क्या पॉलीग्राफी दिलाएगा केतन अग्रवाल को इंसाफ? जानें ये टेस्ट कैसे बढ़ा सकता है सिया की मुश्किलें

पुणे के लोहागढ़ किले से 18 जून को 26 साल के केतन अग्रवाल की संदिग्ध मौत हुई थी. पुलिस आरोपी सिया गोयल और चेतन चौधरी पर हत्या का आरोप लगा रही है, लेकिन सीधा सबूत न होने से जांच अटकी है. अब पुलिस पॉलीग्राफी टेस्ट कराने की तैयारी में है.

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सिया और चेतन की भूमिका पर पॉलीग्राफ से होगी पड़ताल (Photo: ITG) सिया और चेतन की भूमिका पर पॉलीग्राफ से होगी पड़ताल (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 03 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 3:53 PM IST

महाराष्ट्र के पुणे के लोहागढ़ किले पर हुई केतन अग्रवाल की मौत के मामले में अब पुलिस पॉलीग्राफी टेस्ट कराने की तैयारी कर रही है. 18 जून को 26 साल के रियल एस्टेट कारोबारी केतन अग्रवाल की लोहागढ़ किले से संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी. 

पुलिस का कहना है कि मुख्य आरोपी सिया गोयल, जिनकी उम्र 20 साल है, और उनके कथित प्रेमी चेतन चौधरी, जिनकी उम्र 22 साल है, ने केतन को खाई में धक्का देकर उनकी हत्या की. लेकिन पुलिस के पास अभी तक कोई सीधा गवाह या पक्का सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि खाई में धक्का किसने दिया. 

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यही वजह है कि जांच अटकी हुई है और अब पुलिस ने इस केस को आगे बढ़ाने के लिए पॉलीग्राफी टेस्ट का सहारा लेने का फैसला किया है. पुणे पुलिस पहले ही कोर्ट में इसके लिए अनुमति मांग चुकी है.

क्या होता है पॉलीग्राफ टेस्ट?

पॉलीग्राफ टेस्ट पूरी तरह सटीक झूठ पकड़ने वाला यंत्र नहीं है. यह असल में इंसान के शरीर में होने वाले बदलावों को मापता है, खासकर तब जब कोई व्यक्ति झूठ बोलते समय तनाव महसूस करता है. 

प्री-टेस्ट इंटरव्यू से होती है शुरुआत

यह टेस्ट कई चरणों में होता है. सबसे पहले प्री टेस्ट इंटरव्यू होता है, जिसमें परीक्षक आरोपी से बातचीत करता है, केस की पूरी जानकारी समझता है और आरोपी के व्यवहार को परखता है. इस दौरान परीक्षक आरोपी के साथ भरोसा बनाने की कोशिश करता है और आगे पूछे जाने वाले सवालों पर भी चर्चा करता है ताकि आरोपी को टेस्ट की प्रक्रिया समझ आ जाए.

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शरीर पर लगाए जाते हैं कई सेंसर

इसके बाद आरोपी के शरीर पर अलग अलग सेंसर लगाए जाते हैं. छाती पर एक पाइप बांधा जाता है, उंगलियों में इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं, बांह पर ब्लड प्रेशर वाला कफ बांधा जाता है और कई बार पसीना मापने के लिए भी सेंसर लगाए जाते हैं. ये सारे सेंसर मिलकर आरोपी की दिल की धड़कन, ब्लड प्रेशर, सांस लेने की रफ्तार, पसीना यानी स्किन कंडक्टेंस और कई बार शरीर की हलचल तक को रिकॉर्ड करते हैं. 

तीन तरह के सवाल पूछे जाते हैं

इसके बाद परीक्षक आरोपी से तीन तरह के सवाल पूछता है. पहले इररेलेवेंट सवाल पूछे जाते हैं जैसे आपका नाम क्या है. फिर कंट्रोल सवाल पूछे जाते हैं जो सामान्य तनाव पैदा करने वाले होते हैं, जैसे क्या आपने कभी चोरी की है. इसके बाद रिलेवेंट सवाल आते हैं जो सीधे मामले से जुड़े होते हैं, जैसे क्या आपने केतन को धक्का दिया.

