उपेंद्र कुशवाहा का फिर से नीतीश पर निशाना, बोले- बिहार में कानून का डर खत्म

अगले साल लोकसभा चुनाव से पहले बिहार की राजनीति में नए मोड़ आते दिख रहे हैं. एनडीए में खास तवज्जो नहीं मिलने की आशंका को देखते हुए रालोसपा नेता उपेंद्र कुशवाहा एक बार फिर से बागी होते दिख रहे हैं.

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उपेंद्र कुशवाहा (फाइल) उपेंद्र कुशवाहा (फाइल)

सुरेंद्र कुमार वर्मा

  • पटना,
  • 05 सितंबर 2018,
  • अपडेटेड 12:23 AM IST

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले बिहार की राजनीति में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन में शामिल राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) खुश नहीं बताई जा रही है और यही कारण है कि वह राज्य में लगातार बागी तेवर अपनाए हुए हैं. रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने एक बार नीतीश कुमार सरकार पर निशाना साधा है.

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केंद्रीय राज्य मंत्री और रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने मंगलवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि राज्य में अपराधियों के मन में कानून का डर नहीं रह गया है.

मुख्यमंत्री पर निशाना साधा

उन्होंने मंगलवार को वैशाली जिला मुख्यालय हाजीपुर में अपनी पार्टी के एक कार्यकर्ता की हत्या के बाद उसके शोकाकुल परिजनों से मिलने के बाद मुख्यमंत्री पर निशाना साधा. उन्होंने कहा, 'हत्याएं हो रही हैं. मुख्यमंत्री को स्वयं ऐसी घटनाओं पर संज्ञान लेते हुए अपने अधिकारियों के साथ अव्यवस्था को लेकर चर्चा करनी चाहिए.'

उपेंद्र ने हाल ही में कहा था कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने चौथे कार्यकाल के लिए दावा नहीं करना चाहिए. पिछले दिनों उन्होंने 'सियासी खीर' बनाने का फॉर्मूला दिया था जिसमें उन्होंने यदुवंशियों और कुशवंशियों के गठजोड़ के संकेत दिए थे.

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केंद्र में शासित एनडीए में अहमियत नहीं मिलने से नाराज माने जा रहे उपेंद्र ने कहा कि ऐसा लगता है कि बिहार में सक्रिय अपराधियों के मन से कानून का डर गायब हो गया है. यह प्रशासन के समक्ष एक चुनौती है.

दूसरी ओर, बीजेपी भाजपा के वरिष्ठ नेता और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने जोर देकर कहा कि जब से नीतीश ने महागठबंधन का साथ छोड़ा है, राज्य में कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ है.

सरकार का दावा, स्थिति सुधरी

सुशील ने ट्वीट कर कहा कि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की भागीदारी वाली महागठबंधन सरकार के गिरने और कानून का राज स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध एनडीए सरकार की वापसी से पिछले एक साल में अपराध पर लगाम लगाने में बड़ी कामयाबी मिली. अक्टूबर 2017 से आपराधिक मामलों की निगरानी कर इस साल अगस्त तक 1 लाख 77 हजार 448 लोगों की गिरफ्तारी की गई. अच्छी पुलिसिंग से अपहरण में 13.9 फीसद, दुष्कर्म की घटनाओं में 31.82 फीसद और दलितों के विरुद्ध अपराध के मामलों में 12.18 प्रतिशत की कमी आई है.

उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार को बदनाम करने के लिए विपक्ष केवल चुनिंदा घटनाओं को हवा देता है. सुशील ने कहा कि सामान्य अपराध के साथ-साथ नक्सली वारदात पर अंकुश लगाने में भी राज्य सरकार को सफलता मिली है जिससे नक्सली हिंसाग्रस्त राज्यों की सूची में बिहार दो पायदान खिसककर 5वें नंबर पर आ गया. 2016 की 100 और 2017 की 71 नक्सली वारदात के मुकाबले इस साल अब तक केवल 25 घटनाएं हुईं हैं.

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बिहार की राजनीति में दिलचस्प मोड़ 2017 में तब आया जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लालू प्रसाद यादव का साथ छोड़कर दोबारा एनडीए में शामिल हो गए. राज्य में बीजेपी इस समय नीतीश कुमार को बड़ा भाई भी मानने के लिए राजी नजर आ रही है. लेकिन नीतीश और बीजेपी में गहराती दोस्ती, 2014 में मोदी के साथी बने उपेंद्र कुशवाहा को रास नहीं आ रही है. शायद इसीलिए कुशवाहा बागी तेवर दिखा रहे हैं.

आरजेडी के साथ 'खीर'

मोदी सरकार में ने पिछले महीने के अंतिम हफ्ते में पटना में बीपी मंडल की जन्मशती समारोह में इशारों-इशारों में आरजेडी के साथ गठबंधन के संकेत दिए थे. कुशवाहा ने तब कहा था, 'यदुवंशी (यादव) का दूध और कुशवंशी (कोइरी समाज) का चावल मिल जाए तो खीर बढ़िया होगी और उस स्वादिष्ट व्यंजन के बनने से कोई रोक नहीं सकता है.'

बाद में उन्होंने इसे और स्‍पष्‍ट करते हुए कहा कि यह खीर तब तक स्वादिष्ट नहीं होगी जब तक इसमें छोटी जातियों और दबे-कुचले समाज का पंचमेवा नहीं पड़ेगा. यही सामाजिक न्याय की असली परिभाषा है.

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मात देने के लिए आरजेडी नेता तेजस्वी यादव इस बार यादव, मुस्लिम और दलित मतों के साथ-साथ ओबीसी मतों को भी अपने पाले में लाने की कवायद में जुटे हए हैं. लेकिन एनडीए में नीतीश की एंट्री के बाद उपेंद्र कुशवाहा के लिए बहुत ज्यादा राजनीतिक जगह नहीं बची है. ऐसे में कुशवाहा भी एक मजबूत सियासी साथी के तलाश में हैं.

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उपेंद्र कुशवाहा और लालू प्रसाद यादव की जोड़ी एक दूसरे के लिए तुरुप का पत्ता साबित हो सकती है. कुशवाहा कोइरी समाज से आते हैं, बिहार में इस समुदाय का करीब 3 फीसदी वोट हैं. जबकि लालू का मूल वोट बैंक यादव और मुस्लिम हैं. बिहार की कुल जनसंख्या में 16 फीसदी मुस्लिम और 14.4 फीसदी यादव आबादी है. इसके अलावा दलित और पिछड़ों में अच्छा खासा लालू का जनाधार है.

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