देश में 50 से बढ़कर 80 रुपये हुए दाम, महंगी चीनी से आखिर कौन कमा रहा मोटा मुनाफा?

चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी से उपभोक्ताओं और किसानों की चिंता बढ़ी है. सरकार के अनुसार, कम घरेलू उत्पादन, त्योहारी सीजन में बढ़ती मांग, मौसम से फसल को नुकसान, वैश्विक आपूर्ति में कमी और जमाखोरी इसके प्रमुख कारण हैं.

Advertisement
देश में चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के बीच सरकार ने कई कदम उठाए हैं. (Photo- ITG) देश में चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के बीच सरकार ने कई कदम उठाए हैं. (Photo- ITG)

ओमकार

  • पुणे,
  • 24 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 10:12 PM IST

चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने उपभोक्ताओं, गन्ना किसानों, कारोबारियों और नीति निर्माताओं के बीच चिंता बढ़ा दी है. कीमतों में इस बढ़ोतरी की वजह को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं. किसान नेताओं ने कारोबारियों और चीनी उद्योग के कुछ वर्गों पर जमाखोरी, आर्टिफिशियल कमी पैदा करने और मुनाफाखोरी का आरोप लगाया है. वहीं, सरकार ने कीमतों में बढ़ोतरी की वजह घरेलू उत्पादन उम्मीद से कम रहना, त्योहारी सीजन में मांग बढ़ना, मौसम के कारण फसल को नुकसान, वैश्विक स्तर पर आपूर्ति का कम होना और बाजार में अटकलों को बताया है.

Advertisement

सरकार के अनुसार, चीनी की औसत खुदरा कीमत 20 जुलाई 2026 को 48.18 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 20 अगस्त 2026 को 55.70 रुपये प्रति किलो हो गई. यानी केवल एक महीने में कीमत में बड़ी बढ़ोतरी हुई. बाजार से मिली रिपोर्ट के अनुसार, कुछ जगहों पर खुदरा कीमतें इससे भी ज्यादा बढ़ गई हैं. वहां उपभोक्ताओं को पहले करीब 50 रुपये प्रति किलो की तुलना में अब 70-80 रुपये प्रति किलो तक कीमत चुकानी पड़ रही है.

किसान नेता राजू शेट्टी ने सवाल उठाया है कि जब किसानों को कीमतों में बढ़ोतरी का उसी अनुपात में फायदा नहीं मिला, तो चीनी की कीमतें इतनी तेजी से क्यों बढ़ी हैं. शेट्टी के अनुसार, जून तक चीनी की कीमत करीब 3,500-3,600 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर थी. उन्होंने आरोप लगाया कि बड़े चीनी उत्पादक ट्रेडिंग कंपनियां भी चलाते हैं और चीनी को इन कंपनियों को अपेक्षाकृत कम कीमत पर बेचा गया और बाद में उसका भंडारण किया गया. उनके अनुसार, बाद में टेंडर की कीमतें करीब 6,500 रुपये तक पहुंच गईं, जिससे कारोबारियों को बड़ा मुनाफा हुआ.

Advertisement

 कीमतें बढ़ानी शुरू कर दीं

शेट्टी ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया से कारोबारी करीब 2,200 रुपये प्रति टन कमा सकते हैं और दावा किया कि पूरे मामले में 22,000-23,000 करोड़ रुपये का घोटाला हो सकता है. उन्होंने कहा कि अधिकांश सीजन के दौरान चीनी की कीमतें स्थिर रही थीं और कथित हेरफेर सरकार द्वारा निर्यात पर रोक लगाए जाने के बाद शुरू हुआ. उन्होंने कहा कि इसका समय महत्वपूर्ण है, क्योंकि दशहरा, दिवाली और गणेश चतुर्थी समेत त्योहारी सीजन में चीनी की मांग बढ़ने की उम्मीद है. शेट्टी के अनुसार, कारोबारियों ने मांग में मौसमी बढ़ोतरी का अनुमान लगाते हुए कीमतें बढ़ानी शुरू कर दीं और कमी का माहौल बनाया.

उन्होंने यह भी दावा किया कि करीब 88 लाख मीट्रिक टन चीनी से चार महीने में कारोबारियों को बड़ा फायदा हो सकता है. शेट्टी ने यह भी कहा कि नवंबर तक जरूरत पूरी करने के लिए देश में पहले से पर्याप्त चीनी का स्टॉक मौजूद है, इसलिए तत्काल कमी के दावे पर सवाल उठता है.

