जानिए, बड़े भूकंपों के निशाने पर क्यों रहते हैं हिंदुकुश और हिमालय?

अप्रैल 2015 में नेपाल में आए जोरदार भूकंप के बाद से हिंदुकुश में भूकंप के झटके बढ़े हैं. वैज्ञानिकों की मानें तो हिमालय के पहाड़ों के गर्भ में कई और बड़े भूकंप पल रहे हैं. भूगर्भ वैज्ञानिकों के मुताबिक, कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल और असम में बड़े भूकंप की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है.

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2016 में आए मणिपुर भूकंप की तबाही 2016 में आए मणिपुर भूकंप की तबाही

भारत सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 31 जनवरी 2018,
  • अपडेटेड 3:49 PM IST

अफगानिस्तान के हिंदुकुश में आए भूकंप से बुधवार दोपहर को एशिया के कई देशों में इसके झटके महसूस किए गए. हिंदुकुश में भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 6.2 मापी गई है. खबर लिखे जाने तक इस भूकंप में एक बच्ची की मौत हो गई थी और दर्जनों लोग घायल हो गए. इसका ज्यादा असर अफगानिस्तान और उससे लगे पाकिस्तान के इलाकों में देखा गया है. भारत में भूकंप के झटके दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू कश्मीर, उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों में महसूस किए गए.

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अप्रैल 2015 में नेपाल में आए जोरदार भूकंप के बाद से हिंदुकुश में भूकंप के झटके बढ़े हैं. वैज्ञानिकों की मानें तो हिमालय के पहाड़ों के गर्भ में कई और बड़े भूकंप पल रहे हैं. भूगर्भ वैज्ञानिकों के मुताबिक, कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल और असम में बड़े भूकंप की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है.

भारत में इन इलाकों को है सबसे ज्यादा खतरा

भारत को भूकंप के क्षेत्र के आधार पर चार हिस्सों- सिस्मिक जोन-2, जोन-3, जोन-4 और जोन-5 में बांटा गया है. जोन 2 बूकंप के लिहाज से सबसे कम और जोन-5 सबसे ज्यादा संवेदनशील होता है. जोन 5 में भारत के जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्से आते हैं. उत्तराखंड के निचले हिस्से, उत्तर प्रदेश के ज्यादातर हिस्से और राजधानी दिल्ली जोन-4 में आती हैं. मध्य भारत जोन-3 में और जोन-2 में दक्षिण भारत के इलाके आते हैं.

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दिल्ली भी इसलिए है पहाड़ों की तरह संवेदनशील

दिल्ली फॉल्ट लाइन यानी जमीन के नीचे भूकंप के लिहाज से सक्रिय तीन इलाकों की सरहद पर बसी है. ये फाल्ट लाइन हैं सोहाना फॉल्टलाइन, मथुरा फॉल्टलाइन और दिल्ली-मुरादाबाद फॉल्टलाइन. लंबी रिसर्च के बाद आईआईएससी यानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के वैज्ञानिक भी दिल्ली, कानपुर, लखनऊ और उत्तरकाशी के इलाकों में भयंकर भूकंप आने की चेतावनी दे चुके हैं. यानी करीब-करीब पूरा उत्तर भारत भूकंप की चपेट में आ सकता है.

बड़ा खतरा लेकर आएगा हिमालय का भूकंप

एनआईडीएम के कार्यकारी निदेशक संतोष कुमार कह चुके हैं, 'भारतीय हिमालय के तीनों हिस्सों पश्चिमी हिमालय, मध्य हिमालय और पूर्वी हिमालय में बड़ा भूकंप कभी भी दस्तक दे सकता है. सीस्मिक गैप की थ्योरी के आधार पर वैज्ञानिक कश्मीर, हिमालय के कांगड़ा और उत्तराखंड में बड़े भूकंप के दोहराव की आशंका जता रहे हैं. ये भूकंप छोटा नहीं बल्कि इसकी तीव्रता 8 से भी ज्यादा तेज हो सकती है.'

