जब किसी इंसान को दफनाया जाता है तो उसके शरीर का क्या होता है? आखिर कब्र में मानव शरीर के अवशेष कितने दिनों तक मौजूद रहते हैं और कितने समय बाद हड्डी भी धूल बन जाती है? इन सवालों के जवाब काफी दिलचस्प है.
हमारा शरीर 200 से अधिक हड्डियों, कुछ खरब सूक्ष्मजीवों और लगभग 37 खरब कोशिकाओं से बना है. हालांकि मृत्यु को अक्सर जीवन का अंत माना जाता है, लेकिन इसके बाद भी हमारे शरीर में बहुत कुछ करने की क्षमता होती है. क्योंकि, मरने के बाद भी हमारा शरीर कई रूप बदलता है और पूरी तरह से धूल- मिट्टी में मिलने से पहले लंबे समय तक अलग- अलग दौर से गुजरता है. चलिए, जानते हैं मौत के बाद इंसानी शरीर की कहानी.
मृत्यु के कुछ ही समय में शरीर अपनी पहचान खोने लगता है. मौत के कुछ ही मिनटों बाद, सबसे पहले मस्तिष्क नष्ट होने लगता है. दरअसल, जब हृदय धड़कना बंद कर देता है, तो रक्त प्रवाह रुक जाता है, जो अन्य अंगों और टिश्यू तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है. इसलिए रक्त के बिना, सबसे सक्रिय और ऑक्सीजन की खपत करने वाले अंग और टिश्यू सबसे पहले नष्ट होने लगते हैं. इसका परिणाम... नमी होता है.
क्योंकि, इन अंगों और ऊतकों को बनाने वाली कोशिकाएं 70% पानी से बनी होती हैं. जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन के बिना, कोशिकाएं स्वयं ही नष्ट हो जाती हैं और सारा तरल पदार्थ ताबूत के फर्श पर फैल जाता है. उसी रात, आंतों में एक और भी परेशान करने वाली प्रक्रिया शुरू हो जाती है.
चार दिन बाद शरीर हो जाता है ऐसा
मृत शरीर की कमजोर होती प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्युनिटी उन अरबों भूखे छोटे- छोटे बैक्टीरिया को कंट्रोल नहीं कर पाती जो सामान्यतः भोजन को पचाने में मदद करते हैं. इसलिए वे बाहर निकल जाते हैं. सबसे पहले, वे छोटी आंतों से होते हुए हमारे टिश्यू, नसों और धमनियों से गुजरते हैं. कुछ ही घंटों में, वे लिवर और गॉलब्लैडर तक पहुंच जाते हैं, जिनमें पीले-हरे रंग का पित्त होता है जो जीवित रहने पर फैट को डायजेस्ट करने का काम करता है.जब छोटी आंत से निकले बैक्टीरिया इन अंगों को खा जाते हैं तो इसके बाद, वह पित्त पूरे शरीर में फैलने लगता है, जिससे शरीर पीले-हरे रंग का हो जाता है.
लगभग दूसरे से चौथे दिन तक, ये जीवाणु हर जगह मौजूद होते हैं और वे अमोनिया और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी जहरीली गैसें उत्पन्न करते हैं, जो फैलकर शरीर को न केवल फुला देती हैं, बल्कि दुर्गंध भी पैदा करती हैं. तीन-चार महीनों के बाद शरीर का पीला-हरा रंग, भूरा-काला हो जाता है.
क्योंकि, शरीर की ब्लड वेसल्स इतनी खराब हो जाती हैं कि उनमें मौजूद लोहा बाहर निकल जाता है और ऑक्सीडेशन होने पर भूरा-काला हो जाता है. इसी समय के आसपास, शरीर की कोशिकाओं को आपस में जोड़ने वाली मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर भी टूट जाती हैं, जिससे टिश्यू एक पानी के पल्प में बदल जाते हैं.
एक साल से कुछ ज़्यादा समय में, दफाने के वक्त पहनाए गए सूती कपड़े गलने लगते हैं. क्योंकि एसिडिक बॉडी फ्लुड और टॉक्सिक पदार्थ उन्हें नष्ट कर देते हैं. तब केवल नायलॉन की सिलाई और कमरबंद ही बचते हैं. इस समय तक कुछ खास बदलाव नहीं होता.
दस साल बाद क्या होती है बॉडी की हालत
एक दशक बीतने पर और पर्याप्त नमी मिलने पर, नम और कम ऑक्सीजन वाला वातावरण एक रासायनिक प्रतिक्रिया शुरू कर देता है जो आपकी जांघों और कूल्हों की चर्बी को साबुन जैसी चीज में बदल देता है, जिसे ग्रेव वैक्स कहते हैं.
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दूसरी ओर कब्र के अंदर का ड्राय माहौल बॉडी को ममी बनाने लग जाता है. जी हां, इंसानी शरीर प्राकृतिक रूप से ममीफाइड हो जाती है. इसके लिए किसी रैप, केमिकल या डरावने उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती. क्योंकि इस पूरी डिकंपोज होने की प्रक्रिया के दौरान, कान, नाक और पलकों की पतली त्वचा से पानी वाष्पित होता रहता है. जिससे वे सूखकर काले पड़ जाते हैं, यानी ममीकृत हो जाते हैं.
50 साल बाद सिर्फ खोखली हड्डी रह जाएगी
50 साल बाद शरीर के सारे टिश्यू और लिक्विड गायब हो जाएंगे, केवल ममीफाइड त्वचा और नसें ही बचेंगी. अंततः ये भी विघटित हो जाएंगी और ताबूत में 80 वर्षों के बाद, हड्डियां चटकने लगेंगी क्योंकि उनके अंदर का नरम कोलेजन गलने लगेगा और केवल भंगुर ढांचा ही बचेगा. लेकिन वह खोल भी हमेशा के लिए नहीं टिकेगा.
अंत में सिर्फ शरीर का ये हिस्सा बचता है
एक सदी यानी सौ साल बीतने पर धीरे- धीरे कब्र में बची एक- एक हड्डी भी डिम्पोज हो चुकी होगी और धीरे- धीरे धूल बनकर हवा के साथ कब्र से बाहर निकलकर आसपास फैल जाएगी. इस तरह इंसान की हड्डियों को पूरी तरह से खत्म होने में 100 साल से ज्यादा का समय लग जाता है. शरीर का सबसे टिकाऊ हिस्सा, दांत होता है. कब्र में बस यही दांत और कुछ बॉडी वैक्स यानी मोम और कुछ नायलॉन के धागे बचे रह जाते है.
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