सिंगूर, नंदीग्राम, भट्टा पारसौल और अब उन्नाव...परेशान किसान पर हर जगह सिस्टम बेरहम

उन्नाव में मुआवजे की मांग कर रहे किसानों पर लाठीचार्ज  किया गया है, लेकिन किसानों पर बर्बरता की यह कोई पहली घटना नहीं है. अतीत में ऐसी घटनाएं सामने आईं जब पुलिस की गोली और लाठी ने किसानों की जान ले ली.

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उन्नाव में किसानों के प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा (फोटो- विशाल) उन्नाव में किसानों के प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा (फोटो- विशाल)

सुरेंद्र कुमार वर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 18 नवंबर 2019,
  • अपडेटेड 12:53 PM IST

  • उन्नाव में मुआवजे की मांग कर रहे किसानों पर लाठीचार्ज
  • हिंसा पर प्रियंका गांधी के अलावा अखिलेश-मायावती बरसे

सिंगूर, नंदीग्राम, भट्टा पारसौल की लिस्ट में एक और नाम जुड़ गया है. लिस्ट में शामिल नया नाम उत्तर प्रदेश का उन्नाव जिला है. उन्नाव में जमीन के मुआवजे की मांग को लेकर किसानों ने शनिवार को धरना प्रदर्शन किया तो उन पर पुलिस ने जमकर लाठीचार्ज किया. किसान भी बेकाबू हो गए और पुलिस से उनकी हिंसक भिड़ंत हुई.

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उन्नाव में शनिवार को किसान उस समय उग्र हो गए जब उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम (यूपीएसआईडी) आवासीय परियोजना 'ट्रांस गंगा सिटी प्रोजेक्ट' के तहत निर्माण कार्य शुरू किया गया. किसानों को जब इसकी भनक लगी तो वो जमीन का उचित मुआवजे की मांग के साथ वहां पहुंच गए और प्रदर्शन करने लगे.

उन्नाव हिंसा पर विपक्ष का सरकार पर वार

प्रदर्शनकारी किसानों के उग्र तेवर देखते हुए प्रशासन हरकत में आया और उसने बातचीत का सिलसिला शुरू किया. मामले को सुलझाने के लिए अपर पुलिस अधीक्षक और अपर जिला मजिस्ट्रेट को मौके पर भेजा गया, लेकिन मामला शांत नहीं हो सका. हालांकि, बातचीत के दौरान दोनों पक्ष आक्रोशित हो गए. इस बीच पथराव शुरू हो गया जिसमें पुलिस अफसर समेत कई लोग घायल हो गए जिसमें बड़ी संख्या में किसान भी घायल हुए.

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पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर नियंत्रण के लिए पानी की बौछार, आसूं गैस और लाठीचार्ज कर तितर-बितर करने की कोशिश की. हालांकि, इस दौरान पुलिस का बर्बर चेहरा भी दिखा और उसने कई किसानों पर जमकर लाठियां भी बरसाई. किसानों के साथ हुए इस बर्बर सुलूक पर राजनीति भी शुरू हो गई है. , यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के अलावा मायावती ने भी इस घटना की आलोचना की और अन्नदाता पर लाठी भांजने को निंदनीय करार दिया.

अन्नदाता कहे जाने वाले किसानों पर लाठीचार्ज की यह कोई पहली घटना नहीं है. इससे पहले भी कई ऐसे मौके आए जब पुलिस ने किसानों के साथ अभद्र और बर्बर व्यवहार किया. इन्हीं में से कुछ घटनाएं व्यापक रूप ले लेती हैं और उसकी देशव्यापी चर्चा होने लगती है.

सिंगूरः जहां जबरन किसानों से ली गई जमीन, मारे गए 14 किसान

किसानों से जुड़ी जमीन अधिग्रहीत करने और . राज्य सरकार ने कार फैक्ट्री के लिए पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के सिंगूर में 5 गांव से किसानों की जमीन लेने का फैसला लिया.

18 मई 2006 को टाटा ग्रुप ने ऐलान किया कि वह पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के सिंगूर में करीब 997 एकड़ जमीन पर लखटकिया कार फैक्ट्री बनाएंगे. पश्चिम बंगाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सिंगूर के पांच गांव गोपालनगर, सिंघेरभेरी, बेराबेरी, खासेरभेरी और बाजेमेलिया के 9 हजार से अधिक किसानों से लगभग 997 एकड़ जमीन लेने की योजना तैयार की.

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राज्य सरकार ने इसके लिए 6 हजार किसानों को जमीन देने के लिए राजी कर लिया, लेकिन शेष किसानों ने जमीन देने से मना कर दिया. हालांकि, सरकार ने उनसे जबरन जमीन पर कब्जा ले लिया. जबरन कोशिश के बाद यहां पर हिंसक आंदोलन शुरू हो गया. बाद में ममता बनर्जी भी किसानों के पक्ष में आंदोलन में कूद गईं और लगातार प्रदर्शन किया. जमीन अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में 14 किसान मारे गए.