देखिए, कहां आए हैं दुनिया के सबसे बड़े भूकंप

इसलिए आते हैं हिंदुकुश और हिमालय में भूकंप

प्लेट टेक्टॉनिक थ्योरी के मुताबिक, इंडियन प्लेट और यूरेशियन प्लेट आपस में टकरा रही हैं और इस वजह से हिमालय की ऊंचाई लगातार बढ़ रही है. हिमालय का निर्माण भी इसी वजह से हुआ है. इंडियन प्लेट 45 मिलीमीटर प्रति साल की गति से यूरेशियन प्लेट की ओर खिसक रही है. हिमालय के नीचे इंडियन प्लेट है तो अफगानिस्तान के नीचे यूरेशयन प्लेट. दोनों प्लेटों के टकराने पर हिंदुकुश या हिमालय में भूकंप आते हैं और दोनों इलाकों में झटके महसूस किए जाते हैं. पूरे हिमालय क्षेत्र में कई फॉल्ट जोन हैं और प्लेट मूवमेंट के साथ ही इनमें झटके आते हैं.

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हिमालयी इलाके में इन भूकंपों ने कंपा दी थी मानवता की रूह

राष्ट्रीय भूकंप केंद्र के मुताबिक 1905 में कांगड़ा में 7.8 तीव्रता का जबरदस्त भूकंप आया था. 1950 में असम में 8.6 की तीव्रता का भूकंप रिकॉर्ड किया गया. इसके बाद 2005 में पीओके के मुजफ्फराबाद में 7.6 तीव्रता भूकंप आया. 2015 को नेपाल में 7.8 की तीव्रता के भूकंप और ऑफ्टरशॉक्स आए थे. मणिपुर में 2016 में 6.7 तीव्रता के भूकंप ने और चिंताएं बढ़ा दी हैं. हिमालय के कई इलाकों में बड़ा भूकंप आए अर्सा हो गया है और इन इलाकों में भूकंप की आशंका बढ़ी हुई है. भारत ही नहीं, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, चीन और आसपास के इलाकों में बार-बार आ रहे भूकंप की वजह भी यही है.

इसलिए आते हैं दुनिया भर में भूकंप

धरती की ऊपरी सतह सात टेक्टोनिक प्लेटों से मिल कर बनी है. जहां भी ये प्लेटें एक दूसरे से टकराती हैं वहां भूकंप का खतरा पैदा हो जाता है. हिमालय के आसपास का हिस्सा इंडियन प्लेट कहा जाता है. अफगानिस्तान की ओर जाने वाला हिस्सा यूरेशियन प्लेट कहलाता है. उसके बगल में अरब प्लेट और अफ्रीकी प्लेट भी हैं. जब भी ये प्लेट्स एक-दूसरे के इलाके में घुसने की कोशिश करती हैं तो ये आपस में रगड़ खाती हैं और उससे अपार ऊर्जा निकलती है. इसी टक्कर और ऊर्जा से धरती की ऊपरी सतह डोलने लगती है. कई बार तो जमीन फट तक जाती है. कई बार हफ्तों या महीनों तक ये ऊर्जा रह-रहकर बाहर निकलती है और आफ्टरशॉक्स महसूस किए जाते हैं.

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भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर मापी जाती है. इसे रिक्टर मैग्नीट्यूड टेस्ट स्केल कहा जाता है. इसे 1935 में कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी के चार्ल्स रिक्टर ने बेनो गुटेनबर्ग के सहयोग से खोजा था. उन्हीं के नाम पर इसे रिक्टर स्केल का नाम दिया गया है. रिक्टर स्केल भूकंप की तरंगों को 1 से 9 तक के क्रम में मापता है. हर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 10 गुना और उससे निकलने वाली ऊर्जा 32 गुना बढ़ जाती है. यानी रिक्टर स्केल पर एक अंक भी बढ़ना कई गुना भयावह हो सकता है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक, भूकंप आने पर दो तरह की वेव चलती हैं. पी वेव और एस वेव. पी वेव धरती के नीचे सीधे-सीधे चलती हैं और एस वेव धरती की सतह पर चलती हैं. एस वेव यानी सरफेस वेव से सबसे ज्यादा नुकसान होता है, लेकिन इनके चलने की रफ्तार 4 किलोमीटर प्रति सेकेंड होती है. लिहाजा हिमालय में बड़ा भूकंप आने की स्थिति में दिल्ली समेत तमाम इलाकों को 40 से 50 सेकेंड में भूकंप की लहर तबाही पहुंचाने के लिए पहुंच जाएगी.

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