऐसा काम किया जिससे आपको गहरी चोट पहुंची, तो उस दर्द को समझने और स्वीकार करने में समय लग सकता है. माफी की प्रक्रिया पर काम करने वाले मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट एनराइट के मॉडल के अनुसार, व्यक्ति पहले यह समझता है कि उसके साथ क्या हुआ, फिर उससे जुड़ी भावनाओं को महसूस करता है और धीरे-धीरे तय करता है कि वह गुस्से और नाराजगी से आगे कैसे बढ़ना चाहता है. इसलिए तुरंत सामान्य हो जाना हर किसी के लिए संभव नहीं होता.
भावनाओं को दबाना भी सही नहीं
कई लोग किसी विवाद के बाद अपनी भावनाओं को दबा देते हैं. वे बाहर से कहते हैं, 'कोई बात नहीं, मैंने माफ कर दिया', लेकिन अंदर से उसी घटना के बारे में सोचते रहते हैं. मनोविज्ञान में बार-बार किसी दुखद घटना या गलती के बारे में सोचते रहने को रूमिनेशन यानी नकारात्मक बातों पर लगातार सोचते रहना कहा जाता है. रिसर्च में पाया गया है कि इस तरह लगातार सोचते रहना गुस्से और मानसिक परेशानी से जुड़ा हो सकता है. इसीलिए अपनी भावनाओं को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें पहचानना और समझना जरूरी है. व्यक्ति खुद से पूछ सकता है कि मुझे किस बात से चोट लगी, मुझे किस चीज की जरूरत है और आगे मुझे क्या करना चाहिए.
माफ करना और भरोसा करना अलग चीजें हैं
यह सबसे जरूरी बातों में से एक है. अगर आपने किसी व्यक्ति को माफ कर दिया है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपको उस पर पहले जैसा भरोसा भी करना पड़ेगा. मान लीजिए किसी दोस्त ने आपसे पैसे लिए और वापस नहीं किए. कुछ समय बाद आप उसके व्यवहार को लेकर अपने मन की नाराजगी छोड़ सकते हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप उसे दोबारा पैसे देने लगें. मनोविज्ञान में भरोसा किसी के लगातार सही व्यवहार, ईमानदारी और जिम्मेदारी से दोबारा बनता है. इसलिए माफी एक इमोशनल फैसला हो सकता है, जबकि भरोसा समय और व्यवहार से वापस आता है.
माफ करने के बाद भी दूरी रख सकते हैं
इमोशनल रूप से मैच्योर इंसान यह समझता है कि अपनी मानसिक शांति के लिए सीमाएं तय करना जरूरी हो सकता है. अगर कोई व्यक्ति बार-बार आपकी बेइज्जती करता है, आपकी फीलिंग्स को चोट पहुंचाता है या एक ही गलती दोहराता है, तो उसे माफ करने के बाद भी आप उससे दूरी बना सकते हैं. इसका मतलब बदला लेना नहीं है. यह खुद को आगे होने वाले नुकसान से बचाने का तरीका हो सकता है.
जल्दी माफी क्यों नहीं मांगनी चाहिए?
हर स्थिति में तुरंत माफी देना जरूरी नहीं है. खासकर तब, जब आपको अभी भी बहुत गुस्सा या दुख महसूस हो रहा हो. पहले शांत होने के लिए समय लेना, घटना को समझना और फिर बातचीत करना कई बार बेहतर तरीका हो सकता है. भावनाओं को नियंत्रित करने पर साइकोलॉजिकल रिसर्च भी यह बताता है कि अपनी भावनाओं को पहचानना और उनके साथ सही तरीके से काम करना महत्वपूर्ण है.
मनोवैज्ञानिक एवरेट वर्थिंगटन ने माफी के लिए रीच मॉडल दिया है. इसमें व्यक्ति घटना को याद करता है, दूसरे व्यक्ति के नजरिए को समझने की कोशिश करता है, माफी को अपनी इच्छा से चुनता है और फिर उस फैसले पर कायम रहने की कोशिश करता है. इसका मतलब यह नहीं कि गलत व्यवहार को सही मान लिया जाए. बल्कि इसका मतलब है कि व्यक्ति धीरे-धीरे उस घटना के कारण पैदा हुई नकारात्मक भावनाओं से बाहर निकलने की कोशिश करें.
इसलिए इमोशनल रूप से मजबूत होना यह नहीं है कि कोई आपको चोट पहुंचाए और आप तुरंत कह दें, 'मैंने माफ कर दिया.' असली मैच्योरिटी यह समझने में है कि क्या हुआ, आपको कैसा महसूस हुआ, सामने वाला अपनी गलती की जिम्मेदारी ले रहा है या नहीं और आगे उस रिश्ते में भरोसा बनाया जा सकता है या नहीं. माफी का मतलब यह नहीं कि आप जो हुआ उसे भूल जाएं. आप किसी को माफ कर सकते हैं, लेकिन उस घटना से मिली सीख को याद रख सकते हैं.
aajtak.in