ब्रिक्स आज 11 सदस्य देशों का समूह बन चुका है. ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया. ये देश मिलकर दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक जीडीपी का करीब 40 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करते हैं.
ये सदस्य मिलकर दुनिया की 49.5% आबादी, 40% ग्लोबल GDP और 26% ग्लोबल ट्रेड का प्रतिनिधित्व करते हैं. ये आंकड़े उनकी बड़ी आबादी और मज़बूत आर्थिक स्थिति को दिखाते हैं. इसके सदस्यों की संख्या बढ़ने से एशिया, अफ्रीका, मिडिल ईस्ट और लैटिन अमेरिका में इसकी भौगोलिक पहुंच भी बढ़ी है. इस विविधता से बड़े बाज़ार, प्राकृतिक संसाधन, तकनीकी क्षमताएं और विकास के अलग-अलग अनुभव एक साथ आते हैं.
अगर करेंसी मार्केट के हिसाब से भारत की इकॉनमी को देखें, तो यह दुनिया के कुल प्रोडक्शन का 3.3 परसेंट है. लेकिन अगर इसके खेतों और फैक्ट्रियों से होने वाले असल प्रोडक्शन को देखें, तो यह हिस्सा 8.2 परसेंट है.
इकॉनमी वही, साल वही, लेकिन जवाब दो अलग-अलग.
यह अंतर सिर्फ़ हिसाब-किताब का कोई मामूली फ़र्क नहीं है. इसी से तय होता है कि उधार देने वालों की नज़र में भारत कितना बड़ा है, वह कितना उधार ले सकता है, और जहां नियम बनते हैं, वहां उसकी आवाज़ कितनी असरदार है. इस वीकेंड, नई दिल्ली में वह सबसे अहम जगह पर बैठा है.
ब्रिक्स 12 सितंबर को 11 सदस्यों और 10 पार्टनर देशों के साथ अपना 18वां शिखर सम्मेलन शुरू कर रहा है. अगर इस समूह को एक नज़रिए से देखें, तो यह दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक समूह है. दूसरे नज़रिए से देखें तो इसका कोई मुकाबला नहीं है.
चलिए, सबसे पहले परचेजिंग पावर पैरिटी (PPP) की बात करते हैं. PPP एक सीधा-सा सवाल पूछती है. कोई देश असल में क्या बनाता है? कितने टन, कितने घंटे, या लोग कितनी चीज़ें खरीदते हैं? इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड के आंकड़ों के मुताबिक,इस पैमाने पर 2025 में दुनिया के कुल उत्पादन में BRICS की हिस्सेदारी 40.5 प्रतिशत थी, जबकि G7 की हिस्सेदारी 28.3 प्रतिशत थी। इसने 2020 में G7 को पीछे छोड़ दिया था और तब से यह उससे आगे निकल गया है.
1992 में इस ग्रुप का हिस्सा 15.1 प्रतिशत था. इस बढ़ोतरी की कुछ वजह ग्रुप में नए देशों का शामिल होना है, न कि सिर्फ़ अर्थव्यवस्थाओं का बढ़ना. उस समय ग्रुप में सिर्फ़ चार देश थे; अब ग्यारह हैं. अगर मेंबरशिप को एक जैसा भी माना जाए, तो आज के ग्यारह देशों का हिस्सा 2005 में दुनिया के कुल उत्पादन का 26 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर 40.5 प्रतिशत हो गया है.
मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जनवरी 2024 में शामिल हुए. इंडोनेशिया जनवरी 2025 में शामिल हुआ. पिछले साल दस और देश पार्टनर के तौर पर शामिल हुए, जो ग्रुप के घोषणापत्रों पर दस्तखत किए बिना कुछ बैठकों में हिस्सा लेते हैं. मौजूदा सम्मेलन में इक्कीस देश शामिल होंगे.
अब गिनती का दूसरा तरीके पर नजर डालते हैं. जिससे कहानी का रुख बदल जाता है. हर देश के आउटपुट को उस साल की करेंसी एक्सचेंज रेट के हिसाब से डॉलर में बदलें, तो 2025 में दुनिया के कुल आउटपुट में BRICS का हिस्सा 27.9% था, जबकि G7 का हिस्सा 44.4% था. IMF को उम्मीद है कि 2031 तक यह अंतर कम तो होगा, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं होगा.
इन दोनों आंकड़ों के बीच का अंतर करेंसी मार्केट की वजह से है.
भारत ने इसे महसूस किया है. 2012 में भारतीय अर्थव्यवस्था 5.5 प्रतिशत बढ़ी लेकिन अगर डॉलर में देखें तो इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं हुई. दरअसल रुपया गिर गया था.
मिस्र का मामला और भी साफ़ है. उसने 2016 के आखिर में पाउंड को फ्लोट किया, और डॉलर में उसका आउटपुट एक ही साल में 351 अरब डॉलर से गिरकर 247 अरब डॉलर हो गया, जबकि अर्थव्यवस्था 4.2 प्रतिशत बढ़ी. 11 सदस्यों के मामले में 1993 के बाद से हर पांच में से लगभग एक साल ऐसा हुआ है.
जब से BRIC शब्द बना है, तब से इसमें भारत की हिस्सेदारी दोगुनी हो गई है. 2001 में 'परचेजिंग पावर पैरिटी' (PPP) के हिसाब से दुनिया के कुल उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 4% थी, जो 2025 में बढ़कर 8.2% हो गई है. IMF को उम्मीद है कि 2031 तक यह 10% हो जाएगी. डॉलर के हिसाब से देखें तो यह दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था का 3.3% है, और यहीं से यह कहानी शुरू हुई थी.
कुल आंकड़ों में दो बातें छिपी हुई हैं. डॉलर के हिसाब से इस ग्रुप के कुल उत्पादन में अकेले चीन की हिस्सेदारी 59.5% है, इसलिए BRICS के आगे बढ़ने की बात कहना असल में चीन के आगे बढ़ने की बात है. और एक सदस्य शायद सदस्य न भी हो. चेयरमैनशिप की लिस्ट में सऊदी अरब को जनवरी 2024 से पूर्ण सदस्य बताया गया है, लेकिन रियाद ने कभी भी सार्वजनिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की है. अगर सऊदी अरब को हटा दें, तो 2025 में डॉलर के हिसाब से इस ग्रुप की हिस्सेदारी 27.9% से घटकर 26.8% रह जाएगी.
दीपू राय