शर्मिष्ठा पनोली के समर्थन में खुल कर उतरे बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन मिश्रा

एडवोकेट और बीेजेपी सांसद मनन मिश्रा ने आगे कहा, "यह अत्यंत चिंताजनक है कि वही सरकार, जिसने ऑपरेशन सिंदूर का विरोध किया था अब ऐसे ही दोहरे मानदंडों पर सवाल उठाने वाले एक युवा कानून के छात्र को चुप कराना चाहती है."

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शर्मिष्ठा पनोली शर्मिष्ठा पनोली

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 02 जून 2025,
  • अपडेटेड 8:54 AM IST

भारतीय विधिज्ञ परिषद यानी बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष वकील और राज्यसभा सांसद मनन मिश्रा ने शर्मिष्ठा पनोली की गिरफ्तारी को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए पश्चिम बंगाल सरकार की कड़ी आलोचना की है. मनन मिश्रा ने अपने सार्वजनिक बयान में कहा है कि मैं शर्मिष्ठा पनोली के साथ मजबूती से खड़ा हूं. उनकी  गिरफ्तारी और न्यायिक हिरासत अब डिलीट हो चुके सोशल मीडिया वीडियो के लिए है. इस बाबत उनके तुरंत माफी मांगने के बावजूद कैद न्याय की पूर्ण विफलता है. यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ज़बरदस्त हमला है.

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मनन मिश्रा ने लिखा है कि बंगाल सरकार और कोलकाता पुलिस ने एक बार फिर अत्यधिक, चुनिंदा और राजनीति से प्रेरित कार्रवाई का अपना पैटर्न साबित किया है.

इस पैटर्न में विशेष समुदायों के व्यक्तियों को निशाना बनाया जाता है लेकिन दूसरे समुदायों के लोगों द्वारा किए गए कहीं ज्यादा गंभीर और जघन्य कुकृत्यों को अनदेखा किया जाता है. उन्हें संरक्षण देकर बचाया भी जाता है.

'खतरनाक तुष्टिकरण की राजनीति...'

बयान में कहा गया है कि इतिहास पश्चिम बंगाल में विशिष्ट समूहों के खिलाफ किए गए अत्याचारों और हिंसा का गवाह है, जिसमें अक्सर सरकारी संस्थाओं और राजनीतिक अभिनेताओं की मिलीभगत या प्रत्यक्ष भागीदारी होती है. हिंदू शरणार्थियों के मरीचझांपी नरसंहार, नंदीग्राम हिंसा और बार-बार होने वाली राजनीतिक हत्याओं से लेकर महिलाओं की सुरक्षा और सांप्रदायिक हिंसा को रोकने में हाल की विफलताओं तक, राज्य प्रायोजित मुर्शिदाबाद दंगे, जहां प्रशासन निर्दोष लोगों की जान बचाने में विफल रहा और केंद्रीय बलों की तैनाती में सक्रिय रूप से बाधा डाली, इस खतरनाक तुष्टिकरण की राजनीति का एक ज्वलंत उदाहरण है. 

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उन्होंने आगे कहा, "बार-बार, राज्य मशीनरी ने हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भड़काने या हिंसा करने वालों को बचाया है, जबकि असहमति व्यक्त करने वाले शर्मिष्ठा जैसे व्यक्तियों के खिलाफ अभूतपूर्व जल्दबाजी और सख्ती से कार्रवाई की है. फिर भी, इन मामलों में, न्याय धीमा या अनुपस्थित रहा है और जिम्मेदार लोगों को अक्सर दंड से मुक्ति मिली है."

मनन मिश्रा ने आगे कहा, "यह अत्यंत चिंताजनक है कि वही सरकार, जिसने ऑपरेशन सिंदूर का विरोध किया था अब ऐसे ही दोहरे मानदंडों पर सवाल उठाने वाले एक युवा कानून के छात्र को चुप कराना चाहती है. शब्दों के गलत चयन को ईशनिंदा का पात्र नहीं माना जा सकता. यह अमानवीय है कि एक युवा कानून के छात्र को बलि का बकरा बनाकर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाती है. जबकि सरकार प्रायोजित व्यक्तियों द्वारा विशेष समुदायों पर अतीत में जघन्य अत्याचार किए गए हैं. सच्चा लोकतंत्र निष्पक्षता, संयम और अधिकारों की समान सुरक्षा की मांग करता है, न कि चुनिंदा आक्रोश और प्रतिशोध की."

उन्होंने आगे कहा कि बंगाल सरकार और पुलिस से अपील की है कि वे चुनिंदा लोगों को निशाना बनाने के इस खतरनाक रास्ते को छोड़ें और सभी के लिए कानून का शासन कायम रखें. मैं शर्मिष्ठा की तत्काल रिहाई, निष्पक्ष सुनवाई और उन दोहरे मानदंडों को खत्म करने की मांग करता हूं, जो लंबे वक्त से राज्य के न्याय प्रशासन को प्रभावित कर रहे हैं. 

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क्या है पूरा विवाद?

सोशल मीडिया एन्फ्लुएंसर शर्मिष्ठा पनौली को उनके एक (अब हटाए जा चुके) वीडियो की वजह से गिरफ्तार किया गया. इस वीडियो में उन्होंने कुछ बॉलीवुड सितारों की आलोचना की थी कि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर पर चुप्पी क्यों साधी है. आरोप है कि उन्होंने वीडियो में एक समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया.

यह भी पढ़ें: 'शर्मिष्ठा को तुरंत रिहा करो', कंगना रनौत ने की मांग, बोलीं- किसी बेटी के साथ ऐसा न हो

शर्मिष्ठा ने मांग ली माफी

शर्मिष्ठा ने वीडियो हटाने के बाद बिना शर्त माफी मांग ली थी, फिर भी कोलकाता में उनके खिलाफ FIR दर्ज की गई, जिसमें धार्मिक आधार पर नफरत फैलाने, धार्मिक भावनाएं भड़काने और शांति भंग करने की नीयत से अपमान करने जैसे आरोप शामिल हैं.

14 दिनों की न्यायिक हिरासत में शर्मिष्ठा 

कोर्ट से बाहर आते समय शर्मिष्ठा ने मीडिया से कहा, 'लोकतंत्र में जिस तरह से यह उत्पीड़न किया जा रहा है, यह लोकतंत्र नहीं है.' उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है. इसके तुरंत बाद, पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, 'राज्य में कार्रवाई सिर्फ सनातनियों के खिलाफ की जाती है.'
 

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