घर छोड़ने को मजबूर हुए माता-पिता, बेटे से कोर्ट बोला- गिफ्ट में मिला फ्लैट वापस दो

माता-पिता ने अपने बेटे को लोअर परेल का एक अपार्टमेंट इस वादे पर ट्रांसफर किया था कि वह उनकी देखभाल करेगा. जब वह ऐसा करने में नाकाम रहा, तो कोर्ट ने प्रॉपर्टी वापस करने का आदेश दिया.

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बेटे को मां-बाप की तरफ से गिफ्ट में मिला फ्लैट वापस देना होगा. (Photo: AI-generated) बेटे को मां-बाप की तरफ से गिफ्ट में मिला फ्लैट वापस देना होगा. (Photo: AI-generated)

विद्या

  • मुंबई,
  • 09 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:04 PM IST

बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुजुर्ग माता-पिता द्वारा अपने बेटे को दी गई प्रॉपर्टी के गिफ्ट को रद्द करने के फैसले को सही ठहराया है. कोर्ट ने कहा कि जब माता-पिता इस भरोसे पर प्रॉपर्टी ट्रांसफर करते हैं कि उनकी देखभाल की जाएगी, तो अगर उस वादे को पूरा नहीं किया जाता है, तो ट्रांसफर को रद्द किया जा सकता है.

एक्टिंग चीफ जस्टिस रवींद्र वी. घुगे और जस्टिस गौतम ए. अंखाड की बेंच ने मुंबई के बिजनेसमेन अश्विन रमेश सोनी की याचिका खारिज कर दी. उन्होंने उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें लोअर परेल का फ्लैट अपने माता-पिता को वापस करने के लिए कहा गया था.

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यह विवाद अश्विन के माता-पिता, 68 वर्षीय रमेश बचौलाला सोनी और 60 वर्षीय बीना रमेश सोनी ने शुरू किया था. उन्होंने मई 2023 में फ्लैट की ओनरशिप अपने बेटे को ट्रांसफर की थी, क्योंकि उसने उन्हें भरोसा दिलाया था कि वह बुढ़ापे में उनकी देखभाल और मदद करेगा.

क्या है पूरा मामला?

कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, परिवार में 2020 के आसपास गंभीर मतभेद शुरू हो गए. परिवार में शांति बनाए रखने की कोशिश में, माता-पिता ने अपनी दो प्रॉपर्टी अपने बेटे के नाम कर दी. उन्होंने इन प्रॉपर्टी के ट्रांसफर के लिए स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन का खर्च भी उठाया.

हालांकि, बाद में परिवार में अनबन जैसी बातें हुईं. कोर्ट ने पाया कि माता-पिता को आखिरकार लोअर परेल वाला फ्लैट छोड़ना पड़ा, जो उनका घर था. भायखला में एक और अपार्टमेंट, जो अभी बन ही रहा था, वह भी बेटे के नाम कर दिया गया था और माता-पिता उसका कब्जा नहीं ले पाए, जिससे वे दोनों प्रॉपर्टी से वंचित रह गए.

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बेटे ने तर्क दिया कि उसके पिता आर्थिक रूप से सुरक्षित थे, गहनों का व्यापार करते थे और उनके पास अन्य प्रॉपर्टी भी थीं. उसने यह भी दावा किया कि लोअर परेल वाला फ्लैट असल में उसके अपने पैसे से खरीदा गया था और कहा कि ट्रांसफर रद्द करने से उसकी पत्नी और दो बच्चों पर असर पड़ेगा, जो उस फ्लैट में रह रहे थे.

यह भी पढ़ें: 'तोते भी हैं जंगली जानवर', बॉम्बे हाई कोर्ट ने सुनाया दिलचस्प फैसला, सरकार को लगाई फटकार

माता-पिता का कहना था कि दोनों प्रॉपर्टी उनके अपने संसाधनों से खरीदी गई थीं और उन्हें इसलिए ट्रांसफर किया गया था क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि उनका बेटा उनकी देखभाल करेगा और परिवार में मेल-जोल बनाए रखेगा.

हाई कोर्ट ने गौर किया कि गिफ्ट डीड में ही एक शर्त शामिल थी कि बेटा प्रॉपर्टी मिलने के बाद अपने माता-पिता की देखभाल करने के लिए सहमत था. जजों ने पाया कि यही वादा ट्रांसफर का आधार था और यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से टूट गई थी, क्योंकि माता-पिता को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था.

कोर्ट ने यह भी कहा कि माता-पिता की फाइनेंशियल हालत यह तय नहीं करती कि ऐसा ट्रांसफर कैंसिल किया जा सकता है या नहीं. मायने यह रखता है कि क्या प्रॉपर्टी देखभाल की उम्मीद पर ट्रांसफर की गई थी और क्या वह उम्मीद पूरी हुई.

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बेटे की आपत्तियों को खारिज करते हुए, अदालत को पहले के ऑर्डर में दखल देने की कोई वजह नहीं मिली और उसे लोअर परेल फ्लैट का कब्जा अपने माता-पिता को सौंपने का निर्देश दिया.

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