तनाव के संकेतों से होती है पड़ताल

परीक्षक ये सवाल कई राउंड में दोहराता है और कंप्यूटर या ग्राफ पर लाइनें बनती जाती हैं. जब किसी सवाल का झूठा जवाब दिया जाता है तो शरीर में तनाव बढ़ जाता है, जिससे दिल की धड़कन, सांस या पसीने में असामान्य बदलाव आ जाता है और यही ग्राफ पर दिख जाता है.

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क्या अदालत में मान्य होता है पॉलीग्राफ?

हालांकि एक बात साफ समझनी जरूरी है कि पॉलीग्राफ टेस्ट को अदालत में मुख्य सबूत नहीं माना जाता. इसकी वजह यह है कि इसमें गलती की गुंजाइश रहती है, जैसे आरोपी सिर्फ घबराहट की वजह से भी असामान्य प्रतिक्रिया दे सकता है या किसी दवा का असर भी नतीजों को प्रभावित कर सकता है. भारत में यह टेस्ट सिर्फ आरोपी की सहमति और अदालत की अनुमति मिलने के बाद ही किया जा सकता है.

केतन केस में पुलिस को क्या उम्मीद?

अब सवाल यह है कि केतन अग्रवाल के इस मामले में पॉलीग्राफी टेस्ट से पुलिस को क्या मिल सकता है. इस केस में सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि प्रत्यक्ष सबूत मौजूद नहीं है. पुलिस के पास सिया और चेतन के बयान हैं, मोबाइल लोकेशन की जानकारी है, सीसीटीवी फुटेज है और कुछ परिस्थितिजन्य सबूत भी हैं, लेकिन यह अब तक साबित नहीं हो पाया है कि खाई में धक्का असल में किसने दिया. 

हत्या की साजिश पर मिल सकते हैं संकेत

पॉलीग्राफी टेस्ट से कई अहम खुलासे हो सकते हैं. अगर सिया या चेतन हत्या में अपनी भूमिका छिपा रहे हैं तो टेस्ट के दौरान उनके जवाबों में तनाव दिख सकता है, खासकर जब उनसे पूछा जाएगा कि क्या उन्होंने केतन को धक्का दिया या क्या दोनों ने मिलकर योजना बनाई थी.

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तीसरे व्यक्ति की भूमिका भी जांच के दायरे में

इसके अलावा टेस्ट से नई जानकारी भी सामने आ सकती है, जैसे यह पता चल सकता है कि कोई तीसरा व्यक्ति भी इस घटना में शामिल था या नहीं, घटना के समय की बारीक जानकारी क्या थी और क्या सबूत मिटाने की कोई कोशिश की गई.

बयानों में विरोधाभास पकड़ने की कोशिश 

दोनों आरोपी पहले भी पुलिस को अपने बयान दे चुके हैं और यह टेस्ट उन बयानों की सच्चाई परखने में मदद कर सकता है और अगर बयानों में कोई विरोधाभास है तो वह भी उजागर हो सकता है.

जांच को मिल सकती हैं नई लीड्स

भले ही यह टेस्ट अदालत में सीधा सबूत न बने, लेकिन पुलिस को इससे नई लीड्स मिल सकती हैं, जैसे छिपाए गए सबूतों की लोकेशन या किसी और गवाह की जानकारी. 

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फॉरेंसिक जांच के साथ होगा विश्लेषण

साथ ही अगर गेट एनालिसिस यानी चाल की जांच जैसे दूसरे फॉरेंसिक टेस्ट भी साथ में किए जाएं तो केस और मजबूत हो सकता है.

सीमित लेकिन उपयोगी तकनीक

कुल मिलाकर पॉलीग्राफी टेस्ट विज्ञान की एक उपयोगी लेकिन सीमित तकनीक है. यह इंसान के मानसिक तनाव को पकड़ने में मदद करती है, लेकिन इसे पूरी सच्चाई का आईना नहीं माना जा सकता. 

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सच्चाई तक पहुंचने की कोशिश

केतन अग्रवाल हत्याकांड जैसे पेचीदा मामलों में, जहां प्रत्यक्ष सबूत बहुत कम हैं, यह टेस्ट जांच को नई दिशा देने में मददगार साबित हो सकता है. पुलिस की पूरी कोशिश है कि इस टेस्ट के जरिए सच्चाई सामने आए और केतन को इंसाफ मिल सके.

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