इंडस्ट्री की खुली पोल, बड़े एक्टर्स के ठाठ, कैरेक्टर आर्टिस्ट्स को नहीं मिलती इज्जत, झेलते हैं भेदभाव

बॉलीवुड और टेलीविजन इंडस्ट्री में कैरेक्टर आर्टिस्ट्स को सम्मान और सुविधाओं में भारी भेदभाव का सामना करना पड़ता है. सुनीता राजवार और जतिन नेगी ने बताया कि कैसे बड़े कलाकारों को बेहतर सुविधाएं और सम्मान मिलता है, जबकि छोटे कलाकारों को नीचा फील कराया जाता है.

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इंडस्ट्री में कास्ट सिस्टम. (Photo: Instagram/Sunita Rajwar) इंडस्ट्री में कास्ट सिस्टम. (Photo: Instagram/Sunita Rajwar)

आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क

  • नई दिल्ली ,
  • 24 जून 2026,
  • अपडेटेड 8:00 AM IST

बॉलीवुड-टेलीविजन की दुनिया बाहर से चकाचौंध भरी नजर आती है. पर कई बार इसकी सच्चाई बिल्कुल अलग होती है. कलाकार कई बार इंडस्ट्री की कड़वी सच्चाई का जिक्र कर चुके हैं. इस बाच  'पंचायत' की क्रांति देवी यानी सुनीता राजवार ने शोबिज का दुनिया की काली हकीकत बयां की है. सुनीता के साथ जतिन नेगी ने भी पर्दे के पीछे की सच्चाई लोगों के सामने रखी है. 

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कैटेगिरी में मिलता है खाना 
'स्क्रीन' संग बातचीत में जतिन नेगी और सुनीता राजवार ने इंडस्ट्री में होने वाले भेदभाव का जिक्र किया. कई शोज, फिल्म और वेब सीरीज में बेहतरीन काम करने के बावजूद दोनों एक्टर्स को सम्मान पाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. जतिन ने कहा कि  कैरेक्टर आर्टिस्ट को तब तक सम्मान नहीं मिलता है, जब तक वो परेश रावल और अनुपम खेर जैसे बड़े कलाकार न हों. 

कैरेक्टर आर्टिस्ट को सुविधाएं उनकी भूमिका के आधार पर दी जाती है. बड़ी फिल्म के लीड एक्टर को 4 वैनिटी वैन मिलती हैं.  कैरेक्टर आर्टिस्ट को केवल एक स्पॉट बॉय मिलता है, जो उनके सामान की सुरक्षा करता है. कभी-कभी उन्हें सिर्फ एक मेकअप आर्टिस्ट दिया जाता है. अगर आप सीनियर कैरेक्टर आर्टिस्ट हैं, तो आपको एक अच्छी वैनिटी वैन की सुविधा मिल सकती है. 

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वरना कैरेक्टर आर्टिस्ट को अन्य कलाकारों के साथ वैनिटी वैन शैयर करनी पड़ती है. बैकग्राउंड कैरेक्टर निभाने वाले कलाकारों को करीब 7-8 कलाकारों के साथ वैन शेयर करना होता है. आपको कितना सम्मान मिलेगा, ये आपकी भूमिका पर निर्भर होता है. हमें पैसा भी 90 दिनों बाद मिलता है. 

स्पॉटबॉय भी नहीं करते इज्जत
सुनीता राजवार ने कहा कि सेट पर लीड एक्टर्स और कैरेक्टर आर्टिस्ट की हैसियत में बहुत फर्क दिखता है, जो बिल्कुल हमारे समाज की तरह है. उन्होंने कहा, अगर कोई लीड रोल में है, तो सब कुछ उसी के इर्द-गिर्द घूमता है. उसे अच्छा रूम मिलता है, उनका अपना स्टाफ होता है. अगर आप कोई छोटा किरदार निभा रहे हैं. सिर्फ एक सीन कर रहे हैं या कोई 2-3 दिन काम कर रहा है, तो स्पॉटबॉय भी आपको नहीं पूछेंगे. 

जतिन कहते हैं कि एक बार मुझे पैसों की जरूरत पड़ी और मैं एक बैकग्राउंड रोल निभा रहा था. स्क्रिप्ट में मेरा नाम सिर्फ मैन 1 लिखा था. अगर वो हमसे खाने के लिए पूछ लेते, तो हम खुद को किस्मत वाले समझते. अगर कभी हमने चाय या कॉफी मांग ली तो कभी नहीं मिलती. 

इतना ही नहीं. जतिन के मुताबिक, छोटे कलाकारों को खाने के मामले में अलग करने के लिए सेट पर A, B और C कैटिगरी बंटे होते हैं. उन्होंने कहा कि भारत में सेट पर एक सेक्शंस होता है- A, B और C कैटिगरी. A कैटिगरी में सीनियर कलाकार होते हैं. एक्स्ट्रा भूमिका वाले कलाकारों के लिए खाने का अलग सेक्शन होता है. ये सब देखकर मेरा दिल टूट जाता है. मुझे ये भेदभाव कभी पसंद नहीं आया. बड़े-बड़े प्रोडक्शन हाउस में भी यही होता है. लीड कलाकार निर्देशकों के साथ उठते-बैठते हैं. इस बंटवारे से सेट पर एक अजीब माहौल पैदा हो जाता है, बिल्कुल कास्ट सिस्टम जैसा. 

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झेलना पड़ा अपमान 
जतिन बताते हैं कि मैंने 7-8 साल पहले एक छोटा-सा किरदार निभाया था. मैं अपने किरदार के गेटअप में था. इसलिए जब मैं खाना खाने गया, तो उन्होंने मुझे अंदर नहीं जाने दिया. फिर मुझे प्रोडक्शन वाले को फोन करना पड़ा और तब रात के 10 बज रहे थे. तब जाकर मुझे अंदर जाने दिया गया. मुझे दाईं ओर एक गली दिखाई गई, जहां मुझे जाकर खाना खाना था. मुझे ऐसा लगा जैसे मैं समाज से अलग हो गया हूं. खाने की क्वॉलिटी बहुत खराब थी. A, B और C कैटिगरी के लोगों को दिए जाने वाले खाने की क्वॉलिटी में बहुत बड़ा अंतर देखा है. खाने के लिए तीन सेक्शन हैं और आपको बताया जाता है कि आपको किस सेक्शन से खाना खाना है. कई बार जूनियर कलाकारों को सेट से काफी दूर खाना दिया जाता है. उनके पास बैठने के लिए चेयर भी नहीं होतीं हैं. ऐसे में उन्हें खड़े रहकर खाना होता है. 
 

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