गुजरात: बीजेपी का मजबूत किला है मेहसाणा, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस की लहर भी नहीं तोड़ पाई थी इसे

अरविंद केजरीवाल का उत्तर गुजरात के मेहसाणा में रैली के जरिए पाटीदार और ओबीसी वोटों को साधने का प्लान है. इस इलाके में रोजगार और शिक्षा एक मुद्दा रहा है, जिसे आम आदमी पार्टी सियासी हथियार बना रही है. गुजरात आप के अध्यक्ष गोपाल इटालिया ने कहा कि राज्य की जनता समझदार है और कौन किस पार्टी में जा रहा है.

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गुजरात का मेहसाणा जिला बीजेपी का माना जाता है गढ ( फाइल फोटो) गुजरात का मेहसाणा जिला बीजेपी का माना जाता है गढ ( फाइल फोटो)

गोपी घांघर

  • अहमदाबाद,
  • 06 जून 2022,
  • अपडेटेड 5:31 PM IST
  • मेहसाणा जिले पर है सभी दलों की नजर
  • केजरीवाल मेहसाणा में खत्म करेंगे तिरंगा यात्रा
  • गुजरात में 2022 के अंत में होने हैं चुनाव

गुजरात के जिस जिले से बीजेपी का उदय हुआ था, उस मेहसाणा पर अब अरविंद केजरीवाल की भी नजर है. मेहसाणा वही इलाका है, जहां पाटीदारों का दबदबा है, जहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गृहमंत्री अमित शाह और गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री व यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन आती हैं. यह जिला गुजरात की राजनीति में सबसे ज्यादा महत्व रखता है और गुजरात की राजनीति का केंद्र भी माना जाता है. दिल्ली, पंजाब के बाद अब गुजरात में अपनी जगह बनाने के लिए अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को मेहसाणा में तिरंगा यात्रा का आयोजन किया. 

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1984 में जीती सिर्फ दो सीटों में एक मेहसाणा थी

भाजपा की स्थापना के बाद 1984 में जब लोकसभा के चुनाव हुए तब इंदिरा गांधी की मौत के कारण देशभर में कांग्रेस की लहर थी लेकिन देशभर में जिन 2 सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की थी, उनमें से एक सीट मेहसाणा थी. इस सीट पर पाटीदार नेता एके पटेल ने जीत दर्ज की थी. इसके बाद फिर बीजेपी ने गुजरात में पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार बीजेपी का दबदबा पाटीदारों और राज्य में देखने को मिला.

पाटीदार आंदोलन ने पहुंचाया था बड़ा नुकसान

2015 का वह साल जब आरक्षण की मांग के साथ हार्दिक पटेल ने आंदोलन शुरू किया. आंदोलन की आग सबसे ज्यादा मेहसाणा जिले में ही लगी थी. बीजेपी के वफादार माने जाने वाले पाटीदार अब बीजेपी सरकार के सामने ही आरक्षण की मांग कर रहे थे. इस दौरान राज्य भर में हिंसा भी हुई. पाटीदारों को पुलिस की सख्ती का शिकार भी होना पड़ा. पाटीदारों में बीजेपी को लेकर घोर नाराजगी थी.

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नतीजन स्थानीय इकाई चुनाव में भाजपा के गढ़ में कांग्रेस को लंबे अरसे के बाद सफलता मिली और पाटीदार आंदोलन का असर 2017 के चुनाव में भी देखने को मिला. इसमें 7 में से 2 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की लेकिन कांग्रेस का वोट प्रतिशत काफी बढ़ गया था. बीजेपी अपने मजबूत गढ़ को ढहटे हुए नहीं देखना चाहती थी जिसके चलते बीजेपी ने लगातार अपने घर को मजबूत बनाने के लिए 2017 के बाद से ही प्रयास शुरू कर दिए थे.

7 सालों में कई नेताओं ने लगाए मेहसाणा के चक्कर

2015 से लेकर 2022 के इस मुश्किल समय में दूसरे दलों ने भी मेहसाणा पर अपनी नजर दौड़ाई, खुद अरविंद केजरीवाल भी पाटीदारों से मिलने गए. कांग्रेस के नेताओं ने भी जमकर प्रयास किया क्योंकि तब पाटीदार खास तौर से युवा वोटर बीजेपी से नाराज थे लेकिन बीजेपी की रणनीति के सामने सभी दल विफल हो गए. 

हार्दिक को बीजेपी में शामिल करने से कई नेता नाराज

2022 के चुनाव आने से पहले भाजपा ने फिर एक बार अपने गढ़ में पाटीदारों को अपनी ओर खींचने का पूरा प्रयास किया और अंत में जिस हार्दिक पटेल की वजह से विरोध तेज हुआ था, उसी को ही भाजपा ने अपने दल में शामिल कर लिया. हालांकि अब हार्दिक की मुश्किलें बढ़ रही हैं. पाटीदार हार्दिक को धमकियां मिल रही हैं. चर्चा यह भी है कि हार्दिक को बीजेपी में शामिल करने के कारण संगठन के कई नेता काफी नाराज हैं. अगर उनकी नाराजगी खुलकर बाहर आई तो बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ सकता है.

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उत्तर गुजरात में आती हैं 53 विधानसभा सीटें

उत्तर गुजरात में 53 विधानसभा सीटें हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में नार्थ गुजरात की 53 सीटों में 35 सीटों पर बीजेपी का कब्जा है तो 17 सीटें कांग्रेस के पास है. वहीं, 2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के पास इस इलाके में 32 और कांग्रेस को 21 सीटें थीं. उत्तर गुजरात में गांधीनगर, बनासकांठा, साबरकांथा, अरवली, मेहसाणा और पाटन जिले आते हैं. 

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