Ground Report: 14 करोड़ की जमीन 54 करोड़ में खरीदी, हरिद्वार लैंड स्कैम में DM-SDM और नगर आयुक्त घिरे

हरिद्वार भूमि घोटाले ने उत्तराखंड में जमीन खरीद-बिक्री और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. सराय गांव की कृषि भूमि को रिकॉर्ड समय में व्यावसायिक घोषित कर करोड़ों रुपये में खरीदे जाने के मामले में कई वरिष्ठ अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है.

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अंकित शर्मा

  • देहरादून,
  • 24 जून 2026,
  • अपडेटेड 6:32 PM IST

उत्तराखंड में लंबे समय से सख्त भू-कानूनों की जरूरत को लेकर बहस होती रही है. राज्य की विभिन्न सरकारों का तर्क रहा है कि पहाड़ी राज्य की संवेदनशील भौगोलिक स्थिति की सुरक्षा करने और स्थानीय जमीन मालिकों का शोषण रोकने के लिए कड़े नियम जरूरी हैं. लेकिन हरिद्वार भूमि घोटाले का हालिया मामला यह दिखाता है कि किस तरह सरकारी अधिकारी अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर सरकारी धन की हेराफेरी कर सकते हैं.

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इस विवाद के केंद्र में हरिद्वार के सराय गांव की 2.307 हेक्टेयर जमीन है, जो नगर निगम के सॉलिड वेस्ट डंपिंग यार्ड के पास स्थित है. स्थानीय लोगों का कहना है कि इस इलाके में बदबू, प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं लगातार बनी रहती हैं. जांच के मुताबिक यह जमीन मूल रूप से कृषि भूमि थी और इसकी अनुमानित कीमत करीब 14 करोड़ रुपये थी. लेकिन कुछ ही दिनों में यही जमीन 54 करोड़ रुपये की सरकारी खरीद का हिस्सा बन गई.

मामले की शुरुआत सितंबर 2024 में हुई, जब सराय गांव के सिंह परिवार ने नगर निगम को अपनी जमीन खरीदने का प्रस्ताव दिया. उनका कहना था कि पीछे बने वेस्ट डंपिंग यार्ड की वजह से उनकी जमीन बेकार हो चुकी है. यह प्रस्ताव कथित तौर पर तत्कालीन म्युनिसिपल कमिश्नर वरुण चौधरी को दिया गया था. इसके बाद तत्कालीन एसडीएम ज्वालापुर अजयवीर सिंह ने कथित तौर पर धारा 143 के तहत जमीन का उपयोग कृषि से बदलकर व्यावसायिक कर दिया. 

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पूल कमेटी भी गठित नहीं की गई

जांच अधिकारियों के मुताबिक यह प्रक्रिया असामान्य रूप से बेहद तेजी से पूरी की गई. जबकि नियमों के तहत सभी पक्षों को कम से कम 22 दिन का नोटिस देना अनिवार्य होता है. इसके अलावा जमीन की आवश्यकता और व्यवहार्यता की जांच के लिए बनाई जाने वाली पूल कमेटी भी गठित नहीं की गई. पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड समय में पूरी कर ली गई. भूमि उपयोग बदलने के बाद जमीन की कीमत करीब 6 हजार रुपये प्रति वर्गमीटर से बढ़कर लगभग 25 हजार रुपये प्रति वर्गमीटर हो गई. इसके बाद हरिद्वार नगर निगम ने दिसंबर 2024 में इस जमीन को खरीद लिया.

सबसे पहले इस सौदे पर सवाल हरिद्वार की मेयर किरण जैसल ने उठाए. उन्होंने इस मामले को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के संज्ञान में लाया. शिकायत के बाद राज्य सरकार ने जांच के आदेश दिए. सचिव रणवीर सिंह चौहान को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई. उन्होंने खरीद प्रक्रिया और उससे जुड़ी स्वीकृतियों की जांच के बाद विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी.
इस रिपोर्ट के बाद उत्तराखंड के हालिया इतिहास की सबसे बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई देखने को मिली.

