उद्धव सेना के 6 बागी सांसदों की बड़ी जीत, शिंदे गुट में शामिल होने को स्पीकर ने दी मान्यता

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शिवसेना (यूबीटी) के चार बागी सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को आधिकारिक मान्यता दे दी है. स्पीकर की अधिसूचना के साथ ही संसद में इन सांसदों की राजनीतिक पहचान बदल गई है.

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लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने शिवसेना यूबीटी के 6 बागी सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने को मान्यता दी. (File Photo: PTI) लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने शिवसेना यूबीटी के 6 बागी सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने को मान्यता दी. (File Photo: PTI)

हिमांशु मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 18 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 8:45 PM IST

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के छह बागी सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मान्यता दे दी है. शिवसेना (यूबीटी) के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 ने 22 जून को एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने का ऐलान किया था. इन बागी सांसदों में संजय देशमुख (यवतमाल), संजय जाधव (परभणी), संजय दीना पाटिल (मुंबई उत्तर-पूर्व), नागेश पाटिल-अष्टीकर (हिंगोली), ओमप्रकाश राजे निंबालकर (धाराशिव) और भाऊसाहेब वाकचौरे (शिरडी) शामिल हैं.

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उद्धव ठाकरे गुट से अलग हुए छह सांसदों ने लोकसभा सचिवालय में एक औपचारिक आवेदन देकर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने को मान्यता देने की मांग की थी. लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के कार्यालय ने बागी सांसदों के आवेदन को मंजूरी दे दी है. इस फैसले के बाद लोकसभा में इन छह सांसदों को औपचारिक रूप से शिंदे गुट का सदस्य माना जाएगा. इस फैसले के बाद संसद में शिवसेना (यूबीटी) और शिवसेना के प्रतिनिधित्व का समीकरण बदल गया है.

अब लोकसभा में यूबीटी के सिर्फ 3 सांसद बचे हैं, जबकि शिंदे सेना के सांसदों की संख्या 13 हो गई है. स्पीकर के इस निर्णय को महाराष्ट्र की राजनीति में शिंदे गुट के लिए बड़ी जीत और उद्धव गुट के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. बता दें कि लोकसभा चुनाव 2024 में उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के 9 सांसद जीते थे, जबकि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के 7 सांसद जीते थे. 

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शिंदे गुट की एक और बड़ी राजनीति जीत

स्पीकर का यह फैसला 2022 में शिवसेना में हुई बड़ी टूट के बाद शुरू हुई राजनीतिक और कानूनी लड़ाई का एक और अहम अध्याय है. तब से एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के गुट पार्टी के नेतृत्व, संगठन पर नियंत्रण और चुनावी पहचान को लेकर लगातार आमने-सामने हैं. निर्वाचन आयोग पे बालासाहेब ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना और उसके ​चुनाव चिन्ह तीर-कमान को लेकर पहले ही एकनाथ शिंदे गुट के पक्ष में फैसला सुना चुका है.

लोकसभा स्पीकर द्वारा उद्धव सेना के बागी सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने को मान्यता दिए जाने का फैसला ऐसे समय आया है, जब शिंदे ने कुछ दिन पहले ही दावा किया था कि यह प्रक्रिया 'पूरी तरह कानूनी' और 'संवैधानिक रूप से मजबूत' तरीके से पूरी की गई है. उन्होंने भरोसा जताया था कि लोकसभा स्पीकर का फैसला उनके पक्ष में आएगा, क्योंकि सभी संवैधानिक और प्रक्रियागत शर्तों का पालन किया गया है.

एकनाथ शिंदे ने 15 जुलाई को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि उद्धव सेना के छह बागी सांसद आवश्यक दो-तिहाई बहुमत के साथ उनकी पार्टी में शामिल हुए हैं. उन्होंने कहा था कि कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेने के बाद इन सांसदों ने लोकसभा स्पीकर से मुलाकात की और जरूरी दस्तावेजों और वीडियो रिकॉर्डिंग समेत सभी औपचारिकताएं पूरी कीं. शिंदे ने दावा किया था कि बागी सांसदों का उनकी पार्टी में शामिल होना संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के प्रावधानों के अनुरूप है.

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लोकसभा और बढ़ गई एनडीए की ताकत

इस कानून के तहत यदि किसी विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरी पार्टी में विलय का फैसला करते हैं, तो उन्हें अयोग्यता का सामना नहीं करना पड़ता. एकनाथ शिंदे ने कहा था, 'लोकतंत्र में बहुमत सबसे अहम होता है. इन छह सांसदों के हमारे साथ आने से शिवसेना को बहुमत मिला है. हमने पूरी प्रक्रिया संसदीय और विधायी नियमों के तहत पूरी की है.' हालांकि, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) ने इस दावे का विरोध किया था.

उद्धव गुट का कहना था कि केवल संसदीय दल में दो-तिहाई बहुमत होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में भी कानूनी शर्तें पूरी होनी चाहिए. इस पर एकनाथ शिंदे ने कहा था कि अंतिम फैसला लोकसभा स्पीकर को करना है और उनका गुट पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन कर चुका है. लोकसभा स्पीकर का यह फैसला 20 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मॉनसून सत्र से ठीक पहले आया है. इसके साथ ही लोकसभा में बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की ताकत और बढ़ गई है.

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