भोपाल गैस पीड़ितों के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाले अब्दुल जब्बार को पद्मश्री सम्मान के लिए चुना गया है. परिवार के लोग एक तरफ सम्मान पाने से बेहद खुश हैं, वहीं दूसरी तरफ इस बात का गम भी है कि उनके जीते जी अगर यह सम्मान मिला होता, तो बात ही कुछ और होती. पद्म श्री की घोषणा के बाद आजतक की टीम भोपाल के बाहरी इलाका चांदबड़ में अब्दुल जब्बार के झुग्गीनुमा घर पहुंची.
घर की स्थिति बेहद दयनीय है. टूटा फूटा मकान और एक छोटा सा आंगन जिसमें अब्दुल जब्बार के बच्चे खेल रहे थे. अब्दुल जब्बार के निधन के बाद परिवार में बीवी और तीन बच्चे बचे हैं.
काश पति जिंदा होते तो दोगुनी होती खुशी
पत्नी सायरा बानो कहती हैं, 'मुझे इस बात की खुशी है कि सरकार ने हमारे परिवार को यह सम्मान दिया, लेकिन दुख इस बात का है कि इस खुशी के पल में उनके पति अब्दुल जब्बार उनके साथ नहीं हैं. अगर वो आज जिंदा होते तो इस सम्मान की खुशी दोगुनी हो जाती.'
सायरा बताती हैं कि अब्दुल जब्बार कभी भी अपने परिवार के बारे में नहीं सोचते थे. उन्होंने गैस पीड़ितों को ही अपना परिवार बना लिया था. दुख तो बस इस बात का है कि वो जब बीमार थे तो किसी ने उनकी सुध तक नहीं ली. मरते-मरते भी वो गैस पीड़ितों की लड़ाई को आगे बढ़ाने की बात कहते गए थे.
भाभी को नौकरी मिल जाए तो बच्चों को मिलेगा दो वक्त का खाना
आजतक ने जब अब्दुल जब्बार के भाई अब्दुल शमीम से बात की तो उन्होंने कहा, 'अब्दुल जब्बार जब बीमार थे तो सरकार और गैस पीड़ित संगठनों में से कोई उनकी सुध लेने नहीं आया. अगर उनका इलाज गंभीरता से कराया गया होता तो आज वो जिंदा होते. अंतिम समय में उन्हें अस्पतालों में शिफ्ट करते रहे गए औऱ उनकी जान निकल गई.'
अब्दुल जब्बार ने नौकरी की मांग करते हुए कहा, 'भाई के जाने के बाद घर की आर्थिक हालत बेहद खराब है. कई बार तो बच्चों को दिन में दो बार का खाना तक नसीब नहीं होता. ऐसे में अगर सरकार पद्म श्री के सम्मान के साथ भाभी को नौकरी दे दे तो घर का खर्चा भी निकल जाएगा. साथ ही बच्चों को अच्छी तालीम मिल जाएगी. जिससे उनका भविष्य बेहतर हो जाए.'
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पिता से सीखा गरीबों की सेवा करना
अब्दुल जब्बार के सबसे बड़े बेटे साहिल ने आजतक से बात करते हुए कहा, 'मैंने अपने पिता से गरीबों की सेवा करना सीखा है. वो जब जिंदा थे तो बहुत कम वक्त ही घर पर रहते थे. उन्का ज्यादातर समय गैस पीड़ितों की मदद में गुजरा.'
रवीश पाल सिंह