कावेरी जल विवाद: केंद्र ने कर्नाटक की DPR लौटाई, SC के फैसले का पालन करने का निर्देश

कावेरी जल विवाद को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच फिर छिड़ी खींचतान के बीच केंद्र सरकार ने स्थिति साफ कर दी है, संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए केंद्र ने बताया कि कर्नाटक की विवादित मेकेदातु पेयजल परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट (DPR) को कमियों के कारण वापस लौटा दिया गया है.

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केंद्र ने कर्नाटक से कहा- ट्रिब्यूनल और SC के नियमों के तहत लाएं संशोधित DPR (Photo-ITG) केंद्र ने कर्नाटक से कहा- ट्रिब्यूनल और SC के नियमों के तहत लाएं संशोधित DPR (Photo-ITG)

पीयूष मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 31 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:59 AM IST

केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट कर दिया है कि कर्नाटक की प्रस्तावित 'मेकेदातु संतुलन जलाशय-सह-पेयजल परियोजना' (Mekedatu Balancing Reservoir-cum-Drinking Water Project) को अभी मंजूरी नहीं मिली है. सरकार ने संसद में बताया कि कर्नाटक ने 2019 में जो प्लान (DPR) भेजा था, उसे कमियों के कारण सुधार के लिए वापस लौटा दिया गया है. केंद्र ने कर्नाटक से कहा है कि वह अपने प्लान में बदलाव करे ताकि यह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसले और केंद्रीय जल आयोग के नियमों के मुताबिक हो सके.

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यह स्पष्टीकरण लोकसभा में गुरुवार को डीएमके (DMK) सांसद दयानिधि मारन के एक सवाल के जवाब में जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी द्वारा दिए गए लिखित उत्तर में आया.  यह नया घटनाक्रम विवादित कावेरी परियोजना को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच छिड़े ताज़ा राजनीतिक टकराव के बीच सामने आया है.

DPR संशोधन के लिए वापस भेजी गई

यह बयान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि कर्नाटक इस परियोजना को जल्द मंज़ूरी देने पर जोर दे रहा है, जबकि तमिलनाडु लगातार इसका विरोध कर रहा है. तमिलनाडु का तर्क है कि इस जलाशय से कावेरी डेल्टा के किसानों के लिए पानी की उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.

तमिलनाडु और किसान संगठनों से आपत्तियां मिलने के सवाल पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्र ने कहा कि उसने तमिलनाडु सरकार और किसान संगठनों से मिले ज्ञापनों पर ध्यान दिया है. इन ज्ञापनों में निचले इलाकों के जिलों में पीने के पानी की उपलब्धता सहित कावेरी डेल्टा क्षेत्र पर प्रस्तावित परियोजना के संभावित प्रभावों पर चिंता व्यक्त की गई थी.

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सरकार ने कहा कि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किसी भी परियोजना के मूल्यांकन के दौरान ऐसे ज्ञापनों की जांच की जाती है. केंद्र ने कावेरी जल विवाद में सर्वोच्च न्यायालय के 16 फरवरी 2018 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कावेरी नदी पर किसी संरचना के निर्माण के लिए कर्नाटक द्वारा निचले तटीय राज्यों - तमिलनाडु, केरल या पुडुचेरी की सहमति लेने का कोई प्रावधान नहीं है.

जवाब में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसले के खंड XVIII (Clause XVIII) का भी उल्लेख किया गया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था, इसमें दोहराया गया था कि न्यायाधिकरण के आदेश की कोई भी बात किसी राज्य के अपने क्षेत्र के भीतर पानी के उपयोग को नियंत्रित करने के अधिकार या प्राधिकार को प्रभावित नहीं करेगी, बशर्ते ऐसा उपयोग न्यायाधिकरण के आदेश के असंगत न हो.

यह भी पढ़ें: कावेरी जल विवाद: तमिलनाडु को पानी देने के फैसले पर उबला कर्नाटक, किसानों का प्रदर्शन और चक्का जाम

कावेरी प्रबंधन तंत्र मौजूद

केंद्र ने यह भी रेखांकित किया कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद उसने अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम के तहत जून 2018 में 'कावेरी जल प्रबंधन योजना' को अधिसूचित किया था. इस योजना के तहत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संशोधित न्यायाधिकरण के फैसले को लागू करने के लिए कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल नियमन समिति (CWRC) का गठन किया गया.

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केंद्र का यह जवाब ऐसे समय में आया है जब मिकेदाटू मुद्दा एक बार फिर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच बड़े विवाद का केंद्र बन गया है, कर्नाटक का रुख रहा है कि प्रस्तावित संतुलन जलाशय का मुख्य उद्देश्य बेंगलुरु को पीने का पानी उपलब्ध कराना और सूखे के वर्षों के दौरान पानी के बहाव को नियंत्रित करना है. हालांकि, तमिलनाडु को डर है कि इस परियोजना से निचले इलाकों में पानी का प्रवाह कम हो सकता है, जिससे कावेरी डेल्टा में लाखों किसानों की सिंचाई और आजीविका प्रभावित होगी.

हाल के दिनों में यह विवाद और गहरा गया है, तमिलनाडु में विपक्षी दलों ने राज्य सरकार पर परियोजना के खिलाफ पर्याप्त रूप से कड़ा रुख न अपनाने का आरोप लगाया है, जबकि कर्नाटक ने दोहराया है कि सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के तहत उसे निर्माण के लिए तमिलनाडु की सहमति की आवश्यकता नहीं है.

क्या है कावेरी जल विवाद का इतिहास?

कावेरी नदी के पानी के बंटवारे का विवाद अंग्रेजों के जमाने (1924 के समझौते) से चला आ रहा है. कर्नाटक का तर्क रहा है कि ब्रिटिश काल का समझौता न्यायसंगत नहीं था, क्योंकि वह तब एक रियासत था और वहां खेती देर से शुरू हुई, वहीं तमिलनाडु पुराने समझौतों और अपने तय जल हिस्से को अधिकार मानकर मांग करता आया है. 1990 में गठित ट्रिब्यूनल और 2018 में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद दोनों राज्यों के बीच पानी की मांग को लेकर अक्सर तनाव की स्थिति बन जाती है.

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भले ही कानूनी रूप से कर्नाटक को निर्माण के लिए पड़ोसी राज्यों की सहमति की आवश्यकता न हो, लेकिन केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि जब तक कर्नाटक कावेरी ट्रिब्यूनल के आदेशों और केंद्रीय जल आयोग के सभी नियमों का पालन करते हुए नई और सुधरी हुई DPR पेश नहीं करता, तब तक इस प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं दी जाएगी. 

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