ममता बनर्जी ने जमीन देने से मना करने वाले किसानों की 400 एकड़ जमीन वापसी की मांग पर भूख हड़ताल की और यह तीन हफ्ते से अधिक दिनों तक चली. बाद में अन्य दलों का भी समर्थन मिला. लगातार प्रदर्शन के कारण टाटा समूह को अक्टूबर 2008 में नैनो फैक्ट्री बंगाल से गुजरात के साणंद में ले जानी पड़ी.

नंदीग्रामः अधिग्रहण के विवाद में किसानों का संघर्ष

सिंगूर के अलावा नंदीग्राम शहर भी किसानों के साथ हुई बर्बरता के लिए जाना जाता है. नवंबर 2007 में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में इंडोनेशिया की एक कंपनी सालिम ग्रुप के स्पेशल इकॉनोमिक जोन के लिए जमीन अधिग्रहण के विवाद में पुलिस के साथ हुए संघर्ष में 14 किसानों की जान चली गई.

अलीगढ़ः टप्पल में किसानों ने गंवाई जान

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भट्टा-पारसौल और टप्पल में भी किसानों को अपनी जमीन के लिए जानें गंवानी पड़ी है. 14 अगस्त 2010 को के टप्पल में किसानों और पुलिस के बीच खूनी संघर्ष हुआ. करीब 18 गांवों के 20 हजार से ज्यादा किसान मथुरा से अलीगढ़ तक बने एक्सप्रेस-वे पर बढ़े मुआवजे के लिए कई दिनों तक प्रदर्शन करते रहे. लेकिन 14 अगस्त की शाम पुलिस के साथ किसानों की झड़प हो गई जिसमें पीएसी के एक सूबेदार और 3 किसानों की मौत हो गई. इस खूनी संघर्ष में बड़ी संख्या में सरकारी और निजी वाहन आग की भेंट चढ़ गए.

भट्टा-पारसौलः जहां घरों से निकालकर किसानों पर बरसाई लाठियां

अलीगढ़ के टप्पल में आंदोलनरत किसानों पर फायरिंग को अभी साल भी पूरा नहीं हुआ था कि 7 मई 2011 को ग्रेटर नोएडा के भट्टा-पारसौल गांव में जमीन अधिग्रहण के विरोध में पुलिस और किसानों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ और दो किसानों की जान चली गई. हालांकि, इस संघर्ष में दो पुलिसकर्मियों की भी जान गई.

किसानों और पुलिस के बीच संघर्ष के दौरान तत्कालीन डीएम दीपक अग्रवाल के पैर में गोली लगने के बाद पुलिस ज्यादा हिंसक हो गई और उसने किसानों को घरों से निकाल-निकाल कर लाठियां बरसाईं. इस हमले में 50 से ज्यादा किसान गंभीर रूप से घायल हो गए और दर्जनों पर गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए.

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इस आंदोलन को कांग्रेस नेता राहुल गांधी का समर्थन मिला. प्रशासन की रोक के बावजूद राहुल गांधी उन्हें चकमा देकर बाइक से भट्टा-पारसौल पहुंचे और किसानों के संघर्ष में शामिल हुए.

सांगलीः गन्ने की कीमत के लिए प्रदर्शन कर रहे किसानों पर बर्बरता

किसानों के खिलाफ बर्बरता की घटनाओं में एक बड़ी घटना महाराष्ट्र के सांगली में अक्टूबर 2012 में घटी, जब गन्ने की कीमत को लेकर किसानों ने अपना आंदोलन शुरू किया. आंदोलन के नेता सांसद राजू शेट्टी को न्यायिक हिरासत में लेकर पुणे की येरवडा जेल भेज दिया गया. लेकिन उनकी गिरफ्तारी के बाद आंदोलन हिंसक हो गया. इस दौरान पुलिस फायरिंग में एक किसान की जान चली गई.

हजारीबागः भूमि अधिग्रहण का विरोध, मारे गए 5 किसान

झारखंड में 1 अक्टूबर 2016 को किसान हजारीबाग जिले के बड़कागांव इलाके में नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन (एनटीपीसी) के नए प्रोजेक्ट के लिए हुए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे. लेकिन इस दौरान पुलिस ने विधायक निर्मला देवी को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें ले जाने लगी जिससे किसान भड़क गए और प्रदर्शन उग्र होता चला गया. पुलिस ने किसानों पर गोलियां चलाई जिसमें 5 किसान मारे गए और 40 से ज्यादा किसान घायल हो गए.

किसानों पर पुलिस का लाठीचार्ज और बर्बरता की यह कुछ अनचाही घटनाएं हैं, इसके अलावा भी कई और घटनाएं हुई हैं. उन्नाव की घटना भी इसकी एक अगली कड़ी की तरह है.

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