श्रद्धा वॉकर मर्डर केस: आफताब पूनावाला की टालमटोल पर कोर्ट की फटकार, ऑर्डर शीट ने खोले कई राज

श्रद्धा वॉकर हत्याकांड में ट्रायल की रफ्तार को लेकर सवाल उठे. हालांकि अदालत के आदेशों का क्रमवार अध्ययन अलग तस्वीर पेश करता है. रिकॉर्ड बताते हैं कि अदालत लगातार सुनवाई तेज करने, गवाहों की गवाही पूरी कराने और अनावश्यक टालमटोल रोकने पर जोर देती रही है.

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कोर्ट ने आफताब की देरी की कोशिशों पर जताई सख्ती, रिकॉर्ड से सामने आई पूरी तस्वीर. (File Photo: ITG) कोर्ट ने आफताब की देरी की कोशिशों पर जताई सख्ती, रिकॉर्ड से सामने आई पूरी तस्वीर. (File Photo: ITG)

सृष्टि ओझा

  • नई दिल्ली,
  • 15 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 10:08 PM IST

श्रद्धा वॉकर मर्डर केस में हाल ही में दिल्ली की एक अदालत ने आरोपी आफताब अमीन पूनावाला को परीक्षा देने के लिए एक दिन की राहत देते हुए सुनवाई स्थगित कर दी थी. इसके बाद यह सवाल उठने लगे कि क्या अदालत आरोपी की स्थगन की मांगों को लगातार स्वीकार करती रही है. इसी वजह से हाई-प्रोफाइल केस का ट्रायल धीमा पड़ा है.

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हालांकि, इंडिया टुडे को मिले अदालत के आदेशों की समीक्षा इससे अलग तस्वीर पेश करती है. ट्रायल शुरू होने के बाद जारी आदेशों से साफ होता है कि अदालत ने लगातार तेज सुनवाई पर जोर दिया, बचाव पक्ष की देरी की रणनीतियों पर सवाल उठाए और गवाहों की बिना रुकावट गवाही पूरी कराने के लिए लगातार तारीखें तय कर दी.

इस मामले की सुनवाई अब तक तीन अलग-अलग जजों के समक्ष हुई है. अदालत ने कई आदेशों में कहा कि बचाव पक्ष अनावश्यक स्थगन मांग रहा है. कई मौकों पर जिरह के लिए आखिरी मौका दिया गया और चेतावनी दी गई कि कार्यवाही में देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी. अदालत ने आरोपी आफ़ताब पूनावाला की एक अर्जी को भी खारिज कर दिया था.

ब्लॉक कैलेंडर और रोजाना सुनवाई

इसमें हर महीने सिर्फ दो सुनवाई की तारीखें तय करने की मांग की गई थी. अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष ने 212 से अधिक गवाहों का हवाला दिया है और कई गवाह दिल्ली के बाहर से आ रहे हैं. ऐसे में सुनवाई सीमित करना उचित नहीं होगा. इसके बाद के आदेशों में ट्रायल तेज करने के लिए ब्लॉक कैलेंडर और रोजाना सुनवाई की व्यवस्था भी बनाई.

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गौरतलब है कि मई 2022 में दिल्ली के महरौली स्थित किराए के फ्लैट में 27 वर्षीय श्रद्धा वॉकर की उसके लिव-इन पार्टनर आफताब अमीन पूनावाला ने गला घोंटकर हत्या कर दी थी. आरोप है कि इसके बाद उसने शव के कई टुकड़े किए, उन्हें फ्रिज में रखा और अगले कई महीनों तक अलग-अलग जगहों पर फेंकता रहा. श्रद्धा महाराष्ट्र की रहने वाली थी.

29 मई को इस मामले की सुनवाई कर रहे जज हरगुरवरिंदर सिंह जग्गी ने आदेश दिया कि गवाहों की गवाही रोजाना दर्ज की जाए. अदालत ने कहा कि ट्रायल की रफ्तार धीमी हो गई है. इसके साथ ही आफताब को नोटिस जारी कर कहा कि यदि उसका वकील उपस्थित नहीं हो सकता तो वह उचित व्यवस्था करे ताकि मुकदमे की सुनवाई प्रभावित न हो.

बार-बार देरी पर सवाल उठाए

ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड बताते हैं कि कम से कम सात मौकों पर अदालत ने सुनवाई में हो रही देरी पर चिंता जताई. फरवरी 2024 में जज मनीषा खुराना ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि आफताब के वकील कार्यवाही को रोकने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने तब कहा जब मुख्य वकील की अनुपस्थिति का हवाला देकर प्रॉक्सी वकील ने अतिरिक्त समय मांगा.