DM-SDM और नगर आयुक्त पर गिरी गाज

जून 2025 में राज्य सरकार ने हरिद्वार के तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र सिंह, म्युनिसिपल कमिश्नर वरुण चौधरी और एसडीएम अजयवीर सिंह समेत कई अधिकारियों को निलंबित कर दिया. यह राज्य का पहला ऐसा मामला माना गया, जिसमें एक साथ किसी कार्यरत डीएम, म्युनिसिपल कमिश्नर और एसडीएम पर एक ही केस में कार्रवाई की गई. जांच में कई अनियमितताएं सामने आईं. जांच रिपोर्ट के मुताबिक खरीद प्रक्रिया कृषि भूमि के मूल्यांकन के आधार पर शुरू हुई, लेकिन अंतिम खरीद व्यावसायिक दरों पर की गई.

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इसके बाद सतर्कता विभाग की जांच में भूमि चयन, मूल्यांकन, लैंड यूज में बदलाव और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के पालन की जांच की गई. जांचकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया कि कूड़ा डंपिंग साइट के पास स्थित जमीन को खरीदने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी, जबकि तत्काल कोई आवश्यकता नहीं थी. एक साल बाद जून 2026 में धामी सरकार ने कार्रवाई और तेज कर दी. राज्य सरकार ने तत्कालीन म्युनिसिपल कमिश्नर और आईएएस अधिकारी वरुण चौधरी को सेवा से बर्खास्त करने की सिफारिश की और पूर्व डीएम कर्मेंद्र सिंह के खिलाफ बड़ी सजा की अनुशंसा की. 

अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे की मंजूरी

पूर्व एसडीएम अजयवीर सिंह के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की गई, जबकि कई अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे की मंजूरी दी गई. यह प्रस्ताव आगे की कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेजा गया. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति का हिस्सा बताया. सरकार का कहना है कि किसी भी अधिकारी का पद या रैंक कार्रवाई में बाधा नहीं बनेगा. लेकिन सरकारी फाइलों और जांच रिपोर्टों से परे इस कहानी का दूसरा पक्ष सराय गांव के लोगों की जिंदगी से जुड़ा है.

सराय गांव के ग्राम प्रधान मनीष कुमार का कहना है कि डंपिंग यार्ड ने गांव के जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है. उनके मुताबिक लोगों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, खेती प्रभावित हुई है और लोग अपनी जमीन बेचने में भी असफल हो रहे हैं. उनका कहना है कि घोटाले के सामने आने के बाद पंचायत से जुड़े कई काम भी प्रभावित हुए हैं. अब अधिकारी बेहद सतर्क हो गए हैं, जिसके कारण वैध भूमि उपयोग परिवर्तन आवेदन भी लंबित पड़े हैं.

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ग्रामीणों की प्रशासन से डंपिंग साइट हटाने की मांग

वहीं अन्य ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से डंपिंग साइट हटाने की मांग की है. उनका कहना है कि यह कचरा स्थल लगातार लोगों के स्वास्थ्य और जीवन को प्रभावित कर रहा है और मानसून में स्थिति और बदतर हो जाती है. सराय गांव के रणवीर सिंह का कहना है कि उनके पास करीब 12 बीघा जमीन है, लेकिन डंपिंग साइट के पास होने के कारण कोई खरीदार जमीन खरीदने को तैयार नहीं होता. उनका कहना है कि कचरे की समस्या साल-दर-साल बढ़ती जा रही है और कई परिवार अब बेहतर भविष्य की तलाश में गांव छोड़ने पर विचार कर रहे हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता जे.पी. बडोनी का आरोप है कि सबसे पहली अनियमितता धारा 143 के तहत लैंड यूज में बदलाव की प्रक्रिया में हुई, जिसे मात्र 18 दिनों में पूरा कर लिया गया. उन्होंने सवाल उठाया कि इस प्रक्रिया की रिपोर्ट तैयार करने वाले तहसीलदार और पटवारी के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई. बडोनी का यह भी आरोप है कि सरकार की कार्रवाई केवल निचले स्तर के अधिकारियों तक सीमित दिखाई देती है, जबकि भ्रष्टाचार में शामिल बड़े लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. उनका कहना है कि 54 करोड़ रुपये का यह भूमि सौदा इस बात का प्रतीक बन गया है कि प्रशासनिक हेरफेर के जरिए किस तरह सरकारी धन का दुरुपयोग किया जा सकता है.

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