चीनी आयुक्त ने कम उत्पादन और भंडारण नियंत्रण का जिक्र किया

महाराष्ट्र के चीनी आयुक्त संजय कोल्टे ने माना है कि कई प्राकृतिक कारणों से पिछले साल की तुलना में इस साल चीनी का उत्पादन कम हुआ है. कोल्टे ने कहा, 'पिछले साल की तुलना में इस साल चीनी का उत्पादन विभिन्न प्राकृतिक कारणों से कम हुआ है. बारिश और अन्य कारणों ने उत्पादन को प्रभावित किया है, जिससे पिछले साल की तुलना में चीनी का उत्पादन कम हुआ है.' उन्होंने गन्ने को इथेनॉल के लिए अधिक मात्रा में भेजे जाने की ओर भी इशारा किया. उन्होंने कहा, "पिछले साल 15 लाख मीट्रिक टन गन्ने की पेराई इथेनॉल उत्पादन के लिए की गई थी. इस साल यह मात्रा बढ़कर 18 लाख मीट्रिक टन हो गई है."

Advertisement

हालांकि, कोल्टे ने जोर देकर कहा कि चीनी की जमाखोरी नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा, "चीनी की जमाखोरी नहीं होनी चाहिए. सरकार ने दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनके तहत गोदामों में रखी चीनी को सात दिनों के भीतर बाजार में लाना होगा."

सरकार ने इथेनॉल को कीमत बढ़ने की मुख्य वजह मानने से इनकार किया

केंद्र ने इस दावे को खारिज किया है कि चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी मुख्य रूप से इथेनॉल के लिए चीनी भेजे जाने के कारण हुई है. सरकार के अनुसार, इथेनॉल के लिए भेजी जाने वाली चीनी का हिस्सा वास्तव में 2022-23 में करीब 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में लगभग 9 प्रतिशत हो गया है. इसके अलावा, भारत के इथेनॉल उत्पादन का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्का से आता है.

सरकार का कहना है कि मौजूदा कीमत बढ़ोतरी कई कारणों का परिणाम है. इनमें घरेलू चीनी उत्पादन उम्मीद से कम रहना, त्योहारी सीजन से पहले मांग बढ़ना, मौसम के कारण गन्ने की फसल को नुकसान, वैश्विक स्तर पर चीनी की आपूर्ति कम होना और उद्योग के कुछ वर्गों द्वारा अटकलें तथा जमाखोरी शामिल हैं.

उत्पादन का अनुमान घटाया गया

सरकार ने शुरुआत में गन्ना उत्पादक राज्यों से मिले अनुमानों के आधार पर चीनी उत्पादन करीब 343 लाख टन रहने की उम्मीद की थी. अब इस अनुमान को घटाकर करीब 306 लाख टन कर दिया गया है. भारत में आमतौर पर हर साल करीब 320-340 लाख टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत करीब 280-290 लाख टन रहने का अनुमान है. सामान्य तौर पर अधिक उत्पादन वाले साल में अतिरिक्त चीनी का स्टॉक चीनी मिलों की कार्यशील पूंजी को रोक सकता है और गन्ना किसानों को भुगतान में देरी कर सकता है.

Advertisement

सरकार का कहना है कि इथेनॉल कार्यक्रम ने इस समस्या से निपटने में मदद की है. इससे अतिरिक्त चीनी के लिए एक वैकल्पिक उपयोग मिला है और चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति बेहतर हुई है. सरकार के अनुसार, 20 अगस्त 2026 तक 2025-26 चीनी सीजन के गन्ना बकाये का 97 प्रतिशत किसानों को भुगतान किया जा चुका था. सरकार ने यह भी बताया कि 2014 से 2021 के बीच चीनी उद्योग को करीब 14,600 करोड़ रुपये की सरकारी सब्सिडी दी गई थी, लेकिन 2021-22 के बाद से कोई सब्सिडी घोषित नहीं की गई है.

वैश्विक चीनी की कमी से भी दबाव

सरकार का कहना है कि चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी केवल भारत तक सीमित नहीं है. वैश्विक स्तर पर भी चीनी की आपूर्ति कम हो रही है. 2026-27 में वैश्विक चीनी की कमी करीब 33 लाख टन रहने का अनुमान है. अंतरराष्ट्रीय चीनी की कीमत 30 जून को 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 20 अगस्त को 552 डॉलर प्रति टन हो गई. यानी दो महीने से भी कम समय में इसमें 16 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई. केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कर्नाटक के हुबली में कृषि उत्पादन में कमी की एक वजह रेड रॉट बीमारी और अल नीनो को बताया. जोशी ने कहा, 'रेड रॉट बीमारी, जो अप्रत्याशित थी, और अल नीनो के कारण कुल कृषि उत्पादन, जिसमें चीनी भी शामिल है, न केवल भारत में बल्कि दुनियाभर में कम हुआ है.'