मई 2024 में अदालत ने फिर कहा कि बचाव पक्ष के वकील जानबूझकर कार्यवाही रोकने की कोशिश कर रहे हैं. अदालत ने यह भी दर्ज किया कि तारीखें बचाव पक्ष की सुविधा के अनुसार तय की गई थीं, जबकि कानून के मुताबिक आपराधिक मामलों की सुनवाई रोजाना होनी चाहिए. जुलाई 2024 में हर महीने सिर्फ दो तारीखें तय करने की मांग की गई थी.

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आफताब की मांग को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि यह आवेदन ट्रायल लंबा खींचने का एक तरीका प्रतीत होता है. बचाव पक्ष के वकील अपनी सुविधा के अनुसार तय तारीखों पर भी उपस्थित नहीं हुए. अगस्त 2024 में अदालत ने कहा कि आरोपी जानबूझकर गवाहों की जिरह में देरी कर रहा है. इसके बाद कुछ गवाहों से जिरह का अधिकार खत्म कर दिया गया.

दिसंबर 2025 में अदालत ने कहा कि उसी महीने दूसरी बार वकील की अनुपस्थिति का हवाला दिया गया है. अदालत ने आफताब को याद दिलाया कि यदि उसकी कानूनी टीम उपलब्ध नहीं है तो वह नया वकील नियुक्त कर सकता है. फरवरी 2026 में अदालत ने ट्रायल की धीमी प्रगति पर चिंता जताते हुए अभियोजन और बचाव पक्ष दोनों को निर्देश दिया था.

कई 'आखिरी मौके' दिए गए

इसमें कहा गया था कि मेडिकल इमरजेंसी या शोक जैसी परिस्थितियों को छोड़कर अनावश्यक स्थगन से बचें. मई 2026 में भी अदालत ने यही चिंता दोहराई. अदालत ने कहा कि ट्रायल की प्रगति वास्तव में धीमी हुई है. यह भी दर्ज किया कि अभियोजन के एक गवाह की जिरह 9 अलग-अलग तारीखों के बाद भी पूरी नहीं हुई थी. 13 गवाहों की गवाही अभी अधूरी थी.

अदालत के आदेश बताते हैं कि बचाव पक्ष को जिरह पूरी करने के लिए कई बार अंतिम अवसर दिए गए. सितंबर 2023 में अदालत ने कहा कि अभियोजन के दो गवाहों से जिरह का कोई और मौका नहीं मिलेगा. अक्टूबर 2023 में एक अन्य गवाह की जिरह के लिए 'आखिरी और आखिरी मौका' दिया गया, जबकि बचाव पक्ष के अनुरोध पर पहले भी तारीख बढ़ाई जा चुकी थी.

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मई 2024 में अदालत ने चेतावनी दी कि यदि बचाव पक्ष के वकील विशेष रूप से तय तारीखों पर उपस्थित नहीं हुए तो अन्य गवाहों से जिरह का अधिकार भी समाप्त किया जा सकता है. अक्टूबर 2024 में आरोपी को एक बार फिर गवाहों से जिरह के लिए अंतिम अवसर दिया गया. अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा न होने पर यह अधिकार खत्म कर दिया जाएगा.

तेजी से कार्रवाई के लिए दबाव

नवंबर 2024 में भी अदालत ने 'आखिरी और आखिरी मौका' देते हुए कहा कि अगली तारीख पर आगे न बढ़ने की स्थिति में जिरह का अधिकार समाप्त कर दिया जाएगा. अप्रैल 2025 में मुंबई से आए सरकारी गवाह को दोबारा बुलाते हुए अदालत ने 3000 रुपए की लागत पर जिरह के लिए अंतिम अवसर दिया. ट्रायल को तेज करने के लिए कई आदेश दिए गए.

जनवरी 2025 में अदालत ने याद दिलाया कि मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में लंबित है. मुख्य वकील का किसी अन्य अदालत में व्यस्त होना सुनवाई रोकने का आधार नहीं हो सकता. अक्टूबर 2025 में अदालत ने सभी पक्षों को तारीखें देने का निर्देश दिया ताकि मुकदमे की सुनवाई रोजाना हो सके. दिसंबर 2025 में जनवरी से अप्रैल 2026 तक का पूरा ब्लॉक कैलेंडर जारी किया गया. 

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इसके तहत जनवरी में तीन, फरवरी में चार, मार्च में पांच और अप्रैल में पांच तारीखें तय की गईं. अदालत ने साफ कहा कि स्थगन की किसी भी मांग पर विचार नहीं किया जाएगा. इसके बाद मई 2026 में अदालत ने आदेश दिया कि 20 जुलाई से इस मामले की सुनवाई हर दिन दोपहर 2 बजे की जाएगी. इस तरह अदालत हमेशा ही केस की सुनवाई को तेज करने के पक्ष में रही है.

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