बढ़ते तापमान का प्रेग्नेंसी पर असर, लाखों बच्चे हो सकते हैं ठिगनेपन का शिकार

गर्म तापमान और उमस का असर होने वाले बच्चे के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है. यह दावा जर्नल Science Advances में पब्लिश हुई स्टडी में यह दावा किया गया है. इस स्टडी में एक बड़े खतरे की ओर इशारा किया गया है.

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प्रेग्नेंसी पर गर्मी और उमस का असर प्रेग्नेंसी पर गर्मी और उमस का असर

दीपू राय

  • नई दिल्ली,
  • 09 जून 2026,
  • अपडेटेड 4:02 PM IST

ज्यादा गर्मी और उमस भरा मौसम गर्भ में पल रहे बच्चे को भी नुकसान कर सकता है. इसका सीधा असर उसके शारीरिक विकास पर पड़ने का खतरा है. इससे बच्चा ठिगनेपन का शिकार हो सकता है. जर्नल Science Advances में पब्लिश हुई स्टडी में यह दावा किया गया है. स्टडी में कहा गया है कि केवल बढ़ती गर्मी ही नहीं बल्कि उमस भी होने वाले बच्चे की सेहत के लिए बड़ा खतरा है. अगर इसको काबू करने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो साल 2025 तक दक्षिण एशिया में होने वाले बच्चों में ठिगनेपन के मामले लाखों में बढ़ सकते हैं.  

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यह रिसर्च दक्षिण एशिया के लगभग दो लाख बच्चों पर की गई है. इसमें अधिकतर बच्चे भारत के थे. रिसर्च में प्रेग्नेंसी के दौरान ज्यादा गर्मी और उमस का संबंध बच्चों में होने वाली स्टंटिंग ( ठिगनेपन) से पाया गया है. रिसर्च में उमस वाली गर्मी और बिना उमस वाली गर्मी के असर में अंतर बताया गया है. भारत के अलग-अलग राज्यों में दोनों तरह की गर्मी पड़ती है. राजस्थान और पश्चिमी भारत तेज गर्मी पड़ती है, लेकिन बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश औरपश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में उमस वाली गर्मी पड़ती है. जिन राज्यों में उमस वाली गर्मी है वहां गर्भवती महिलाओं में प्रेग्नेंसी के आखिरी हफ्तों में होने वाले बच्चे की हेल्थ पर इसका असर होने का खतरा ज्यादा है. ऐसे राज्यों में बच्चों में स्टंटिंग के मामले ज्यादा हो सकते हैं. 

 

गर्मी और उमस दोनों खतरनाक

 

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क्या है स्टंटिंग? ये क्यों होती है 

दिल्ली AIIMS में पीडियाट्रिक विभाग में डॉ. हिमांशु भदानी बताते हैं कि जब किसी बच्चे का शारीरिक विकास ठीक तरीके से नहीं होता है तो इसको स्टंटिंग कहते हैं. इसमें बच्चे की लंबाई उसके उम्र के हिसाब से कम रह जाती है. इसको आम भाषा में ठिगनापन भी कहते हैं. ये समस्या सिर्फ शारीरिक विकास तक ही सीमित नहीं रहती है, बल्कि इसमें बच्चे की इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है और उसकी सीखने की क्षमता भी सामान्य बच्चों की तुलना में कम रहती है. इसका कारण कुपोषण होता है.

गर्भ में पल रहे बच्चे पर कैसे असर डालती है उमस भरी गर्मी?

रिसर्च में बताया गया है कि जब कोई गर्भवती महिला बहुत उमस और गर्मी वाले तापमान में रहती है तो उसके शरीर पर इसका असर पड़ता है. इससे डिहाइड्रेशन से लेकर हीट स्ट्रोक का रिस्क होता है. लंबे समय तक गर्म तापमान में रहने पर शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए काफी मेहनत करता है.इससे शरीर पर ज्यादा प्रेशर पड़ने लगता है.

इसका एक असर महिला के प्लेसेंटा पर होता है. शरीर पर बढ़े प्रेशर के कारण प्लेसेंटा में ब्लड सर्कुलेशन सामान्य की तुलना में कम होने लगता है. इससे गर्भ में पल रहे बच्चे तक जरूरी पोषण नहीं पहुंच पाता और ऑक्सीजन भी कम जाता है. इससे उसकी ग्रोथ पर असर पड़ता है क्योंकि बच्चे को जरूरत के हिसाब से पोषण नहीं मिल पाता है. 

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बढ़ी हुई उमस से लंबाई कम होने का खतरा

रिसर्च में यह कहा गया है कि अगर प्रेग्रेंसी के आखिरी महीनों में गर्भवती महिला को ज्यादा गर्म और उमस भरे मौसम में रहती हैं तो इसका असर बच्चे की लंबाई पर पड़ता है. बच्चा सामान्य बच्चों की तुलना में छोटा रह जाता है. मौसम में गर्मी और उमस होने से बच्चों की उम्र के हिसाब से लंबाई औसतन 5.1% तक कम रह सकती है. वहीं, अगर केवल तापमान देखें और उसमें उमस न हो तो यह असर सिर्फ 1.3% था. इसका मतलब है कि सिर्फ गर्मी ही नहीं, बल्कि गर्मी के साथ मौजूद नमी (उमस) भी बच्चे के विकास पर बड़ा और ज्यादा गंभीर असर डालती है.

 

बच्चे की लंबाई पर असर

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गर्भावस्था की अंतिम तिमाही में सबसे ज्यादा खतरा

इस रिसर्च में दावा किया गया है कि प्रेग्नेंसी की आखिरी तीमाही यानी 28 वें हफ्ते से लेकर 40 वें हफ्ते तक गर्मी का असर बच्चे पर ज्यादा होता है. क्योंकि ये वो समय होता है जब बच्चे को पोषण की जरूरत ज्यादा होती है और उसका विकास हो रहा होता है.अगर इसी समय जरूरत के हिसाब से पोषण न मिले तो इसका असर बच्चे पर होता है..

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भारत के इन राज्यों पर ज्यादा असर

स्टडी में पाया गया कि भारत में बिहार, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश,  के इलाकों में रहने वाली महिलाओं में ये रिस्क अधिक है.ऐसा इसलिए क्योंकि इन इलाकों में उमस और गर्मी अधिक रहती है. रिसर्च में यह भी कहा गया है कि अभी तक जलवायु परिवर्तन का असर केवल आम लोगों पर देखा जा रहा था, लेकिन अब गर्भ में पल रहे बच्चे भी इससे प्रभावित हो रहे हैं.

इन राज्यों में ज्यादा खतरा

इस समस्या से बचने के लिए क्या किया जाना चाहिए

रिसर्च में वैज्ञानिकों ने इस समस्या का समाधान भी बताया है. वैज्ञानिकों ने कहा है कि इस समस्या से बचने के लिए पहला कदम यह है कि गर्भवती महिलाओं को ज्यादा गर्म और उमस भरे वातावरण से बचाएं, साथ ही तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन पर ध्यान देने की जरूरत है. अगर ऐसा न किया गया तो इसका सीधा असर आने वाली पीढ़ी पर होगा. साल 2025 तक दक्षिए एशिया में ठिगनेपन के लाखों मामले बढ़ जाएंगे.

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