Advertisement

उन्होंने कहा कि सरकार स्थिति को लेकर चिंतित है और घरेलू उपलब्धता बनाए रखने के लिए पहले ही कदम उठा चुकी है. उन्होंने कहा, 'भारत की जरूरत करीब 280 लाख टन है और आज की स्थिति में हमारे पास 20 से 25 लाख टन से ज्यादा का अतिरिक्त स्टॉक है.'

किसान चीनी की बढ़ी कीमतों में अपना हिस्सा मांग रहे

चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के कारण महाराष्ट्र में भी विरोध प्रदर्शन हुए हैं. गन्ना किसानों के बच्चों ने पुणे के साखर संकुल स्थित महाराष्ट्र चीनी आयुक्त कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया. उन्होंने मांग की कि चीनी की बढ़ी कीमतों से होने वाले लाभ में किसानों को बड़ा हिस्सा मिले. प्रदर्शनकारियों ने गन्ना किसानों को उचित भुगतान, लंबित बिजली बिलों को माफ करने और चीनी मिलों में गन्ने की तौल में कथित अनियमितताओं को खत्म करने की मांग की.

किसान वैभव मनावतकर ने कहा कि अगर चीनी की बढ़ी कीमतों से कारोबारियों को फायदा हो रहा है, तो किसानों को भी अतिरिक्त कमाई में हिस्सा मिलना चाहिए. प्रदर्शनकारियों ने राज्य सरकार और चीनी आयुक्त से हस्तक्षेप करने और यह सुनिश्चित करने की मांग की कि बाजार में बढ़ी कीमतों का लाभ गन्ना उत्पादकों को बेहतर भुगतान के रूप में मिले.

Advertisement

जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने कार्रवाई बढ़ाई

कृत्रिम कमी को रोकने के लिए सरकार ने कारोबारियों के लिए 400 टन की स्टॉक सीमा लागू की है. यह व्यवस्था 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक लागू रहेगी. 1 सितंबर से बड़े खरीदारों और थोक उपभोक्ताओं को भी 15 दिनों की जरूरत से ज्यादा चीनी का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी. केंद्र और राज्य सरकार की टीमें चीनी मिलों और गोदामों का निरीक्षण कर स्टॉक की निगरानी कर रही हैं और जमाखोरी रोकने की कोशिश कर रही हैं. सरकार ने घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति देने का भी फैसला किया है. राज्यों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है. सरकार को उम्मीद है कि इन उपायों से अक्टूबर में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी. इस दौरान उत्पादन सामान्य 30-40 लाख टन से 10 लाख टन से अधिक बढ़ सकता है.

बढ़ी कीमतों का फायदा किसे?

भारत ब्राजील के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में गन्ने के रस से चीनी बनाने वाली 703 चीनी मिलें हैं. इनमें 335 निजी मिलें, 325 सहकारी मिलें और 43 सरकारी मिलें शामिल हैं. 2025-26 के पेराई सीजन के दौरान 541 चीनी मिलें चालू थीं. नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्टरीज के उपाध्यक्ष केतन पटेल के अनुसार, 2025-26 में भारत में करीब 3.2 करोड़ टन चीनी उत्पादन होने की उम्मीद थी, लेकिन वास्तविक उत्पादन करीब 3 करोड़ टन रहा. इसलिए विवाद केवल उत्पादन के सवाल तक सीमित नहीं है. किसान संगठनों का कहना है कि खुदरा और थोक चीनी की कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि गन्ना किसानों की कमाई भी बढ़ेगी. उनका आरोप है कि अतिरिक्त मार्जिन कारोबारियों और बिचौलियों के पास जा रहा है.

Advertisement

वहीं, सरकार का कहना है कि मौजूदा कीमत बढ़ोतरी वास्तविक आपूर्ति की कमी और बाजार से जुड़े कई कारणों का परिणाम है. साथ ही सरकार ने उद्योग के कुछ हिस्सों द्वारा अटकलों और जमाखोरी की संभावना को भी स्वीकार किया है.

सरकार कमी दूर करने की कोशिश कर रही है

त्योहारी सीजन नजदीक आने के साथ सरकार आयात, सख्त स्टॉक सीमा और समय से पहले पेराई शुरू करके चीनी की आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश कर रही है. हालांकि, मुख्य सवाल अब भी बना हुआ है कि चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी मुख्य रूप से कम उत्पादन और वैश्विक बाजार के दबाव का नतीजा है या कारोबारी और बिचौलिए अस्थायी आपूर्ति की कमी का फायदा उठा रहे हैं. उपभोक्ताओं के लिए तत्काल चिंता चीनी की कीमत है. किसानों के लिए बड़ा सवाल यह है कि क्या बढ़ी हुई बाजार कीमत का फायदा आखिरकार उन तक पहुंचेगा. वहीं, सरकार के सामने त्योहारी सीजन के दौरान पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के साथ कृत्रिम कमी को रोकने की चुनौती है.
 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »